लेंस डेस्क। अरावली पहाडि़यों की 100 मीटर ऊंचाई वाली परिभाषा को लेकर मचे घमासान के बाद आखिरकार केंद्र सरकार की तरफ से सफाई आई है। पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने रविवार को सुंदरबन टाइगर रिजर्व में एक मीटिंग के बाद साफ किया कि कोर्ट से स्वीकृत इस नई परिभाषा के चलते अरावली के नब्बे फीसदी से ज़्यादा हिस्से को संरक्षित श्रेणी में शामिल किया जाएगा, जिससे सुरक्षा के इंतजाम और मजबूत होंगे।
मंत्री ने बताया कि अरावली की पहाड़ियों और पूरी पर्वत श्रृंखला की परिभाषा अब सभी संबंधित राज्यों में एकसमान कर दी गई है ताकि किसी तरह की उलझन या गलत इस्तेमाल की गुंजाइश न रहे। पहले अलग अलग नियमों की वजह से पहाड़ियों के नीचे वाले हिस्सों तक खनन की छूट मिल जाती थी।
उन्होंने जोर देकर कहा कि 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को खनन के लिए खुला मानना गलत होगा क्योंकि प्रतिबंध पूरी पहाड़ी व्यवस्था और इससे जुड़े सभी इलाकों पर लागू होता है न कि सिर्फ ऊपरी चोटी तक। जब तक अरावली के पूरे क्षेत्र के लिए खनन प्रबंधन की व्यापक योजना नहीं बन जाती तब तक कोई नया लाइसेंस नहीं जारी होगा।
दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों की एक नई परिभाषा को हरी झंडी दे दी है। अब सिर्फ उन्हीं हिस्से को कानूनी तौर पर ‘अरावली पहाड़ियां’ माना जाएगा, जो अपने आसपास के इलाके से कम से कम 100 मीटर ऊंचे हों।
गौरतलब है कि 20 नवंबर को एक पीठ ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की एक समिति द्वारा प्रस्तुत सिफ़ारिशों को स्वीकार कर लिया था, जिसमें उत्तर-पश्चिम भारत में फैली 692 किलोमीटर लंबी पर्वत श्रृंखला की परिभाषा को मानकीकृत करने की मांग की गई थी।
राजस्थान में अरावली का मसला अब पूरी तरह राजनीतिक रंग ले चुका है। इस बीच राजस्थान में भाजपा के बड़े नेता राजेंद्र राठौड़ ने पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के उस बयान को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि नई परिभाषा से राज्य की नब्बे प्रतिशत पहाड़ियां बर्बाद हो जाएंगी। राठौड़ ने गहलोत के सेव अरावली मुहिम पर हमला बोलते हुए कहा कि अरावली का करीब पच्चीस फीसदी हिस्सा पहले से ही वन्यजीव अभयारण्यों राष्ट्रीय पार्कों और संरक्षित जंगलों में शामिल है जहां खनन पर पूरी तरह रोक है।
पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने मई 2024 में अवैध खनन के मामलों की सुनवाई के दौरान एक कमेटी गठित की थी जिसमें राजस्थान हरियाणा गुजरात और दिल्ली के प्रतिनिधि थे। कमेटी को पता चला कि सिर्फ राजस्थान में साल दो हजार छह से स्पष्ट परिभाषा लागू थी जिसे अब बाकी राज्य भी मानने को तैयार हो गए हैं।
राठौड़ ने आगे कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि जब तक इंडियन काउंसिल ऑफ फॉरेस्टरी रिसर्च एंड एजुकेशन द्वारा अरावली की विस्तृत वैज्ञानिक मैपिंग और टिकाऊ खनन प्रबंधन योजना तैयार नहीं हो जाती तब तक कोई नया खनन लाइसेंस नहीं दिया जा सकता। इसलिए अरावली के खत्म होने की आशंका बिल्कुल बेबुनियाद है।










