रायपुर। छत्तीसगढ़ के एक महकमें में अरबों के एक टेंडर को लेकर ऐसी रस्साकशी मची है कि सरकार तक परेशान हो गई!एक प्रतिस्पर्धी कंपनी इस मामले को अदालत ले गई और अदालत में उस कंपनी को राहत मिली जो एल –1 यानी सबसे कम दरों पर काम करने को तैयार थी,लेकिन विभाग के आला अफसरों का माथा ठनका हुआ है क्योंकि कुछ ऐसे कागजात याचिका के साथ अदालत को दिखाये गए जिन्हें बाहर आना ही नहीं था !
अब खुफिया तौर पर इस मामले की जांच का दावा किया गया है।
पहले मामला जानिए।
यह दिलचस्प वाकया राज्य के जल संसाधन विभाग का है।
इस विभाग के एक आला अफसर वरिष्ठ अफसरों के एक वॉटसएप ग्रुप में उन्हें सीएमओ यानि मुख्यमंत्री कार्यालय से मिले एक वॉट्सऐप मैसेज का जिक्र करते हुए लिखते हैं कि मुख्यमंत्री कार्यालय और वे स्वयं इसे देख कर स्तब्ध हैं!
उन्होंने लिखा कि यह षडयंत्र यदि सच है तो अब एजेंसियां इसकी जांच कर रही हैं।फोन रिकॉर्ड्स/मैसेज रिकॉर्ड्स/मीटिंग्स आदि की जानकारी जुटाई और ट्रैक की जा रही है.. और जो भी दोषी होगा उसे दंडित किया जाएगा।’
the Lens को एक आला अफसर के नाम से मिले इस वॉट्सऐप मैसेज के मुताबिक यह अफसर लिखते हैं – ‘लेकिन मैं वाकई दुखी हूं!और अगर यह जानकारी सच है तो बेहद निराश भी हूं…ऐसे लोग/ठेकेदार/अधिकारी जो अपनी आजीविका,वेतन और पेंशन इसी विभाग से कमाते हैं ,वे अपने ही विभाग के खिलाफ कैसे काम कर सकते हैं…यह गंभीर कदाचार है और इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता…इसे केवल दंडित ही किया जाना चाहिए।’
इस आला अफसर ने आगे लिखा– ‘ लेकिन यह विभाग के लिए बेहद दुखद दिन है…मैं बहुत स्तब्ध और क्षुब्ध हूं…और विभाग प्रमुख भी उतने ही स्तब्ध हैं…’
विभागीय सूत्र बताते हैं कि इस मैसेज से समझ यह आता है कि यह आला अफसर और कथित रूप से मुख्यमंत्री कार्यालय इस बात से स्तब्ध और अत्यंत गुस्से में है कि कुछ गोपनीय दस्तावेज लीक कैसे हुए! यह मामला मुख्यमंत्री के ही अपने विभाग का जो था।
विभागीय सूत्र कहते हैं कि इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर उच्च न्यायालय में ठेके की पात्रता से बाहर हुई एक कंपनी ने याचिका लगाई लेकिन राहत मिली दिलीप बिल्डकॉन को जो कि L 1 थी।
मजेदार यह है कि गोपनीय दस्तावेजों के लीक होने की चिंता कर रहे विभाग के आला अफसर का यह मैसेज भी पहली फ़ुर्सत में लीक हुआ और बाजार में घूमने लगा..
अब मामला समझिए और उसके बाद कुछ गंभीर सवालों की चर्चा करेंगे।
मामला है कि गरियाबंद जिले के पैरी सिकासार लिंक के निर्माण का। मध्यप्रदेश की एक बड़ी कंपनी है दिलीप बिल्डकॉन लिमिटेड। यह बड़ी रसूखदार कंपनी है और राजनीति से लेकर नौकरशाही तक लोगों को इसके रसूख का अंदाज है। इसने पहले भी छत्तीसगढ़ में बड़े काम किये हैं।
इस कंपनी को L 1 यानी काम के लिए टेंडर में सबसे कम दरें भरने के कारण पैरी सिकासार लिंक का ठेका मिला लेकिन कुछ अन्य प्रतिस्पर्धी बड़े ठेकेदारों को यह रास नहीं आ रहा था। ठेके की लागत 2.5 हजार करोड़ से अधिक बताई गई है।
ठेका इतना बड़ा हो और रस्साकशी ना हो यह कैसे संभव है!
