भिलाई। छत्तीसगढ़ मसीह विकास समिति की ओर से 7 सितंबर को छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य कानून को लेकर जागरूकता शिविर आयोजित किया गया। कार्यक्रम में कानून के प्रावधानों, इसके प्रभाव और अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों पर चर्चा की गई।
शिविर में वक्ताओं ने आरोप लगाया कि इस कानून का इस्तेमाल राज्य में अल्पसंख्यकों, विशेषकर ईसाई समुदाय को निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि किसी भी तरह के उत्पीड़न की स्थिति में लोगों को कानूनी और संवैधानिक तरीके से अपने अधिकारों के लिए आवाज उठानी चाहिए।
संविधान और लोकतांत्रिक अधिकारों पर जोर
कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि अल्पसंख्यकों के साथ-साथ दलितों, आदिवासियों, महिलाओं, श्रमिकों और अन्य वंचित वर्गों के अधिकारों की रक्षा के लिए मिलकर काम करने की जरूरत है। उन्होंने संविधान, धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा को महत्वपूर्ण बताया।
शिविर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और उसके विचारों को लेकर भी वक्ताओं ने अपनी राय रखी। वक्ताओं ने आरएसएस के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि इससे समाज में विभाजन और नफरत को बढ़ावा मिलता है। भाजपा और संघ परिवार को लेकर भी वक्ताओं ने कई राजनीतिक आरोप लगाए।
इतिहास और राजनीति पर भी हुई चर्चा
कार्यक्रम में आरएसएस के पुराने विचारों और संगठन के इतिहास का भी उल्लेख किया गया। वक्ताओं ने आरोप लगाया कि आरएसएस की विचारधारा भारतीय संविधान के बजाय मनुस्मृति आधारित व्यवस्था को बढ़ावा देती रही है। हालांकि, ये सभी बातें कार्यक्रम में शामिल वक्ताओं के विचार और आरोप थे।
वक्ताओं ने कहा कि अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा का सवाल केवल किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संविधान, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था से जुड़ा विषय है।
ये लोग रहे मौजूद
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि डॉ. गिरीश थे। जन संघर्ष मोर्चा छत्तीसगढ़ के संयोजक प्रसाद राव ने अध्यक्षता की। बिशप अखिलेश एडगर, एडवोकेट दिवेश, जाति उन्मूलन आंदोलन (CAM) के अखिल भारतीय संयोजक कॉमरेड तुहिन और आदिवासी भारत महासभा (ABM) के राज्य संयोजक कॉमरेड सौरा ने विचार रखे।
कार्यक्रम का संचालन पास्टर रमेश कश्यप ने किया, जबकि पास्टर चोआराम ने आभार व्यक्त किया। समिति के पास्टरों और सदस्यों ने शिविर में सक्रिय भागीदारी की।










