द लेंस। जाने माने मार्क्सवादी आलोचक वीरेंद्र यादव (Veerendra Yadav) का आज लखनऊ में निधन हो गया। वह करीब 74 वर्ष के थे। छात्र जीवन से ही वामपंथ और जनपक्षधरता के साथ खड़े होने वाले वीरेंद्र यादव उत्तर प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ के लम्बे समय तक सचिव रहे और उन्होंने ‘प्रयोजन’ पत्रिका का सम्पादन भी किया।
वीरेंद्र यादव के निधन से हिंदी साहित्यजगत में शोक की लहर फैल गई है। बीस दिन के भीतर हिंदी जगत ने तीन बड़े साहित्यकारों को खो दिया है। इससे पहले 23 दिसंबर को ज्ञानपीठ से सम्मानित कवि-कथाकार विनोद कुमार शुक्ल का निधन हो गया था और उनके बाद सात जनवरी को कथाकार और पहल के संस्थापक संपादक ज्ञानरंजन का निधन हो गया था।
वीरेंद्र यादव ने पत्र-पत्रिकाओं में साहित्यितक-सांस्कृतिक विषयों पर विपुल लेखन किया है। उनकी पुस्तक उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता खासी चर्चित हुई है। वीरेंद्र जी को आलोचना से संबंधित प्रतिष्ठित शमशेर सम्मान से नवाजा गया था। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन किया था।
उनके निधन पर जाने-माने पत्रकार प्रदीप कुमार ने गहरा दुख जताते हुए कहा, मैंने 58 साल पुराना दोस्त खो दिया।
‘वीरेंद्र जी की कलम से बहुत कुछ आना बाकी था’ -उर्मिलेश

आलोचक वीरेंद्र यादव के निधन पर जाने माने पत्रकार-लेखक उर्मिलेश ने द लेंस से बात करते हुए कहा, ” स्तब्ध हूं! कुछ ही देर पहले प्रख्यात आलोचक वीरेंद्र यादव के निधन की सूचना मिली. कुछ सप्ताह पहले फोन पर बातचीत हुई थी. स्वास्थ्य समस्या की भी संक्षिप्त चर्चा हुई. उनका आज अकस्मात चले जाना हम सबके लिए बहुत बड़ी क्षति है. अभी उन्हें होना चाहिए था. बहुत जरूरी थे वह हमारे समाज, हिंदी साहित्य और विचार जगत के लिए! हिंदी की साहित्यिक आलोचना को वीरेंद्र जी ने नया प्रगतिशील परिप्रेक्ष्य दिया. कई मायनों में यह हिंदी की कथित ‘मार्क्सवादी आलोचना’ से भिन्न था. अपनी नयी दृष्टि से उन्होंने वर्ण-संकीर्णताओं में पिचकी हिंदी की नकली प्रगतिशीलता को बहुत तथ्यात्मक ढंग से बेनकाब किया. इससे हिंदी आलोचना के कई नये-पुराने बड़े दिग्गजों का नकली ‘प्रगतिशील आभामंडल’ धाराशायी होता दिखा. अभी वीरेंद्र जी की कलम से बहुत कुछ आना बाकी था।”









