–अनिल जैन,वरिष्ठ पत्रकार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के मंत्री तथा उनकी पार्टी के नेता तो लंबे समय से विपक्षी दलों को देशद्रोही, आतंकवादियों का समर्थक, चीन का एजेंट आदि बताते आ रहे हैं। इस समय मतदाता सूची और चुनाव में धांधली के गंभीर आरोपों को लेकर चल विपक्ष के आंदोलन को भी विदेशी साजिश बता कर देश में अराजकता फैलाने का आरोप प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी की ओर से लगाया जा रहा है, जिसमें मीडिया का भी एक हिस्सा उनका साथ दे रहा है। इस आरोप के जवाब में अब विपक्ष की ओर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भी प्रधानमंत्री मोदी पर तीखा हमला करते हुए कहा है, ‘आप विदेशी मदद से प्रधानमंत्री बने हैं और विदेशी मदद से ही प्रधानमंत्री बने हुए हैं। आपकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह विदेशी शक्तियों के नियंत्रण में हैं और विदेशी सोशल मीडिया पूरी तरह आपके साथ खड़ा है।’
प्रधानमंत्री मोदी पर राहुल गांधी का यह अब तक का सबसे तीखा और बेहद गंभीर आरोप है। भारत के किसी प्रधानमंत्री पर किसी विपक्षी नेता की ओर से ऐसा आरोप नहीं लगा था। अलबत्ता ऐसा आरोप मोरारजी देसाई पर जरूर लगा था लेकिन आरोप लगाने वाला अमेरिकी पत्रकार सेमोर हर्श था। उसने अपनी किताब में दावा किया था कि 1971 में भारत-पाकिस्तान युदृध के समय मोरारजी देसाई अमेरिका खुफिया एजेंसी सीआईए के संपर्क में थे और उन्हे सालाना 20 हजार डॉलर मिलते थे। अमेरिकी पत्रकार के इस दावे पर भारत में किसी ने यकीन नहीं किया था। मोरारजी देसाई ने भी इस दावे को निराधार बताते हुए सेमूर हर्श पर मानहानि का मुकदमा दायर किया था, जिसे शिकागो की एक जूरी ने 1989 में तकनीकी आधार पर खारिज कर दिया था।
बहरहाल, राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री पर गंभीर आरोप लगाने के साथ ही उन्हें इन आरोपों पर खुली बहस के लिए भी ललकारा है। उन्होंने कहा है कि वे मोदी को चुनौती देते हैं कि अगर उनमें हिम्मत है तो वे किसी भी मंच पर, किसी भी समय बहस के लिए आ जाएं। राहुल ने यह भी पेशकश की है कि बहस के लिए जज भी आप अपनी पसंद का चुन लीजिए, चाहें तो मोहन भागवत को जज बना दीजिए। इसके साथ ही राहुल ने मोदी को संबोधित करते हुए यह भी कहा है, ‘आप बहस के लिए नहीं आएंगे, क्योंकि मैं आपके बारे में जानता हूं कि आप बहस से डरते हैं।’
यह दिलचस्प है कि पिछले डेढ दशक से पूरी भाजपा, उसका इको सिस्टम और उसके प्रचारतंत्र का हिस्सा बन चुका टेलीविजन मीडिया जिन नरेंद्र मोदी को आला दर्जे का वक्ता यानी भाषणबाज बताते हुए सार्वजनिक संवाद के मामले में राहुल को बेहद कमजोर बताते हुए उनकी खिल्ली उड़ाता आ रहा है, उन्हीं नरेंद्र मोदी को वे ही राहुल गांधी सार्वजनिक मंच पर बहस के लिए ललकार रहे हैं कि हिम्मत है तो आइए।
राहुल गांधी द्वारा ट्वीट के जरिए लगाए गए इन आरोपों से पहले मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ इंडिया गठबंधन, नागरिक संगठनों और छात्र संगठनों द्वारा पारित जन महाभियोग और उसके बाद दिल्ली के रामलीला मैदान पर ‘वोट चोरी’ के खिलाफ आयोजित विशाल रैली का भी यही संदेश है कि चुनाव में धांधली और एसआईआर के नाम पर मतदाता सूची में हो रही गड़बड़ियां ही अब विपक्ष का मुख्य मुद्दा है और वह इस पर पीछे हटने वाला नहीं है।
