रायपुर। झीरम (Jhiram) घाटी नरसंहार मामले में जगदलपुर की विशेष NIA अदालत के फैसले के बाद छत्तीसगढ़ में सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। अदालत ने मामले में बचे हुए सभी 10 आरोपियों को दोषी ठहराया है। फैसले के बाद पूर्व उप मुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव के बयान ने एक बार फिर झीरम कांड के दौरान सुरक्षा व्यवस्था और खुफिया इनपुट को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
वहीं, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत ने कहा है कि केवल हमले में शामिल लोगों को सजा मिलने से न्याय पूरा नहीं होगा, बल्कि कथित राजनीतिक साजिश के पीछे मौजूद लोगों तक जांच पहुंचनी चाहिए।
टीएस सिंहदेव ने कहा कि वह तब तक संतुष्ट नहीं होंगे, जब तक झीरम घटना की जांच उन लोगों तक नहीं पहुंचती जो इस घटना के लिए जिम्मेदार थे। उन्होंने बताया कि तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल ने उन्हें बस्तर संभाग के कार्यक्रम का प्रभारी बनाया था। कार्यक्रम की जानकारी उन्होंने तत्कालीन DGP, IG और पुलिस विभाग के अन्य अधिकारियों को दी थी।
‘पहले दो दिन पूरी सुरक्षा मिली, तीसरे दिन रास्ते में एक भी जवान नहीं था’
टीएस सिंहदेव के मुताबिक यह बस्तर संभाग में करीब छह-सात दिनों का एक ही कार्यक्रम था। उन्होंने कहा कि जब काफिला पहले दिन बीजापुर गया, तब पूरी सुरक्षा व्यवस्था मौजूद थी। दूसरे दिन दंतेवाड़ा, बकावंड और अन्य स्थानों पर भी सुरक्षा बल तैनात थे।
पूर्व उप मुख्यमंत्री ने सवाल उठाया कि तीसरे दिन जब काफिला सुकमा की ओर जा रहा था, तो रास्ते में उन्हें एक भी पुलिस या पैरामिलिट्री जवान नजर क्यों नहीं आया।
उन्होंने कहा कि यह अलग-अलग कार्यक्रम नहीं थे, बल्कि एक ही कार्यक्रम के अलग-अलग चरण थे और प्रशासन तथा पुलिस विभाग को पूरे कार्यक्रम की जानकारी पहले से दी गई थी। ऐसे में संवेदनशील इलाके में सुरक्षा बलों की गैरमौजूदगी को लेकर उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर ऐसा कैसे हुआ।
कांग्रेस नेता ने झीरम हमले के दौरान सुरक्षा व्यवस्था को लेकर कई सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि हमला करीब 45 मिनट से एक घंटे तक चलता रहा। ऐसे में सवाल है कि उस दौरान पुलिस फोर्स और पैरामिलिट्री फोर्स कहां थी।
उन्होंने कहा कि जब तक इन सवालों के जवाब सामने नहीं आते, तब तक वह झीरम मामले को लेकर संतुष्ट नहीं होंगे।
महंत बोले- ‘पूर्व उप मुख्यमंत्री के बयान ने पुराने जख्म खोल दिए’
टीएस सिंहदेव के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत ने कहा कि पूर्व उप मुख्यमंत्री के बयान ने झीरम घाटी के पुराने जख्म फिर खोल दिए हैं।
डॉ. महंत ने झीरम घाटी नरसंहार को महज नक्सली हमला नहीं, बल्कि लोकतंत्र के इतिहास की बड़ी राजनीतिक आपराधिक साजिश बताया। उन्होंने कहा कि इस हमले में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं विद्याचरण शुक्ल, नंदकुमार पटेल, महेंद्र कर्मा, उदय मुदलियार समेत 30 से अधिक जवानों और कार्यकर्ताओं की शहादत हुई थी।
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि क्षेत्र में नक्सलियों की गतिविधियों को लेकर खुफिया इनपुट मौजूद होने के बावजूद सुरक्षा में चूक कैसे हुई, इसकी जांच होनी चाहिए।
उन्होंने दावा किया कि इंटेलिजेंस ब्यूरो की ओर से क्षेत्र में नक्सलियों की हलचल को लेकर लिखित सूचना दी गई थी। इसके बावजूद जगदलपुर से सुकमा जाने वाले अति-संवेदनशील मार्ग पर पर्याप्त सुरक्षा बल क्यों नहीं था, यह बड़ा सवाल है।
डॉ. महंत ने कहा कि कांग्रेस की ओर से काफिले के प्रस्थान, मार्ग और उसमें शामिल शीर्ष नेताओं की जानकारी DGP से लेकर स्थानीय SP तक को दी गई थी। इसके बावजूद पूरे रूट को सुरक्षा-विहीन किसके आदेश पर छोड़ा गया, इसकी जांच जरूरी है।
उन्होंने कहा कि झीरम मामले में अदालत के फैसले से जमीनी स्तर पर आरोपियों के खिलाफ न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ी है, लेकिन कथित ‘आपराधिक राजनीतिक षड्यंत्र’ की तह तक पहुंचना अभी बाकी है।
नेता प्रतिपक्ष ने मांग की कि झीरम काफिले की सुरक्षा में हुई चूक, सुरक्षा बलों की तैनाती और कथित IB अलर्ट की अनदेखी से जुड़े सभी पहलुओं की निष्पक्ष और व्यापक जांच हो।








