भारत में निजी अंतरिक्ष कंपनियों को जगह दी जा रही है। ऐसे में यह शंका स्वाभाविक है कि क्या यहां भी वही मॉडल दोहराया जाएगा, जो हवाई अड्डों, रेलवे और बस अड्डों में दिखता है। कई बड़े हवाई अड्डे सरकारी हैं, लेकिन उनका संचालन निजी कंपनियों के हाथ में है। रेलवे स्टेशन और रेलगाड़ियाँ सरकारी हैं, फिर भी तेजस, भारत गौरव और महाराजा जैसी कुछ ट्रेनों का संचालन निजी क्षेत्र के पास है। कई बड़े शहरों के बस अड्डों की स्थिति भी यही है—जमीन और पूरा ढांचा सरकार ने खड़ा किया, संचालन निजी कंपनियों के पास चला गया।
अब सरकार अंतरिक्ष क्षेत्र को भी निजी क्षेत्र के हवाले करने की दिशा में बढ़ रही है। भारत में निजी कंपनियाँ अब केवल इसरो की आपूर्तिकर्ता नहीं रह गई हैं। वे पूरा तंत्र बनाने, चलाने और डेटा बेचने वाली बन रही हैं। जो कंपनियाँ लॉन्च, उपग्रह और डेटा—तीनों को जोड़ पाएँगी, वे सबसे अधिक कमाएँगी। जो अधिक पूँजी लगाएगा, वही आगे निकलेगा। ऐसे में यह संदेह स्वाभाविक है कि क्या वहाँ भी अडानी-अंबानी राज होगा?
भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र लंबे समय तक इसरो के सरकारी नियंत्रण में रहा। चंद्रयान-3 की चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास सफल लैंडिंग और मंगलयान जैसी कम लागत वाली उपलब्धियों ने दुनिया को दिखाया कि सीमित बजट में भी उच्च स्तर का कार्य संभव है। लेकिन 2020 के बाद नीति बदली। भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 और IN-SPACe के गठन के साथ निजी कंपनियों को रॉकेट बनाने, लॉन्च करने, उपग्रह संचालित करने और डेटा बेचने की अनुमति मिल गई। 2026 तक इस बदलाव के परिणाम साफ दिखने लगे हैं।
जुलाई 2026 में स्काईरूट एयरोस्पेस के विक्रम-1 ने भारत का पहला निजी कक्षीय प्रक्षेपण पूरा किया। यह एक प्रतीकात्मक मोड़ था। संसद में सरकार ने बताया कि चालू वित्त वर्ष में दो और अगले वर्ष छह से अधिक निजी व्यावसायिक प्रक्षेपण प्रस्तावित हैं। स्टार्टअप की संख्या एक से बढ़कर 400 से ऊपर पहुँच गई है। निजी निवेश लगभग 60-73 करोड़ डॉलर के स्तर पर आ चुका है। अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था वर्तमान में 8-9 अरब डॉलर आँकी जाती है, जिसे 2030 तक 40-45 अरब डॉलर और 2040 तक 100 अरब डॉलर तक पहुँचाने का अनुमान है।
इसी समय दो बड़े औद्योगिक घराने इस क्षेत्र में सक्रिय दिख रहे हैं। जून 2026 में रिलायंस जियो के आकाश अंबानी ने कंपनी की वार्षिक आम बैठक में स्वदेशी लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) कांस्टेलेशन की योजना का उल्लेख किया। रिपोर्टों के अनुसार लगभग 1,650 उपग्रहों का नेटवर्क बनाने पर विचार हो रहा है, जिसकी लागत 10-15 अरब डॉलर तक हो सकती है। उद्देश्य दूरदराज के गाँवों, द्वीपों और सीमावर्ती इलाकों में उपग्रह ब्रॉडबैंड तथा डायरेक्ट-टू-डिवाइस कनेक्टिविटी देना है। जियो पहले से वैश्विक कांस्टेलेशन से क्षमता किराए पर लेने और भारत में ग्राउंड स्टेशन बनाने की बात कर रहा है। यह स्टारलिंक जैसी विदेशी कंपनियों के मुकाबले ‘संप्रभु’ क्षमता का दावा है।
अगस्त 2026 के अंत में इसरो ने अपने सबसे भारी परिचालन रॉकेट एलवीएम-3 (जिसे बाहुबली कहा जाता है) की प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के लिए निजी क्षेत्र से रुचि पत्र आमंत्रित किए। लार्सन एंड टुब्रो, जेएसडब्ल्यू, महिंद्रा और अडानी समूह समेत कई कंपनियाँ रुचि दिखा रही हैं। चयनित कंपनी या कंसोर्टियम 42 महीने या दो रॉकेट बनाने-लॉन्च करने तक इसरो की मदद से तकनीक अपनाएगी, फिर स्वतंत्र रूप से निर्माण और व्यावसायिक संचालन करेगी। सरकार ने अगले 12-14 वर्षों में 60 से अधिक एलवीएम-3 बनाने की मंजूरी दी है, जिसका अनुमानित कारोबार 25,000 करोड़ रुपये का है। इससे पहले पीएसएलवी और एसएसएलवी की तकनीक भी उद्योग को दी जा चुकी है। उद्देश्य नियमित प्रक्षेपण निजी क्षेत्र को सौंपकर इसरो को गगनयान, ग्रहीय मिशन और अंतरिक्ष स्टेशन पर केंद्रित करना है।
