अब राजनीति का नया रूप आ गया है। टेस्टिंग भी हो चुकी है और वह सफल रही है। बीजेपी अब एक नेशनल ब्रांड के रूप में स्थापित हो चुकी है। पॉलिटिक्स के इस नए एडिशन में सत्ता पाने के लिए संवैधानिक संस्थाओं के दुरुपयोग की अनिवार्यता जैसे सिद्ध हो गई है। बेहयाई और फरेब, बदनीयती और पाखंड, अनीति और हिपोक्रेसी अब राजनीति में स्वीकार्य होते जा रहे हैं। जब खुफिया एजेंसियों के रिटायर्ड प्रमुखों को किसी खास राज्य के राजभवन में भेज दिया जाता है और प्रिय नौकरशाहों को चुनाव आयोग में उच्च पद दे दिया जाता है, तब राजनीति का दायरा अलग, बड़ा और धूमिल होना स्वाभाविक है।
भारतीय राजनीति के रंगमंच पर इस बार जो पर्दा उठा है, उसकी पटकथा कुछ अलग ही है। पुराने किरदार फीके पड़ रहे हैं, नए चेहरे तेज रोशनी में आ रहे हैं और सत्ता का संतुलन चुपचाप, लेकिन निर्णायक ढंग से बदल रहा है।
करीब आधी सदी बाद एक ऐतिहासिक मोड़ सामने है, अब देश के किसी भी राज्य में अब वामपंथ की सरकार नहीं बची। यह सिर्फ एक चुनावी नतीजा नहीं, बल्कि विचारधाराओं के बदलते मौसम का संकेत है। जो धाराएँ कभी मुख्यधारा थीं, वे अब हाशिए पर खड़ी दिख रही हैं।
पश्चिम बंगाल की कहानी सबसे दिलचस्प मोड़ लेकर आई है। 42 लोकसभा सीटों वाला यह राज्य अब राष्ट्रीय राजनीति का गेम-चेंजर बन सकता है। यहां बीजेपी का उभार सिर्फ एक राज्य की जीत नहीं, बल्कि 2029 के लिए एनडीए के बहुमत की नींव जैसा है। इसका असर ओडिशा, झारखंड और बिहार तक महसूस होगा।
इस हार के साथ ममता बनर्जी की राष्ट्रीय विपक्ष में पकड़ ढीली पड़ती दिख रही है। टीएमसी, डीएमके और वाम दल – तीनों की सियासी जमीन खिसक गई है। विपक्षी गठबंधन अब आत्ममंथन की स्थिति में है, जहां पुनर्गठन मजबूरी बनता जा रहा है।
तमिलनाडु में राजनीति ने फिल्मी ट्विस्ट ले लिया है। थलापति विजय की पार्टी टीवीके ने ऐसा धमाका किया है कि 60 साल पुराना द्रविड़ वर्चस्व दरक गया। डीएमके और एआईएडीएमके जैसी दिग्गज पार्टियों के बीच एक नया, गैर-परिवारवादी चेहरा उभरना इस बात का संकेत है कि जनता अब विकल्प तलाश रही है, और वह विकल्प अब सामने है।
वहीं, केरल में तस्वीर थोड़ी उलट है। यहां कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ की बढ़त ने पार्टी के लिए उम्मीद की किरण जगाई है। वामपंथी चक्र का टूटना और कांग्रेस का उभार खास इसलिए है, क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस कमजोर दिख रही थी। केरल ने उसे एक नई सांस दे दी है।
इन सभी राज्यों की अहमियत सिर्फ विधानसभा तक सीमित नहीं है। कुल मिलाकर 51 राज्यसभा सीटें इन्हीं राज्यों से आती हैं। आने वाले राज्यसभा चुनावों में एनडीए अगर दो-तिहाई बहुमत के करीब पहुंचता है, तो संवैधानिक बदलावों का रास्ता काफी हद तक आसान हो सकता है , चाहे वह डिलिमिटेशन हो या यूनिफॉर्म सिविल कोड जैसे बड़े मुद्दे।
