रायपुर। छत्तीसगढ़ में बिजली की कहानी अब सिर्फ इस बात तक सीमित नहीं है कि घर में बिजली आ रही है या नहीं। असली सवाल यह है कि बिजली आने के बाद उपभोक्ता को उसका बिजली बिल (Bijli Bill) कितना चुकाना पड़ रहा है, मीटर कितनी खपत दिखा रहा है, सरकार की राहत योजनाओं का कितना फायदा मिल रहा है और खुद सरकारी विभाग बिजली कंपनी का कितना पैसा दबाए बैठे हैं।
द लेंस पिछले कई महीनों से बिजली व्यवस्था की इन अलग-अलग परतों को सामने लाता रहा है। स्मार्ट मीटर को लेकर उपभोक्ताओं की शिकायतों से लेकर बिजली बिल के बढ़ते बोझ, हाफ बिजली बिल योजना में बदलाव, सरकारी विभागों के हजारों करोड़ के बकाये और अब छत्तीसगढ़ के बिजली वितरण क्षेत्र में टाटा पावर की संभावित एंट्री तक, पूरी तस्वीर एक साथ देखें तो बिजली व्यवस्था पर दबाव कई मोर्चों पर दिखाई देता है।
स्मार्ट मीटर को लेकर सबसे ज्यादा विवाद उपभोक्ताओं के बिजली बिल का है। कई जगह उपभोक्ताओं ने शिकायत की है कि पुराने मीटर की तुलना में स्मार्ट मीटर लगने के बाद बिल बढ़ गया।
हालांकि, CSPDCL का कहना है कि स्मार्ट मीटर से बिजली की खपत नहीं बढ़ती और मीटर वास्तविक खपत के आधार पर बिल तैयार करता है। कंपनी ने अपने तुलनात्मक आंकड़ों का हवाला देते हुए यह भी कहा है कि रायपुर में स्मार्ट मीटर वाले घरेलू उपभोक्ताओं की खपत में कमी दर्ज हुई।
यानी एक तरफ कंपनी के आंकड़े हैं और दूसरी तरफ उपभोक्ताओं की शिकायतें। इसी बीच CSERC के रिकॉर्ड में भी बिजली बिल से जुड़ी शिकायतों के मामले सामने आ रहे हैं। मसलन, दुर्ग के उपभोक्ता शिकायत निवारण फोरम में मई-जून 2026 के बिजली बिल में विसंगति से जुड़ा मामला दर्ज हुआ है।
सवाल यह नहीं कि स्मार्ट मीटर अच्छा है या खराब। सवाल यह है कि जिस मीटर को पारदर्शिता और सटीक बिलिंग का माध्यम बताया गया, उसकी शिकायतों का स्वतंत्र और भरोसेमंद समाधान तंत्र कितना प्रभावी है।
बिजली की दरें बढ़ाकर उपभोक्ताओं को दिया झटका
अगर बिजली की दरों पर जाएं तो उसमें भी उपभोक्ताओं को झटका ही मिला है। उपभोक्ताओं पर एक और सीधा असर बिजली दरों का है।
इस बीच बिजली की दरों में भी बढ़ोतरी हुई है। छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत नियामक आयोग ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए औसत टैरिफ में 6.23 प्रतिशत की वृद्धि मंजूर की है। नई दरें 1 जुलाई 2026 से लागू हैं। घरेलू उपभोक्ताओं के अलग-अलग स्लैब में ऊर्जा शुल्क 30 से 50 पैसे प्रति यूनिट तक बढ़ाया गया है।
CSPDCL ने इससे कहीं ज्यादा, करीब 24 प्रतिशत वृद्धि की मांग की थी, जिसे आयोग ने स्वीकार नहीं किया। इसका मतलब यह है कि जिन परिवारों की खपत ज्यादा है, उनके बिल पर टैरिफ बढ़ोतरी का असर अपेक्षाकृत ज्यादा दिखाई दे सकता है।
हाफ बिजली बिल याेजना का फायदा भी कम
इसके अलावा बिजली बिल को लेकर एक बड़ा बदलाव सरकार ने पिछले साल किया था और वह बदलाव मुख्यमंत्री हाफ बिजली बिल योजना पर था।
2019 में शुरू हुई योजना में 400 यूनिट तक खपत पर राहत दी जाती थी। अगस्त 2025 में सरकार ने इसकी सीमा बदलकर 100 यूनिट तक 50 प्रतिशत छूट करने का निर्णय लिया था।
इसके बाद दिसंबर 2025 में सरकार ने मुख्यमंत्री ऊर्जा राहत जन अभियान यानी M-URJA के जरिए राहत को फिर बढ़ाकर 200 यूनिट तक किया। सरकार के मुताबिक 200 से 400 यूनिट तक खपत करने वाले उपभोक्ताओं को भी अगले एक साल तक 200 यूनिट पर 50 प्रतिशत छूट देने का प्रावधान किया गया।