L 1 होने के कारण जब दिलीप बिल्डकॉन लिमिटेड को यह टेंडर मिल रहा था तो प्री क्वॉलिफिकेशन से बाहर की जा रही एक प्रतिस्पर्धी कंपनी ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याचिका के साथ ऐसे दस्तावेज लगाये जिन्हें लेकर अब विभाग में हड़कंप है कि ये लीक कैसे हुए ? विभागीय सूत्रों का कहना है कि इन दस्तावेजों में इस ठेके को लेकर अलग–अलग स्तरों पर दिए गए अलग–अलग निर्देशों के भी कागज हैं। इनके बाहर आने से विभाग और सरकार के लिए असुविधाजनक स्थिति निर्मित हो गई और ऊपर तक हड़कंप मचा हुआ है।
अदालत ने याचिका पर विचार किया और बताते हैं कि राहत दिलीप बिल्डकॉन को ही मिली क्योंकि वह L-1 थी।
The Lens को अदालती आदेश की प्रति नहीं मिली है। इसके मिलते ही हम खबर अपडेट करेंगे।
विभाग के सूत्र कहते हैं कि दिलीप बिल्डकॉन लिमिटेड को यह ठेका अब बिना रुकावट मिलेगा।
पैरी सिकासार लिंक जलसंसाधन विभाग की एक महत्वपूर्ण परियोजना है। विभागीय सूत्र बताते हैं कि इसके तहत पाइप लाइन बिछा कर गरियाबंद से पानी महासमुंद पहुँचाना है।
अब बात विभाग के आला अफसर के उस वॉट्सऐप मैसेज को जी अपने आप में कई सवाल खड़े करता है!
इस अफसर ने लिखा – …
‘यह षड्यंत्र यदि सच है!!! तो अब कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा इसकी जांच की जा रही है, फोन रिकॉर्ड्स/मैसेज रिकॉर्ड्स/मीटिंग्स आदि की जानकारी जुटाई और ट्रैक की जा रही है… और जो भी दोषी होगा उसे दंडित किया जाएगा।’
पहला सवाल तो यह है कि यदि यह षडयंत्र है तो क्या विभाग ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवाई?यदि नहीं तो क्यों ?
दूसरा सवाल – किस अधिकार से एजेंसियां बिना वैधानिक प्रक्रिया के लोगों के फोन रिकॉर्ड्स/मैसेज रिकॉर्ड्स आदि की जानकारी जुटा रहीं हैं…ट्रैक कर रही हैं ? हालांकि अभी यही स्पष्ट नहीं है कि एजेंसियों को यह काम सौंपा गया है या नहीं ?
तीसरा सवाल यह जांच केवल विभागीय अधिकारियों,कर्मचारियों तक ही सीमित होगी या कथित रूप से ऐसे दस्तावेजों के लीक होने का कानूनन लाभ हासिल कर लेने वाली कंपनी और इसके खिलाफ अदालत में याचिका दायर करने वाली कंपनी तक भी इस कथित जांच का दायरा पहुंचने वाला है ?
चौथा और सबसे बड़ा सवाल – क्या छत्तीसगढ़ में इस तरह की मॉनिटरिंग,ट्रैकिंग को शासन की इजाजत है या एजेंसियां अनधिकृत तौर पर मौखिक निर्देशों पर ही ऐसा कर लेती हैं ?
हमारी नजर इस खबर पर बनी रहेगी। चर्चा ये भी है कि प्रतिस्पर्धी कम्पनियाँ अब सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी में हैं।
आपको यह खबर कैसी लगी और इसमें उठाए गए सवालों पर आपकी टिप्पणी क्या है जरूर लिखें।
दरअसल यह खबर केवल चंद ठेकेदारों,अफसरों या राजनीतिज्ञों के लिए नहीं है बल्कि यह आपके लिए भी जानना जरूरी है कि अरबों के ठेकों के पीछे उठापटक क्या होती है!









