क्या 1980 की तस्वीरों का ट्रेंड भारत में चुनावों को प्रभावित करने की कोशिश है?

नई दिल्ली। 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव के दौरान और उसके बाद फेसबुक पर वायरल किए गए तक़रीबन 80 हज़ार पोस्ट जो कि 120 फेसबुक पेजों से संबद्ध थे करीब 12.6 करोड़ अमेरिकियों तक पहुंच गए। आप कहेंगे इसमें खास क्या है?

इसमें खास यह था कि यह रूस में बैठकर रूसी रिसर्च एजेंसी के माध्यम से किए गए थे। रूस की इंटरनेट रिसर्च एजेंसी ने 2015 से 2017 के बीच यह सामग्री पोस्ट की।

इस घटना के बाद हुई सुनवाई में फेसबुक ने पहली बार सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि उसके प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल सरकारें दूसरे देशों में जनमत प्रभावित करने के लिए कर रही हैं, जिसमें अमेरिका और फ्रांस के राष्ट्रपति चुनाव शामिल हैं। और हां उस वक्त हुए चुनाव में अप्रत्याशित तौर पर हिलेरी क्लिंटन को पछाड़कर डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिकी राष्ट्रपति बने थे।

इसमें खास बात एक और है। उस ट्रेंड के बाद ऐसी कोशिशें उस घटना के बाद भी दुनिया के कई देशों में होती रही। दो दिनों पहले भारत में सोशल मीडिया पर वायरल हुए ट्रेंड को जिसमें अपनी तस्वीरों को AI की मदद से 1980 के दौर में बनाकर पोस्ट करने की शुरू हुई मुहिम सतह पर देखने में मनोरंजन लग सकती है लेकिन खतरनाक संकेत दे रही है। द लेंस ने इसकी बारीकी से पड़ताल की तो पाया कि ऐसे ट्रेंड का मूल आमतौर पर रूस और चीन रहे हैं।

जब रूस के खेल से दुनिया में मचा बवाल

भारत में शनिवार से ब्रिक्स सम्मेलन शुरू होने वाले हैं रूसी राष्ट्रपति पुतिन दिल्ली पहुंच चुके हैं। द्विपक्षीय बातचीत भी होनी है। यक़ीनन टेक्नोलॉजिकल सहयोग पर भी बातचीत होगी। यह कहने में कोई दो राय नहीं है कि रूस वेब डेवलपिंग के क्षेत्र में भले पीछे नजर आता हो लेकिन अमेरिका और यूरोप के तमाम देशों को वक्त बेवक्त छकाता रहता है।

रूसी सोशल मीडिया पर संख्या में कम हैं लेकिन 2017 में ही वो AI का बखूबी इस्तेमाल करने लगे थे।

रूस ने FaceAPP नाम का एक सॉफ्टवेयर मार्केट में उतारा FaceApp को रूसी पब्लिशर वायरलेस लैब ने 2017 में लॉन्च किया था। यह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से यूजर्स की फोटो बदलता था जिसमें बालों का रंग बदलना, झुर्रियां डालना या चेहरे से साल घटाना संभव एचटीए।

यह उस समय गूगल प्ले पर सबसे ज्यादा डाउनलोड होने वाला फ्री ऐप था जिसके 10 करोड़ से ज्यादा यूजर्स था सेलिब्रिटीज समेत आम लोगों के इस्तेमाल से सोशल मीडिया के जब फीड भरने लगे तब लोगों को पता लगा की यह रूस में बना है तब अमेरिका समेत तमाम देशों में बवाल मच गया।

आपकी तस्वीरें अब चैट जीपीटी के क्लाउड में कैद हैं

जब आप FaceApp के काम करने के तरीके को समझ लेंगे तो आपको आसानी से समझ में आ जाएगा कि भारत में चल रहे मौजूदा ट्रेंड से क्या कुछ हो सकता है। दरअसल हम सब अपनी तस्वीर चैट जीपीटी या किसी भी AI टूल पर डालते हैं तो वो उसके क्लाउड पर चल जाता है।