तस्वीर साफ है। सरकार अंतरिक्ष को वाणिज्यिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनाना चाहती है। IN-SPACe सैकड़ों प्राधिकरण दे चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अगस्त 2026 में 20 अंतरिक्ष स्टार्टअप के संस्थापकों से मुलाकात कर कृषि, पर्यावरण और सार्वजनिक सेवाओं में अंतरिक्ष तकनीक के उपयोग पर जोर दिया। गगनयान का पहला बिना चालक मिशन 2026 के अंत तक और चालक मिशन 2027 के आसपास लक्षित है। 2035 तक भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन और 2040 तक चंद्रमा पर मानव भेजने की बात कही जा रही है।
अंतरिक्ष क्षेत्र सभी निजी खिलाड़ियों के लिए खोला गया है। स्काईरूट, अग्निकुल, पिक्सेल, दिगंतरा और गैलेक्सआई जैसी स्टार्टअप कंपनियाँ रॉकेट, हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग, एसएआर उपग्रह और अंतरिक्ष मलबा ट्रैकिंग में काम कर रही हैं। बड़ी कंपनियाँ पूँजी, विनिर्माण क्षमता और मौजूदा रक्षा-एयरोस्पेस अनुभव लेकर आ रही हैं। अडानी डिफेंस एंड एयरोस्पेस एलवीएम-3 में रुचि दिखा रहा है, जबकि जियो उपग्रह संचार में निवेश की तैयारी कर रहा है। यह केवल दो घरानों को सौंपना नहीं, बल्कि बड़े पूँजी वाले खिलाड़ियों का स्वाभाविक प्रवेश है। दूरसंचार में जियो ने पहले भी बड़े पैमाने पर निवेश कर बाजार बदला था। अंतरिक्ष में भी भारी पूँजी और लंबी अवधि की जरूरत है।
प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और लाइसेंसिंग में पारदर्शिता, प्रतिस्पर्धा और छोटे स्टार्टअप के लिए जगह बनी रहनी चाहिए। यदि बड़े समूह ही भारी रॉकेट और बड़े कांस्टेलेशन पर हावी हो जाएँ, तो नवाचार सीमित हो सकता है। सरकार का दावा है कि एफडीआई नियम उदार किए गए हैं तथा वेंचर फंड और सीड फंड उपलब्ध हैं।
निजी कंपनियाँ छोटे उपग्रहों के लिए रॉकेट बनाकर प्रक्षेपण शुल्क ले सकेंगी। विक्रम श्रृंखला का भारत का पहला निजी रॉकेट कक्षा तक पहुँच चुका है। अग्निकुल कॉसमॉस त्रिआयामी मुद्रित इंजन और मांग पर प्रक्षेपण पर काम कर रहा है। ऊपरी चरण को उपग्रह मंच की तरह उपयोग करने का मॉडल भी है, जिससे प्रक्षेपण और पट्टे दोनों से आय हो सकती है। इन कंपनियों के ग्राहक भारत के अलावा अमेरिका, जापान, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया से आ रहे हैं। छोटे उपग्रहों की माँग अधिक है, इसलिए प्रति किलोग्राम कक्षा तक पहुँचाने की कीमत से राजस्व आता है।
उपग्रह निर्माण और एकीकरण का कार्य भी बढ़ने वाला है। इसमें दूसरों के लिए उपग्रह बनाना, जोड़ना और परीक्षण करना शामिल है। ध्रुवा स्पेस इसका उदाहरण है। कंपनी कई पीएसएलवी प्रक्षेपण पूरे कर चुकी है, स्पेसएक्स के फाल्कन-9 पर भी उपग्रह जोड़ा है और उसकी ऑर्डर बुक सैकड़ों करोड़ की है। सरकार के सैन्य निगरानी उपग्रह कार्यक्रम (स्पेस बेस्ड सर्विलांस-3) में 52 में से 31 उपग्रह निजी कंपनियों को दिए जा रहे हैं।
सबसे तेज आय वाला खंड पृथ्वी अवलोकन डेटा और विश्लेषण का है। उपग्रह से चित्र और हाइपरस्पेक्ट्रल डेटा लेकर कृषि, खनन, तेल-गैस, आपदा प्रबंधन, आधारभूत संरचना और रक्षा क्षेत्र को बेचा जाता है। पिक्सेल के हाइपरस्पेक्ट्रल उपग्रहों के ग्राहकों में नासा, रियो टिंटो, बीपी और भारत सरकार शामिल हैं। गैलेक्सआई, सैटश्योर और पियरसाइट जैसी कंपनियाँ एसएआर और विश्लेषण पर काम कर रही हैं। यह सदस्यता या परियोजना आधारित राजस्व देता है। पिक्सेल जैसी कंपनियाँ पहले से आय अर्जित कर रही हैं। IN-SPACe ने 1,200 करोड़ रुपये के सार्वजनिक-निजी साझेदारी में निजी पृथ्वी अवलोकन कांस्टेलेशन भी दिया है।
यह पूरा क्षेत्र बहुत भारी पूँजी माँगता है। बड़े खिलाड़ी भी इसमें उतर रहे हैं। यह क्षेत्र रक्षा की दृष्टि से संवेदनशील भी है। इसलिए यह आशंका बनी रहती है कि मुनाफा कमाने की होड़ में देश की सुरक्षा पर आँच न आए। कंपनियाँ ईमानदार हो सकती हैं, लेकिन उनके कर्मचारियों पर सरकारी निगरानी सख्ती से होनी चाहिए। यहाँ यदि सरकार कोई भेदभाव भी करे, तो आम आदमी और मीडिया की पहुँच उस तक होना बहुत कठिन होगा।