दोनों कार्यक्रमों में साफ कहा गया कि 2024 का आम चुनाव “चुरा” लिया गया, इसलिए नरेंद्र मोदी सरकार का तीसरा कार्यकाल अवैध है। अब इससे भी आगे बढ़ कर अब राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी पर विदेशी मदद से प्रधानमंत्री बनने और देश की अर्थव्यवस्था विदेशी नियंत्रण में होने के आरोप लगाए हैं। ये सभी बेहद गंभीर आरोप हैं, जिनके बेहद गंभीर और दूरगामी नतीजे हो सकते हैं। उधर इस विपक्षी अभियान के खिलाफ सत्ताधारी भाजपा भी सड़कों पर उतर आई है। यह अभूतपूर्व स्थिति है कि सरकार और सत्ताधारी पार्टी विपक्ष के खिलाफ आंदोलन कर रही है।
भाजपा ‘लोकतंत्र बचाओ-अराजकता हटाओ’ का नारा लगाते मुख्य चुनाव आयुक्त का बचाव करते हुए विपक्ष के आरोपों को सिरे से खारिज कर रही है। भाजपा के इस अभियान की अगुवाई कर रहे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह कह रहे हैं कि एसआईआर के जरिए घुसपैठियों को मतदाता सूची बाहर निकाला जा रहा है, जबकि विपक्ष घुसपैठियों को बचाना चाहता है। उनका यह भी कहना है कि अभी तक तीन करोड घुसपैठियों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं। यह तीन करोड़ का आंकड़ा कहां से आया, यह अमित शाह नहीं बता रहे हैं। चुनाव आयोग इस बारे में खामोश है। जाहिर है कि अमित शाह घुसपैठियों के बहाने पूरे मामले को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश कर रहे हैं।
उधर प्रधानमंत्री मोदी विपक्ष के अभियान को विदेशी साजिश बताने का सिलसिला लगातार जारी रखे हुए हैं। मोदी विपक्ष पर भारत विरोधी ताकतों की भाषा बोलने का आरोप लगाते उस पर देश को अराजकता की ओर ले जाने का आरोप लगा रहे हैं। उनके इस आरोप में ‘अराजकता’ शब्द महत्वपूर्ण है। बहरहाल, इस सूरत के लिए कौन जिम्मेदार है, इस पर भले हीं बहस की गुंजाइश हो, लेकिन दोनों पक्षों का रुख जिस तरह सख्त हो रहा है और उनके बीच संवाद की गुंजाइश घट रही है, उससे अराजक स्थिति बनने की आशंका निर्विवाद रूप से बढ़ी है।
अगर आरोप और विवादों का हल संवैधानिक माध्यमों से नहीं ढूंढा जाएगा या एक पक्ष का इन तरीकों में भरोसा लगातार घटता चला जाएगा, तो फिर पैदा हुए गतिरोध का हल किस रास्ते से निकलेगा? इस प्रश्न को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए राजनीतिक दलों को उस पर गहन आत्म-निरीक्षण करना चाहिए। गौर करने की बात है कि जन समर्थन दोनों ही तरफ है।
बेशक भाजपा के पक्ष में बड़ा जनमत है, लेकिन बीते आम चुनाव 2024 के नतीजों पर गौर करें, तो यह साफ है कि विपक्ष भी जनमत के कम-से-कम आधे हिस्से की नुमाइंदगी करता है। ऐसे मत विभाजन के बीच सर्वमान्य प्रक्रियाएं और उन पर अमल कराने वाली संस्थाएं ही वे माध्यम होती हैं, जिनके आधार पर लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम रहती है। वैसे तो सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच टकराव का सिलसिला लंबा हो चुका है, लेकिन सिर्फ पिछले एक हफ्ते की घटनों को ही गौर से देखें तो साफ नजर आता है कि इन प्रक्रियाओं पर से एक पक्ष का विश्वास उठ गया है और प्रक्रियाओं पर अमल कराने वाले लगभग सभी संवैधानिक संस्थान अपने संदिग्ध व्यवहार के चलते खुद निशाने पर आ गए हैं। प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी इस असाधारण और अफसोसनाक स्थिति को सिरे से नजरअंदाज कर रही है। यही आज का सबसे बड़ा संकट है, जो कि अभूतपूर्व है।