वहां पर मौजूद डाटा पर हमारा अधिकार नहीं रहा है वह या तो जिस प्लेटफार्म पर हम इस्तेमाल कर रहे हैं उसका है कंपनी प्राइवेसी पॉलिसी के अंतर्गत जिस कंपनी को वो चाहे डेटा उपलब्धकरा सकती है। हांलाकि फेसबुक बिना इजाजत के डेटा प्राइवेट कंपनियों को देने का दोषी रहा है। इस डेटा को हैकर्स भी क्लाउड से चोरी कर सकते हैं ।

आप पूछेंगे डेटा क्या है? डेटा यह है कि भारत में फ़ेसबुक या इंस्टा पर मौजूद इतनी आबादी जिनके नाम और चेहरे भी क्लाउड पर हैं ख़ुद को पुराने वक़्त में देखना चाहती है। इसे पसंद करती है। डेटा यह है कि जिन लोगों ने इस ट्रेंड में भाग नहीं लिया ।उनमें पढ़े लिखे लोगों का प्रतिशत कितना था और वो देश के किस क्षेत्र में रह रहे थे?

क्या हमने खुद के इस्तेमाल की इजाजत दे दी है?

साइबर एक्सपर्ट निधि सक्सेना से जब हम पूछते हैं कि क्या इस डेटा का इस्तेमाल चुनावों में हो सकता है? तो वो कहती हैं कि क्यों नहीं हो सकता? अब तो उदाहरण सामने है कि इंस्टाग्राम के ट्रेंड से आंदोलन खड़ा हो सकता है।

निधि बताती हैं कि अगर आप 1980 के दौर में अपनी तस्वीर देखना चाहते हैं तो यह भी तो संभव है कि आप इस किस्म के अन्य किसी ट्रेंड में हिस्सा लेने को तैयार हो जायें और आपको पता भी ना हो कि यह ट्रेंड अमुक पार्टी द्वारा ख़ुद के नम्बर बढ़ाने के लिए तैयार किया गया केम्पेन है। वो अमेरिकी चुनावों की ओर ले जाती हैं जिसमे रूस के द्वारा बस्ट की गई पोस्ट से केवल 4.9 करोड़ लोग सीधे जुड़े थे लेकिन पोस्ट को लाइक और शेयर करने से यह 11 करोड़ तक चली गई जो कि अमेरिका की वोट देने लायक़ आधी आबादी है।

2017 में FaceApp के सामने आने के बाद सिंगापुर के तत्कालीन प्रधानमंत्री ली सिएन लूंग ने कहा था कि बहुत से लोग अपनी या दूसरों की मॉडिफाइड फोटो शेयर करके मजा ले रहे हैं। इसमें कोई गलत बात नहीं है, लेकिन ज्यादातर लोग शायद नहीं जानते या परवाह नहीं करते कि ऐसे ऐप डाउनलोड और इस्तेमाल करने पर कितना पर्सनल डेटा ऐक्सेस हो जाता है।” वह चिंता आज भी ज़िंदा है।

चीनी AI मुहिम से की जा रही तुलना

मार्च 2023 के आसपास Midjourney नाम के टूल से चीन के कुछ क्रिएटर्स और फोटोग्राफर्स ने 80-90 के दशक की नॉस्टैल्जिक शहरी तस्वीरें बनानी शुरू की थीं। उदाहरण के लिए चोंग्किंग की सड़कें, ग्रामीण शादियां, मजदूरों के दृश्य और पुराने फैशन वाली तस्वीरें। ये तस्वीरें सोशल मीडिया पर फैलीं और MIT टेक्नोलॉजी रिव्यू जैसी जगहों पर कवर हुईं। ये मुख्य रूप से यादों और एस्थेटिक के लिए थीं, राजनीतिक व्यंग्य वाली नहीं। Midjourney ने फ्री ट्रायल बंद कर दिया क्योंकि चीन से वायरल ट्यूटोरियल वीडियो की वजह से बहुत सारे लोग फेक अकाउंट बनाकर सर्वर पर बोझ डाल रहे थे।लेकिन अचानक फिर यह ग़ायब हो गया।भारत में बहुत से लोग मौजूद ट्रेंड को उससे जोड़कर देख रहे हैं।

