‘कोयला घोटाला मामले में सीबीआई अभियोजन पक्ष आरोपों को साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा।’ कथित कोयला घोटाले मामले में कोर्ट की यह टिप्पणी उन आरोपों पर करारा तमाचा है, जिसे मौजूदा सरकार और तब के विपक्ष ने सीधे ‘घोटाला’ कहकर जनता के मन में गुस्सा भर दिया था। नतीजा यह हुआ कि 2014 में केंद्र की सरकार बदल गई।
मुद्दा यह यह नहीं है कि नई सरकार कैसे आई। सवाल ये है कि लोकतंत्र ने इसकी क्या कीमत चुकाई ? विपक्ष ने कैग रिपोर्ट जिसमें घोटाले की बात नहीं बल्कि संभावित नुकसान का जिक्र था। उसी अंतर को घोटाला बताकर हल्ला मचाया और जनता का मानस बदल दिया। आंख मूंदकर जनता ने भरोसा जताया और सत्ता सौंप दी।
दिल्ली के राउज एवेन्यू कोर्ट की विशेष सीबीआई जज सुनीना शर्मा ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। उन्होंने पूर्व सांसद विजय दर्डा, उनके बेटे देवेंद्र दर्डा, पूर्व कोयला सचिव एचसी गुप्ता, एमआर आईरन एंड स्टील प्राइवेट लिमिटेड कंपनी और उसके डायरेक्टर मनोज कुमार जयसवाल को सभी आरोपों से बरी कर दिया।
कैग के तत्कालीन प्रमुख विनोद राय जिनकी रिपोर्ट पर यह सब शुरू हुआ, उन्हें बवंडर खड़ा करने का ईनाम मिला। बाद में वह मोदी सरकार में बैंक्स बोर्ड ब्यूरो के चेयरमैन बने।
2जी स्पेक्ट्रम मामले में भी यही हुआ था। विशेष अदालत ने पूर्व टेलीकॉम मंत्री ए राजा, कनिमोझी और सभी आरोपियों को बरी कर चुकी है। कोर्ट की टिप्पणी थी कि कुछ लोगों ने चुनिंदा तथ्यों को जोड़कर और उन्हें बहुत बढ़ा-चढ़ाकर घोटाला बना दिया। इन मामलों में सीबीआई को अदालतों ने कई बार लताड़ लगाई है।
भारत जैसे बड़े लोकतंत्र में मीडिया, विपक्ष और जांच एजेंसियों की जिम्मेदारी बहुत बड़ी है। अगर मामलों पर भ्रमित कर जनता का मानस बदला जाता रहा, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों की हत्या से कम नहीं। और छींटे विपक्ष के दामन पर भी पड़ेंगे।
राजनीतिक फायदे के लिए जनता की भावनाओं से खेला जाने वाला खेल बंद होना चाहिए। अदालतें अंतिम सत्य बताती हैं। जब वे कहती हैं कि सीबीआई असफल रही, तो हमें सोचना चाहिए कि पहले क्यों इतना बवंडर मचाया गया। और अब जब सच सामने है, तो उसका सामना करने से बचा जा रहा है।











