छत्तीसगढ़ के गौरेला-पेंड्रा-मारवाही जिले के पंडरीपानी क्षेत्र में करीब 15 बेबस परिवारों को बुलडोजर के दम पर बेरहमी से बेदखल करने की कार्रवाई संवैधानिक तकाजों के साथ ही मानवीय नजरिये से भी पूरी तरह से अस्वीकार्य है। प्रशासनिक अमला किस तरह से संवेदनहीन हो चुका है, वह इस छोटे से गांव में दिखा, जहां बिना पूर्व सूचना के इन परिवारों के घरों को ध्वस्त कर दिया गया।
वन विभाग का दावा है कि ये लोग वन भूमि में बसे हुए थे और यहां साल के कीमती वनों की अवैध तरीके से कटाई गई। दूसरी ओर इन लोगों का दावा है कि ये बरसों से यहां रहे हैं और उनके मकान प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बनाए गए थे। यही नहीं, इन लोगों का आरोप है कि उनकी महिलाओं के साथ सरकारी अमले ने मारपीट तक की।
सवाल तो यही है कि बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के साथ इन बेबस लोगों के घरों को कैसे ध्वस्त कर दिया गया?
दरअसल ऐसी कार्रवाइयों को अपवाद नहीं कहा जा सकता। ये घटनाएं एक सिलसिले में ही देखी जानी चाहिए, जहां कथित विकास की सर्वाधिक कीमत मजलूमो और बेबसों को चुकानी पड़ रही है।
और इस मामले में छत्तीसगढ़ एक मॉडल बनता जा रहा है, जहां राजधानी रायपुर से लेकर हसदेह और बस्तर तक विकास के नाम पर लोगों को बेदखल किया जा रहा है।
राजधानी रायपुर से सटे नकटी गांव में विधायकों की कालोनी बनाए जाने के नाम पर 85 घरों को बेदखल करने की कोशिश की गई, लेकिन भारी विरोध के कारण ही यह कार्रवाई टल सकी थी। हालांकि यह कहना मुश्किल है कि सरकारी अमला वहां फिर कब पहुंच जाए?
यही हाल तूता माना का है, जहां सरकार ने फिल्म सिटी प्रस्तावित कर रखी है और जिस कंपनी को इसका ठेका दिया गया है, उसके कारिंदे ग्रामीणों को धमकाते नजर आ रहे हैं।
यह कैसी उलटबांसी है कि गौरेला में बेबस दलितों, आदिवासियों को साल के पेड़ों की कथित अवैध कटाई के नाम पर बेदखल कर दिया जा रहा है, और हसदेव से लेकर तूता-माना तक हजारों पेड़ों के काटने की सरकारी तैयारी है!
गौरेला की घटना बता रही है कि कैसे सरकार अपनी जवाबदेही से दूर होती जा रही है। बेशक, यदि अवैध तरीके से लोग रहे हैं, तो उन पर किसी भी कार्रवाई से पहले पूरी जांच तो हो। क्या उन्हें वैकल्पिक व्यवस्था नहीं मिलनी चाहिए? क्या जवाबदेहियां तय नहीं होनी चाहिए?
वाकई यह दुखद है कि चुनी हुई सरकारें अपने ही नागरिकों के साथ लगातार दोयम दर्जे का व्यवहार कर रही हैं। अपनी जमीन और घर से बेदखल होने का क्या दर्द होता है, ये वही लोग बता सकते हैं, जिन्होंने अपनी मेहनत और पसीने से इसे बनाया है।
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