चैट जीपीटी का धंधा और बीजेपी सरकार

भारत में इंस्टाग्राम की “Add Yours” स्टिकर से यह एक-दूसरे तक पहुंचा लेकिन सबसे ज़्यादा इस्तेमाल चैट जीपीटी का हुआ। सबसे पहले यूजर्स भाजपा के बड़े नेता थे जिनमे पीयूष गोयल का नाम सबसे ऊपर है।ai के इस्तेमाल के मामले में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बाजार है। लेकिन पैसे कमाने में चुनौती है क्योंकि ज्यादातर लोग फ्री या सस्ते प्लान पर हैं।भारत में दस करोड़ से ज़्यादा लोग चैट जीपीटी का इस्तेमाल करते हैं।

फरवरी 2026 में OpenAI ने यह आंकड़ा दिया था और साल-दर-साल दोगुना होने की बात कही गई। तो यह क्या सरकार के समर्थन से व्यवसाय को बढ़ाने की कोई करामात थी? इसका जवाब तलाशते हैं तो पता चलता है कि 2025 के अंत में चैट जीपीटी का रिवेन्यू भारत में बहुत गिर गया था क्योंकि लोग सब्सक्रिप्शन तो छोड़ ही रहे थे नए AI प्लेटफार्म पर जा रहे थे।

अगर इस मुहिम को सरकार का समर्थन था जो था और यह भी स्पष्ट था कि भाजपा शासित सभी राज्यों के मंत्रियों मुख्यमंत्रियों को इस मुहिम से जुड़ने को कहा गया था तो यह बात बड़ी हो जाती है। यह सवाल बड़ा हो जाता है कि क्या ऐ टूल्स का इस्तेमाल भारत में इलेक्शन में होने जा रहा है?

मुहिम बीजेपी की कांग्रेसी और जनता भी शामिल

कैम्ब्रिज एनालिटिका की कहानी बहुत पुरानी नहीं है। कैम्ब्रिज एनालिटिका ने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के रिसर्चर अलेक्जेंडर कोगन के ऐप “This Is Your Digital Life” नाम के एक पर्सनैलिटी क्विज के जरिए डेटा लिया।

करीब 2.70 लाख लोगों ने खुद क्विज दिया और ऐप को अपनी जानकारी देने की अनुमति दी।उस समय फेसबुक का पुराना नियम ऐसा था कि ऐप यूजर के दोस्तों का डेटा भी ले सकता था।

इस वजह से कुल लगभग 8.7 करोड़ फेसबुक प्रोफाइल्स का डेटा इकट्ठा हो गया। इनमें से कई लोगों को पता भी नहीं था।

कंपनी ने इस डेटा से लोगों की साइकोलॉजिकल प्रोफाइल बनाई जिसमें व्यक्तित्व, डर, पसंद सब था और टारगेटेड पॉलिटिकल कैंपेन चलाए।

कैम्ब्रिज एनालिटिका मामला 2018 का सबसे बड़ा डेटा प्राइवेसी स्कैंडल था। इसमें भाजपा, कांग्रेस और जनता दल यू के नेताओं के नाम आए। कैम्ब्रिज एनालिटिका ने जो किया वही काम इस मुहिम ने भी किया। फेशियल डाटा हासिल कर लिया और आपकी पसंद से भी परिचित हो गया।

बीबीसी के पत्रकार गुलमोहर कहते हैं कि कल को इस डेटा का इस्तेमाल किसी भी काम में किया जा सकता है। कम से कम यह तो तय हो ही गया कि बीजेपी या उसके नेता कोई मुहिम चलायेंगे तो उसमें आम जनता के साथ साथ कांग्रेसी भी हिस्सा लेंगे।

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