नई दिल्ली। यह घोर अंधेरे में जब चारों ओर मातम पसरा हो ढोल बजाकर नाचने जैसी कोई बात है। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Modi)का जन्मदिन है। 2014 में जब बतौर पीएम मोदी का पहला जन्मदिन था उन्होंने ख़ुद जम्मू कश्मीर में आई बाढ़ की वजह से अपना जन्मदिन सादगी से मनाने का आदेश दिया था लेकिन लगभग 13 साल सत्ता में रहने के बाद बहुत कुछ बदल चुका है। मोदी जी का जन्मदिन प्राकृतिक, सरकारी और मानवीय त्रासदी से कराहते देश में हज़ारों करोड़ खर्च करके मनाया जा रहा है।
हर तरफ़ मुर्दानगी और गहरी खामोशी
देश की राजधानी दिल्ली के सत्या निकेतन में जहाँ हज़ारों छात्रों की रिहाइश थी अब गहरी खामोशी है। विगत 6 सितंबर को पाँच मंजिला इमारत गिरने से ६ छात्रों की मौत और दर्जन भर के घायल होने के बाद पसरी उदासी अभी ख़त्म नहीं हुई है। मणिपुर में एक सप्ताह के भीतर आधा दर्जन हत्याएं हुई हैं। मध्य प्रदेश तो जैसे अकाल मौतों की राजधानी बन गया है। शराब से हुई मौतों के बाद बालाघाट में 30 बच्चों की मौत का सन्नाटा पूरे देश में है। बिहार से लेकर आसाम तक बाढ़ का प्रकोप लाखों लोगों पर गहरी विपदा लेकर आया है। वहीं छत्तीसगढ़ और यूपी जैसे राज्यों में आम आदमी कानून व्यवस्था से लेकर बुनियादी जरूरतों के लिए जूझ रहा है।
एक तरफ जलती हुई चिताओं का धुआं, उफनती नदियों में बहते आशियाने और भूख से तड़पते बेरोजगार युवाओं की चीखें हैं; वहीं दूसरी तरफ करोड़ों रुपयों का सरकारी तेल-घी, झिलमिलाती लाइटें और ‘सेवा संकल्प’ के नाम पर लाखों दीप प्रज्वलित करने का भव्य प्रदर्शन है। देश की वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक स्थिति का यह विरोधाभास आज हर संवेदनशील नागरिक के मन में तीखे सवाल उठा रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 76वें जन्मदिन के उपलक्ष्य में जब पूरा प्रशासनिक अमला सड़कों पर लाखों दीये जलाने और भव्य महा-आयोजनों की तैयारियों में व्यस्त है, ठीक उसी समय देश के आधा दर्जन से अधिक राज्य कुदरती आपदाओं, बाढ़ और प्रशासनिक उपेक्षा की मार झेल रहे हैं। क्या किसी जननायक का जन्मोत्सव देश के उन करोड़ों नागरिकों के आंसुओं से बड़ा हो सकता है जो आज अपने घर-बार खोकर राहत शिविरों में दाने-दाने को तरस रहे हैं?
पर्यावरण संरक्षण और ऊर्जा बचत पर लंबे-चौड़े भाषण देने वाले प्रधानमंत्री इस आयोजन को लेकर ख़ामोश हैं मतलब साफ़ है कि इस पर उनकी मूक सहमति है। प्रधानमंत्री कुछ महीनों पहले तक स्वयं मंचों से ईंधन, बिजली और खाद्य तेलों की बचत की अपील करते रहे हैं। लेकिन जन्मदिन के अवसर पर जो आंकड़े सामने आ रहे हैं, वे चौंकाने वाले हैं।
देशभर में दीयों का मेगा शो
देश के सभी भाजपा शासित राज्यों में शिक्षकों, सरकारी कर्मचारियों, अधिकारियों, छात्रों को मोदी जी के जन्मदिन पर दिए जलाने के काम में लगा दिया गया है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में अकेले 25 लाख दिये जलाये जा रहे हैं। गुजरात सरकार के आधिकारिक बयानों के अनुसार, पूरे राज्य में 18,500 से अधिक स्थानों पर 88 लाख से अधिक दीये जलाए जा रहे हैं। अकेले 17 नगर निगम क्षेत्रों में भव्य आयोजनों के लिए लाखों लोगों की भीड़ जुटाई गई है।यूपी के कानपुर के मोतीझील मैदान में 76,000 दीये एक साथ प्रज्वलित करने का रिकॉर्ड बनाया जा रहा है।
इसके अलावा प्रदेश भर के विभिन्न जिलों में ‘सेवा ज्योति’ के नाम पर महीने भर तक निरंतर दीये जलाए रखने का संकल्प लिया गया है।अनुमान के मुताबिक, इन लाखों दीयों को प्रज्वलित रखने के लिए हजारों लीटर खाद्य तेल और घी का उपभोग हो रहा है। ऐसे समय में जब देश में खाद्य तेलों और ईंधन की कीमतें आसमान छू रही हैं, इस पैमाने पर तेल की बर्बादी को जन-हितैषी कैसे कहा जा सकता है?
