सुकमा। आंध्र प्रदेश में गोदावरी नदी पर निर्माणाधीन पोलावरम परियोजना को लेकर छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के कोंटा ब्लॉक में एक बार फिर चिंता बढ़ गई है। बस्तरिया राज मोर्चा के बैनर तले डोंड्रा पंचायत में पोलावरम से प्रभावित होने वाले गांवों के प्रमुख लोगों की बैठक हुई। बैठक में ग्रामीणों ने कहा कि बांध का असर सिर्फ जमीन और घरों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे पीढ़ियों से इस इलाके में रह रहे दोरला समुदाय की संस्कृति, परंपरा और पहचान पर भी गंभीर संकट खड़ा हो सकता है।
पोलावरम परियोजना गोदावरी नदी पर आंध्र प्रदेश के पोलावरम क्षेत्र में बनाई जा रही है। परियोजना के जलाशय का स्वीकृत Full Reservoir Level (FRL) 45.72 मीटर यानी 150 फीट है। इसकी सकल जल भंडारण क्षमता करीब 194.6 TMC बताई गई है। परियोजना प्राधिकरण के अनुसार बांध की अधिकतम ऊंचाई करीब 50 मीटर है। इस परियोजना को लेकर छत्तीसगढ़ और ओडिशा पहले से ही डूब और बैकवाटर के प्रभाव को लेकर आपत्ति जताते रहे हैं। कोंटा क्षेत्र के ग्रामीणों का कहना है कि 18 गांव सीधे डूब क्षेत्र मे आएंगे ।
ग्रामीणों के अनुसार कोंटा ब्लॉक के गोदावरी-सबरी नदी से जुड़े सीमावर्ती गांवों पर इसका असर पड़ सकता है। इनमें डोंड्रा, चिखलगुड़ा, चिंताकोंटा, सुन्नमगुड़ा, डब्बाकोंटा, कोलाईगुड़ा, पिडमेल, रामाराम, गोलापल्ली, भट्टीगुड़ा, नामरीगुड़ा और तुमालभट्टी जैसे गांवों का उल्लेख किया जा रहा है।
सिर्फ जमीन नहीं, संस्कृति भी डूबने का डर
ग्रामीणों का कहना है कि इन इलाकों में रहने वाले दोरला समुदाय की जीवनशैली जंगल, नदी, खेती और पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था से गहराई से जुड़ी हुई है। यदि बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ तो लोगों को केवल अपने घर और खेत ही नहीं छोड़ने पड़ेंगे, बल्कि उनके देवस्थल, पारंपरिक स्थल, कब्रिस्तान, जंगल और पीढ़ियों से चले आ रहे सामाजिक-सांस्कृतिक संबंध भी प्रभावित होंगे।
ग्रामीणों की चिंता इसलिए भी गंभीर है क्योंकि पोलावरम का प्रभाव केवल जलाशय में डूबने वाले क्षेत्र तक सीमित नहीं माना जाता। भारी बाढ़ की स्थिति में बैकवाटर का प्रभाव कोंटा क्षेत्र तक पहुंचने को लेकर भी अध्ययन और विवाद सामने आते रहे हैं। एक अध्ययन में कोंटा क्षेत्र में संभावित बैकवाटर स्तर को लेकर अलग-अलग बाढ़ परिस्थितियों में काफी अंतर का उल्लेख किया गया है।
1981 से प्रस्तावित परियोजना, अब अंतिम दौर में
पोलावरम परियोजना का प्रस्ताव दशकों पुराना है और परियोजना को लेकर आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ तथा ओडिशा के बीच लंबे समय से विवाद और आपत्तियां रही हैं। वर्ष 2014 में आंध्र प्रदेश पुनर्गठन कानून के तहत इसे राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा मिला। परियोजना का उद्देश्य सिंचाई, पेयजल और जलविद्युत उत्पादन सहित कई उपयोगों से जुड़ा है।
परियोजना के कारण विस्थापन और पुनर्वास का मुद्दा भी लंबे समय से विवाद का विषय रहा है। पुराने पर्यावरणीय आकलनों में सैकड़ों गांवों और बड़ी आबादी के प्रभावित होने का अनुमान लगाया गया था।
बैठक में ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि पोलावरम से संभावित प्रभावित परिवारों के हितों और उनके पुनर्वास को लेकर छत्तीसगढ़ की पिछली और वर्तमान सरकारों की ओर से अपेक्षित गंभीर पहल नहीं की गई। ग्रामीणों का सवाल है कि यदि परियोजना से उनकी जमीन, जंगल और गांव प्रभावित होते हैं तो उनके अधिकारों, मुआवजे, पुनर्वास और भविष्य की सामाजिक-सांस्कृतिक सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन लेगा?
बैठक में बस्तरिया राज मोर्चा के संयोजक मनीष कुंजाम ने भी पोलावरम परियोजना के प्रभाव और बस्तर के लोगों के अधिकारों का मुद्दा उठाया। मोर्चे का कहना है कि विकास परियोजनाओं का भार उन समुदायों पर नहीं डाला जाना चाहिए, जिनकी जमीन और प्राकृतिक संसाधनों पर उनका जीवन सदियों से निर्भर रहा है।
अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि पोलावरम के जलाशय में कितनी जमीन डूबेगी। सवाल यह भी है कि यदि गांव उजड़ते हैं तो उनके साथ जुड़ी संस्कृति, परंपरा और पहचान का संरक्षण कैसे होगा? कोंटा के ग्रामीण इसी सवाल का जवाब सरकार से मांग रहे हैं।











