बस्तर (जगदलपुर) पुलिस (Bastar Police)अधीक्षक कार्यालय में उजागर हुए लगभग ₹2 करोड़ रुपये के सुनियोजित तकनीकी वेतन घोटाले को लेकर भाजपा नेता एवं अधिवक्ता नरेश चंद्र गुप्ता ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को पत्र लिखकर सीबीआई, कैग और एफआईयू-आईएनडी से विस्तृत जांच कराने की मांग की है। श्री गुप्ता ने आशंका जताई है कि गबन की गई शासकीय राशि को शेयर बाजार और क्रिप्टोकरेंसी के माध्यम से राज्य के बाहर संदिग्ध डिजिटल संपत्तियों में निवेश किया गया है।
उल्लेखनीय है कि यह मामला जून-जुलाई 2026 में सामने आया था, जब बस्तर एसपी कार्यालय की वेतन शाखा में गिरीश राय, राजकुमार कतलमऔर हेमंत मैथ्यू को गिरफ्तार किया गया था।
एआई-असिस्टेड ऑडिट और कैग की आपत्ति के बाद घोटाले का पर्दाफाश हुआ था। इसके कुछ दिन बाद ही नरेश चंद्र गुप्ता ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को ज्ञापन भेजकर सीबीआई, कैग तथा वित्तीय खुफिया इकाई से जांच कराने की मांग की थी, जिसकी खबर 13 जुलाई 2026 को प्रकाशित हुई थी।
श्री गुप्ता ने अपने बयान में कहा कि यह मामला साधारण भ्रष्टाचार या रिश्वतखोरी तक सीमित नहीं है, बल्कि शासकीय धन का सुनियोजित तकनीकी और संस्थागत गबन है।
उन्होंने आरोप लगाया कि बस्तर जैसे नक्सल प्रभावित संवेदनशील क्षेत्र में पुलिस और प्रशासन को वित्तीय आहरण तथा आकस्मिक व्यय में मिली विशेष छूट का दुरुपयोग कर यह घोटाला संभव हुआ।
उनकी आशंका है कि यही तरीका बस्तर संभाग के अन्य जिलों (दंतेवाड़ा, सुकमा, बीजापुर, कांकेर, नारायणपुर, कोंडागांव) में भी वर्षों से चल रहा हो सकता है।
श्री गुप्ता ने कहा कि राज्य पुलिस या आर्थिक अपराध शाखा के पास आधुनिक फॉरेंसिक अकाउंटिंग, तकनीकी ऑडिटिंग और क्रिप्टो लेन-देन को ट्रैक करने की विशेषज्ञता नहीं है। इसलिए उन्होंने सीबीआई की आर्थिक अपराध शाखा को पूरे बस्तर संभाग के पुलिस कार्यालयों की 100 प्रतिशत जांच सौंपने की मांग की है।
गबन की राशि राज्य के बाहर निवेश की गई है, इसलिए अंतर-राज्यीय तकनीकी जांच जरूरी है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि जांच का दायरा केवल गिरफ्तार आरोपियों गिरीश राय, राजकुमार कतलम और हेमंत मैथ्यू तक सीमित न रखकर वरिष्ठ अधिकारियों तक बढ़ाया जाए।
उन्होंने कहा कि नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) से बस्तर सहित राज्य के अन्य बड़े आहरण विभागों (शिक्षा, स्वास्थ्य, लोक निर्माण आदि) में पिछले 5 से 7 वर्षों के वेतन आहरण का विशेष फॉरेंसिक ऑडिट (टेस्ट बेसिस) कराया जाए तथा वित्तीय खुफिया इकाई (एफआईयू-आईएनडी) से संदिग्ध वित्तीय लेन-देन और मनी लॉन्ड्रिंग के पैटर्न की जांच करवाई जाए।
श्री गुप्ता ने कहा कि जांच केवल इन तीन लिपिकों-आरक्षकों तक सीमित न रखकर आहरण एवं संवितरण अधिकारियों (डीडीओ) तथा जिला कोषालय अधिकारियों की व्यक्तिगत वित्तीय जवाबदेही भी तय की जाए, क्योंकि दो वर्षों तक संदिग्ध बिलों को बिना सत्यापन के पारित करना पर्यवेक्षकीय लापरवाही है।
भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए उन्होंने आईएफएमएस पोर्टल में ‘रेड फ्लैग’ या ऑटो-ब्लॉक सिस्टम जोड़ने की भी मांग की है, ताकि बिना सक्षम प्राधिकारी के डिजिटल आदेश के वेतन या भत्तों में किसी भी बदलाव पर बिल स्वतः रुक जाए।
उन्होंने चेतावनी दी कि अगर नक्सल संवेदनशीलता की आड़ में कानून के रखवाले ही संगठित वित्तीय अपराध में लिप्त पाए गए और वरिष्ठ अधिकारी जांच से बच निकले, तो जनता का व्यवस्था पर से विश्वास उठ जाएगा।
श्री गुप्ता ने शासन से तत्काल कड़े और दंडात्मक निर्देश जारी करने की अपील की है।