यूपी से मणिपुर तक बाढ़ का कहर
जिस समय सत्ता के गलियारों में शहनाइयां बज रही हैं, देश के कई प्रदेश भारी बारिश, जलभराव और भूस्खलन की विभीषिका से कराह रहे हैं।उत्तर प्रदेश के दर्जन भर से अधिक जिले जिनमे वाराणसी, गोरखपुर, लखीमपुर खीरी, बलिया और गाजीपुरबाढ़ से बुरी तरह प्रभावित हैं। नदियों का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर बह रहा है।पिछले एक महीने में राज्य में बाढ़, आकाशीय बिजली गिरने और डूबने से 100 से अधिक लोगों की जानें जा चुकी हैं।हजारों एकड़ में खड़ी धान और गन्ने की फसलें जलमग्न होकर सड़ चुकी हैं। राहत सामग्री के नाम पर प्रशासन द्वारा केवल कागजी आंकड़े पेश किए जा रहे हैं, जबकि धरातल पर लोग तिरपाल के नीचे रहने को मजबूर हैं।
मध्य प्रदेश के मालवा और निमाड़ अंचल में नर्मदा, शिप्रा और चंबल जैसी नदियां रौद्र रूप धारण किए हुए हैं।राज्य के 15 से अधिक जिलों में जनजीवन पूरी तरह ठप है। बाढ़ की चपेट में आने से 50 से अधिक लोगों की अकाल मृत्यु हो चुकी है।3 लाख हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि जलमग्न हो चुकी है। उज्जैन और इंदौर के निचले इलाकों में पानी घुसने से सैकड़ों मवेशी बह गए हैं।
बिहार में हर साल आने वाली बाढ़ अब एक प्राकृतिक आपदा से ज्यादा एक मानव निर्मित प्रशासनिक त्रासदी बन चुकी है। राज्य के लगभग 15 से अधिक जिले भीषण जलप्रलय की चपेट में हैं, जहां गंगा, कोसी, गंडक और बागमती जैसी नदियां तबाही मचा रही हैं। हालिया आंकड़ों के मुताबिक, 48 लाख से भी अधिक लोग इस त्रासदी से सीधे तौर पर प्रभावित हुए हैं, और डूबने व आपदाओं के कारण दर्जनों लोगों की अकाल मृत्यु हो चुकी है। हजारों एकड़ में फैली फसलें बर्बाद हो चुकी हैं, सड़कें बह गई हैं और अनगिनत परिवार तटबंधों, राष्ट्रीय राजमार्गों या राहत शिविरों में तिरपाल के नीचे रहने को मजबूर हैं।
यह आपदा केवल नदियों के जलस्तर बढ़ने का परिणाम नहीं, बल्कि केंद्र और राज्य सरकार की घोर उदासीनता का नतीजा है। नेपाल से आने वाले पानी को रोकने और अंतर-राज्यीय जल प्रबंधन के लिए केंद्र सरकार की कोई दूरगामी नीति नजर नहीं आती। वहीं राज्य सरकार का जल संसाधन विभाग केवल बाढ़ आने के बाद कागजी राहत कार्यों और हवाई सर्वेक्षणों तक सीमित रह जाता है। तटबंधों की मरम्मत के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये का बजट पास होता है, जो भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है।
जातीय हिंसा से पहले ही जूझ रहे मणिपुर में इस बार की बाढ़ और भूस्खलन ने स्थिति को अत्यंत भयावह बना दिया है।मणिपुर में 56,000 से अधिक लोग बेघर हो चुके हैं और 10,000 से अधिक घरों को नुकसान पहुँचा है।इंफाल और आसपास के इलाकों में नदियां बांध तोड़कर बस्तियों में घुस गईं। राहत शिविरों में बच्चों के लिए दूध, पीने का साफ पानी और आवश्यक दवाइयों तक की भारी किल्लत है। पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों (असम, त्रिपुरा) को मिलाकर 100 से अधिक लोग अपनी जान गंवा चुके हैं।
विपदा के बीच उत्सव
देश के सामाजिक और आर्थिक आंकड़ों पर नजर डालें तो जश्न का यह माहौल एक क्रूर मज़ाक जैसा प्रतीत होता है:देश में शिक्षित युवाओं की एक विशाल फौज बेरोजगार घूम रही है। सरकारी भर्ती परीक्षाओं के पेपर लीक होना और वर्षों तक नियुक्तियां अटकना आम बात हो चुकी है। युवा रोज़गार के लिए लाठियां खा रहे हैं, लेकिन सरकार ‘उत्सव’ मनाने में व्यस्त है।ग्लोबल हंगर इंडेक्स (Global Hunger Index) में भारत की स्थिति बेहद चिंताजनक बनी हुई है।
देश के करोड़ों बच्चे आज भी कुपोषण के शिकार हैं। एक तरफ गरीब परिवार को दो वक्त की सूखी रोटी मयस्सर नहीं हो रही, वहीं दूसरी तरफ दीपों के नाम पर टनों तेल जलाया जा रहा है।रसोई गैस, डीजल-पेट्रोल और हरी सब्जियों के दाम आसमान छू रहे हैं। बाढ़ से फसलें बर्बाद होने के कारण आने वाले दिनों में खाद्य पदार्थों की कीमतें और बढ़ने की आशंका है, लेकिन सरकार के पास आम जनता को राहत देने के लिए बजटीय आवंटन की कमी का बहाना रहता है।
प्रधानमंत्री के जन्मदिन को ‘सेवा पखवाड़ा’ का नाम देकर पूरे देश की प्रशासनिक मशीनरी को राजनीतिक ब्रांडिंग में झोंक दिया गया है।दिल्ली, वाराणसी और गुजरात के बीच आयोजित की जा रही ‘सेवा संकल्प बाइक रैलियों’ में सैकड़ों गाड़ियां, एम्बुलेंस और सुरक्षा बल तैनात किए गए हैं। इनमें जलने वाले ईंधन और प्रशासनिक श्रम का खर्च जनता के टैक्स के पैसे से उठाया जा रहा है।हजारों की संख्या में बाइक खरीदी गई हैं।