कुल मिलाकर, यह सिर्फ चुनाव नहीं था ; यह सत्ता के समीकरणों का री-ड्राफ्ट है। भारत की राजनीति अब पुराने फॉर्मूलों से नहीं चलेगी। नए चेहरे, नई रणनीतियां और नये मुद्दे, यही आने वाले समय की असली पहचान होंगे।
चुनाव नतीजों ने इंडिया गठबंधन को एक असहज मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां उसे तय करना होगा कि वह ढीला-ढाला मंच बना रहेगा या एक सुसंगठित राजनीतिक ताकत बनेगा। विपक्षी एकता का नैरेटिव जमीन पर उतना असरदार नहीं रहा। कई राज्यों में सहयोगी दल आपस में ही कमजोर हुए हैं, जिससे गठबंधन की सामूहिक ताकत घटती दिख रही है। पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में क्षेत्रीय दलों के झटकों का सीधा असर पूरे गठबंधन की विश्वसनीयता परपड़ा है।
केरल में बेहतर प्रदर्शन से कांग्रेस को मनोवैज्ञानिक बढ़त मिली है। इससे पार्टी को यह कहने का मौका मिलेगा कि वह अभी भी विपक्ष की धुरी है, लेकिन बड़े राज्यों में कांग्रेस खुद निर्णायक ताकत नहीं बन पाई। वह अभी भी कई जगह क्षेत्रीय दलों पर निर्भर दिखती है। इंडिया गठबंधन की असली दिक्कत सीटें नहीं, बल्कि नेतृत्व और भरोसे की कमी है। ममता बनर्जी जैसी नेताओं की कमजोर होती स्थिति से गठबंधन का पावर-बैलेंस बिगड़ेगा। तमिलनाडु में नई ताकत के उभरने से पुराने समीकरण टूटेंगे।
यह चुनाव इंडिया गठबंधन के लिए एक वेक-अप कॉल है। गठबंधन को अब रीब्रांडिंग और री-स्ट्रक्चरिंग दोनों करनी पड़ेगी और एक मजबूत नेतृत्व संरचना बनानी होगी। साझा न्यूनतम कार्यक्रम को जमीन पर उतारना होगा—सिर्फ बयानबाजी से काम नहीं चलेगा। कांग्रेस को थोड़ी ऑक्सीजन जरूर मिली है, लेकिन आईसीयू से बाहर आने के लिए अभी लंबा इलाज बाकी है। अगर विपक्ष ने अब भी रणनीति नहीं बदली, तो 2029 की लड़ाई में वह सिर्फ दर्शक बनकर रह सकता है।
अगर पांच विधानसभा चुनावों के नतीजों को भारत की राजनीति का बैरोमीटर माना जाए, तो निश्चित रूप से देश की राजनीति बदल चुकी है। सिर्फ राजनीति ही नहीं, चुनाव लड़ने के रंग-ढंग, चुनावी रणनीतियां और अवसरवादिता के पैमाने भी बदल चुके हैं। ऐसा नहीं है कि पहले सभी पार्टियों में पूरी तरह नैतिकता और सिद्धांतों का बोलबाला था, लेकिन अब पैमाने बदल गए हैं। अब कुछ राजनीतिक पार्टियां तो सिद्धांतों को किताबों के लायक भी नहीं मानतीं—आदर्श जैसे कूड़ेदान में डाल दिए गए हों।
अब चुनाव लड़ने के लिए सबसे जरूरी है बेहिसाब धन। तमिलनाडु के एक नेता से चर्चा के दौरान उन्होंने कहा कि “आपके हिंदी बेल्ट के चुनाव भी कोई चुनाव होते हैं! हमारे यहां तो एक लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए 500 से 1000 ‘खोके’ चाहिए, और विधानसभा के लिए कम से कम 50 से 100 खोके!” उनकी बात सुनकर मैं चौंक गया,
‘खोके’ मतलब करोड़! अगर लोकसभा चुनाव जीतने के लिए 500 से 1000 करोड़ रुपये चाहिए, तो फिर कमाई कितनी और कैसी होती होगी?
