Calcutta High Court ने CISF के एक कांस्टेबल को मोबाइल फोन इस्तेमाल करने के मामले में नौकरी से निकालने के फैसले को पूरी तरह रद्द कर दिया है। कोर्ट ने सख्त लफ्जों में कहा कि यूनिफॉर्म वाली फोर्स में सजा गलती के हिसाब से होनी चाहिए, न कि पूरी जिंदगी बर्बाद करने वाली। ये फैसला 6 फरवरी 2026 को जस्टिस अनन्या बंद्योपाध्याय ने सुनाया
क्या था पूरा मामला
CISF कांस्टेबल पर आरोप था कि नाइट शिफ्ट में ड्यूटी के दौरान मोबाइल फोन पर बात की और जब उनके सीनियर ने फोन मांगा तो देने से इनकार कर दिया। विभाग ने इसे अनुशासनहीनता माना और उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया। अपील और रिवीजन में भी फैसला नहीं बदला। कांस्टेबल ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की। कोर्ट ने सुनवाई के बाद कहा ‘मोबाइल फोन इस्तेमाल गलत है और इसमें सुधार जरूरी है, लेकिन ये इतनी गंभीर गलती नहीं कि करियर खत्म कर दिया जाए।
लोरत ने ये भी कहा की ये ‘कैरियर एनिहिलेशन” (पूरी जिंदगी की तबाही) जैसा है जो गलत है। कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ न भ्रष्टाचार, न हिंसा, न देश की सुरक्षा को खतरा, न कोई ऑपरेशनल धोखा। ये सिर्फ अनुशासन की छोटी कमी है, नैतिक पतन या बड़ा अपराध नहीं। सजा गलती के अनुपात में होनी चाहिए। छोटी गलती पर ज्यादा सख्त सजा देना संविधान के खिलाफ है।
विभाग ने पुरानी छोटी सजाओं को जोड़कर बड़ा बनाया जो गलत तरीका है। अपील और रिवीजन अथॉरिटी ने बिना सोचे फैसला कन्फर्म किया। कोर्ट ने कहा ‘सजा सुधारने वाली होनी चाहिए, दंड देने वाली नहीं। अनुशासन जरूरी है, लेकिन निष्पक्षता, इंसानियत और कारण से निर्देशित होनी चाहिए।’ कोर्ट ने बर्खास्तगी रद्द कर दी और कांस्टेबल को राहत दी।
ये फैसला सुरक्षा बलों के हजारों कर्मचारियों के लिए बड़ा संदेश है। कोर्ट ने साफ किया कि अनुशासन फोर्स की रीढ़ है, लेकिन सजा देते वक्त संतुलन, इंसाफ और इंसानियत का ध्यान रखना जरूरी है। छोटी गलती पर पूरी सेवा खत्म करना ‘एडमिनिस्ट्रेटिव एक्सट्रीमिज्म’ है, जो संविधान बर्दाश्त नहीं करता।