लेकिन यहां यह समझना होगा कि अगस्त 2025 तक इस छूट का फायदा सभी घरेलु उपभोक्ताओं को 400 यूनिट तक मिलता था। इसमें खपत का दायरा नहीं था। यानी कि हर उपभोक्ता 200 यूनिट बिजली फ्री थी। अब इसे 100 यूनिट कर दिया गया है लेकिन अब सिर्फ 400 यूनिट तक खपत में ही 100 यूनिट की छूट मिलेगी। अगर 401 यूनिट भी खपत हो रही है तो उपभोक्ता को छूट नहीं मिलेगी।
यानी पिछले करीब एक साल में राहत की व्यवस्था में दो बड़े बदलाव हुए। इसका सीधा असर उपभोक्ताओं के मासिक बिजली बिल की गणित पर पड़ता है।
सरकारी विभागों का 3 हजार करोड़ बकाया तो अब काटी जा रही बिजली
बिजली व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना ही यह है कि जिस बिजली कंपनी से आम उपभोक्ता का बिल समय पर जमा करने की अपेक्षा की जाती है, उसी कंपनी के सरकारी उपभोक्ताओं पर हजारों करोड़ रुपये बकाया हैं।
विधानसभा में दी गई जानकारी के मुताबिक जून 2026 तक प्रदेश के सरकारी विभागों, निगमों, मंडलों और आयोगों पर ₹3035.37 करोड़ का बिजली बिल बकाया था। कुल 1,57,341 सरकारी कनेक्शनों पर यह बकाया दर्ज है। इसमें अकेले नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग का हिस्सा ₹1525.18 करोड़ और पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग का ₹1057.56 करोड़ है। यानी दोनों को मिलाकर करीब 26 सौ करोड़ रुपए के आसपास।
यानी दो विभागों पर ही कुल सरकारी बकाये का करीब 85 प्रतिशत हिस्सा है।
अब बिजली कंपनी ने सरकारी कार्यालयों पर भी सख्ती शुरू की है। 1 अगस्त 2026 से ब्लॉक स्तर और उससे ऊपर के सरकारी कार्यालयों में प्रीपेड बिजली व्यवस्था लागू की गई है और बकाया वसूली के लिए कनेक्शन काटने की कार्रवाई भी शुरू हुई है।
एक तरफ आम उपभोक्ता के बकाये पर कनेक्शन काटने की कार्रवाई होती है, दूसरी तरफ सरकारी तंत्र पर हजारों करोड़ का बकाया जमा हो चुका है। यही विरोधाभास बिजली व्यवस्था की वित्तीय स्थिति पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा करता है।
टाटा पॉवर की एंट्री से हड़कंप, सरकारी बिजली कंपनी के वर्चस्व पर खतरा
इन सवालों के बीच अब बिजली वितरण के मैदान में टाटा पावर की एंट्री की खबर ने और हड़कंप मचा दिया है।
टाटा पावर ने CSERC के सामने पेटिशन नंबर 89/2026 दाखिल कर रायपुर जिले के रायपुर, धरसींवा, मंदिर हसौद और अभनपुर तहसीलों के भौगोलिक रूप से जुड़े क्षेत्र में बिजली वितरण लाइसेंस मांगा है। CSERC के रिकॉर्ड में यह याचिका दर्ज है।
इस मामले में अभी फैसला नहीं हुआ है। CSERC ने इस पर आपत्तियां और सुझाव आमंत्रित किए हैं। 21 सितंबर तक यह दावे और आपत्तियां मंगाई गई हैं। और 1 अक्टूबर 2026 को सुबह 11:30 बजे सार्वजनिक सुनवाई निर्धारित की है। आयोग की वेबसाइट पर भी इस सुनवाई की जानकारी दर्ज है।
यानी आने वाले दिनों में यह सिर्फ टाटा पावर के लाइसेंस का मामला नहीं रहेगा। यह सवाल भी महत्वपूर्ण होगा कि छत्तीसगढ़ में बिजली वितरण का मौजूदा मॉडल आगे किस दिशा में जाएगा।
बिजली की पूरी तस्वीर अब सिर्फ ‘बिजली कट रही है या नहीं’ वाली नहीं
स्मार्ट मीटर पर उपभोक्ताओं की शिकायतें हैं, टैरिफ में बढ़ोतरी हुई है, हाफ बिजली बिल योजना का स्वरूप बदला है, सरकारी विभागों पर ₹3035 करोड़ से ज्यादा का बकाया है और इसी बीच एक बड़े निजी बिजली समूह ने रायपुर के चार तहसीलों में वितरण लाइसेंस के लिए आवेदन किया है।
इन घटनाओं को अलग-अलग खबरों की तरह देखने के बजाय एक साथ रखकर देखने पर छत्तीसगढ़ की बिजली व्यवस्था की पूरी तस्वीर सामने आती है।
और यही वह जगह है जहां सबसे ज्यादा निगाह आम उपभोक्ता पर टिकती है कि बिजली का बिल कौन तय करेगा, मीटर पर भरोसा कैसे बनेगा, सरकारी बकाये की वसूली कैसे होगी और आने वाले समय में बिजली वितरण की जिम्मेदारी किसके हाथ में होगी।