2026 के सबक यह हैं कि चुनाव जीतने के लिए छह मुख्य शक्तियां जरूरी हो गई हैं। सबसे बड़ा फैक्टर है मनी पावर। अभियान, विज्ञापन, वोटर आउटरीच, गिफ्ट्स/स्कीम्स और बूथ मैनेजमेंट में भारी खर्च होता है। एडीआर रिपोर्ट्स के अनुसार करोड़पति उम्मीदवारों की जीत की संभावना बहुत ज्यादा रहती है। पैसे से विजिबिलिटी, प्रचार और वेलफेयर स्कीम्स चलाना आसान होता है, लेकिन केवल पैसे से चुनाव नहीं जीते जा सकते।
बंगाल में टीएमसी और तमिलनाडु में डीएमके के पास पैसा था, फिर भी वे हारे, क्योंकि सामने वाले के पास उनसे ज्यादा मनी पावर था। मनी के साथ ही मसल पावर भी अनिवार्य हो गया है, खासकर ग्रामीण और संवेदनशील इलाकों में। क्रिमिनल बैकग्राउंड वाले उम्मीदवारों की संख्या ऊंची बनी हुई है। चुनाव आयोग की सख्ती के कारण बूथ कैप्चरिंग कम हुई है, लेकिन डराने-धमकाने, स्थानीय गुंडों और जातीय/समुदायिक दबदबे की भूमिका बनी हुई है।
ऑर्गनाइजेशनल पावर बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत के रूप में फिर साबित हुई। बूथ-लेवल वर्कर्स, सोशल मीडिया सेल, डेटा एनालिटिक्स और ग्राउंड नेटवर्क मजबूत रहे।
पॉलिटिकल इन्फ्लुएंस और अलायंस पावर का महत्व भी बढ़ा है। गठबंधन, सीट-शेयरिंग और पोस्ट-पोल सपोर्ट अब चुनाव के जरूरी अंग बन गए हैं। इंडिया गठबंधन को तवज्जो न देकर टीएमसी बंगाल में अकेली लड़ी और हार गई। वहीं बीजेपी, एनडीए में बड़े भाई की भूमिका निभाते हुए छोटे दलों को मैनेज करती दिखी।
नैरेटिव और परफॉर्मेंस पावर भी बड़े काम का होता है। क्षेत्रीय दलों में स्थानीय अस्मिता बार बार आती है -कहीं मराठी अस्मिता, कहीं बंगाली अस्मिता, कहीं गुजराती तो कहीं तमिल अस्मिता! इतिहास में क्या कभी देखा या सुना कि राष्ट्रीय पार्टी के निर्देश पर उसके तमाम नेता मांस, मछली और चिकन खा रहे हैं, डाइनिंग टेबल पर हड्डियां तोड़ रहे हैं, बोटियां चबा रहे हैं और सोशल मीडिया में उसकी तस्वीरें वायरल करवाने के लिए प्रयास कर रहे हैं! कोई पार्टी इस स्तर पर भी जा सकती है, कभी सोचा था क्या?
मीडिया और मिसइन्फॉर्मेशन पावर का इस्तेमाल भी बढ़ा है। अब चुनाव जीतने के लिए सोशल मीडिया, न्यूज चैनल और सूचना पर नियंत्रण अहम हो गया है। बंगाल और असम में बीजेपी की जीत मनी, मसल और ऑर्गनाइजेशनल ताकत के साथ-साथ नए नैरेटिव और लोकल इन्फ्लुएंस के संयोजन का परिणाम रही। वहीं तमिलनाडु में टीवीके का उदय स्टार पावर, युवा वोट, नया नैरेटिव और संसाधनों के मेल का उदाहरण है।
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