रायपुर। क्या कृषि मंत्री रामविचार नेताम (Ramvichar Netam) की परफॉर्मेंस से साय सरकार संतुष्ट नहीं है?
सत्ता के गलियारों में यह सवाल खूब चर्चा में है।
दरअसल मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की अध्यक्षता में शुक्रवार को हुई कैबिनेट बैठक में किसानों को खरीफ और रबी सीजन में उर्वरकों की समय पर उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए एक मंत्रिमंडलीय उप समिति के गठन को मंजूरी दी गई और सरकार ने इस समिति की अध्यक्षता का जिम्मा उप मुख्यमंत्री अरुण साव को सौंपा है, जबकि कृषि विकास एवं किसान कल्याण मंत्री रामविचार नेताम को सदस्य बनाया गया है।

यह उस परम्परा से अलग फैसला है जिसमें सामान्यतः ऐसी मंत्री मंडलीय उपसमितियों का जिम्मा संबंधित विभाग के मंत्री को ही सौंपा जाता है।यानी ऐसी किसी उपसमिति के अध्यक्ष विभाग के मंत्री हो होते हैं।
लेकिन उर्वरक आपूर्ति और वितरण ,प्रबंधन के लिए बनी उपसमिति का अध्यक्ष रामविचार नियम के बजाए जब उपमुख्यमंत्री अरुण साव को बनाया गया तो सत्ता का गलियारा चौंका !
यह फैसला चर्चा का विषय बन गया। भाजपा की अंदरूनी राजनीति को समझने वाले जानकार सूत्रों का कहना है कि यह केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि इसे सरकार और संगठन की ओर से एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश भी माना जा रहा है।
कैबिनेट के निर्णय के अनुसार, उर्वरक आपूर्ति, वितरण और प्रबंधन की निगरानी के लिए गठित मंत्रिमंडलीय उप समिति किसानों को समय पर खाद उपलब्ध कराने के लिए सुझाव, अनुशंसा और मार्गदर्शन देगी।
समिति में उप मुख्यमंत्री अरुण साव अध्यक्ष होंगे। कृषि मंत्री रामविचार नेताम, सहकारिता मंत्री केदार कश्यप, वित्त मंत्री ओपी चौधरी सदस्य होंगे। कृषि उत्पादन आयुक्त समिति के संयोजक होंगे।
समिति आवश्यकता पड़ने पर विभागीय अधिकारियों, विषय विशेषज्ञों और अन्य संस्थाओं के प्रतिनिधियों को भी बुला सकेगी।
राज्य सरकार की कार्यप्रणाली से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि सामान्य तौर पर किसी विभाग से जुड़े विषय पर बनने वाली मंत्रिमंडलीय उप समिति की अध्यक्षता उसी विभाग के मंत्री को सौंपी जाती है। लेकिन इस बार सरकार ने कृषि विभाग और किसानों से जुडी इस उप समिति में कृषि मंत्री की जगह लोक निर्माण मंत्री और उप मुख्यमंत्री अरुण साव को अध्यक्ष बनाया है। हाल के वर्षों में छत्तीसगढ़ में ऐसा हुआ हो याद नहीं पड़ता।
भाजपा की राजनीति पर नजर रखने वाले जानकार सूत्रों का कहना है कि सरकार के भीतर लंबे समय से यह चर्चा रही है कि कृषि विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर शीर्ष स्तर पर संतुष्टि नहीं है। उर्वरकों की उपलब्धता, वितरण और किसानों से जुड़े कई मुद्दों पर विभाग को लेकर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में सीधे कृषि मंत्री को समिति की कमान न देकर अरुण साव को अध्यक्ष बनाना सिर्फ एक प्रशासनिक फैसला ही नहीं बल्कि लोग इसमें राजनीति भी ढूंढने लगे हैं।
इन्हीं सूत्रों का यह भी दावा है कि संगठन स्तर पर भी कृषि मंत्री के कामकाज को लेकर समय-समय पर नाराजगी की चर्चा रही है। ऐसे में समिति की अध्यक्षता किसी दूसरे वरिष्ठ मंत्री को सौंपकर सरकार ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि कृषि विभाग की निगरानी अब उच्च स्तर पर होगी।
भाजपा की राजनीति के जानकारों का मानना है कि इस फैसले से सरकार के भीतर अरुण साव की भूमिका और प्रभाव दोनों बढ़े हैं।हालांकि परफॉर्मेंस की बात करें तो उनके अपने विभागों के कामकाज पर भी विपरीत टिप्पणियां उच्च स्तरों पर सुनाई देती हैं। उप मुख्यमंत्री होने के साथ–साथ उनके पास लोक निर्माण, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी, नगरीय प्रशासन एवं विकास जैसे महत्वपूर्ण विभाग हैं। लेकिन एक वरिष्ठ अफसर ने कहा कि इन विभागों के कामकाज पर भी सवाल उठते हैं।खासतौर पर नगरीय प्रशासन विभाग को लेकर तो यह कहा जाता है कि हाल ही में नगरीय निकाय चुनावों में बीजेपी को जो धक्का लगा उसके पीछे एक कारण इस मंत्रालय के काम की निराशाजनक गति भी है।
अभी जो उपसमिति गठित की गई है उसके बारे में उप मुख्यमंत्री अरुण साव ने बैठक के बाद प्रेस को बताया कि समिति का उद्देश्य किसानों को खरीफ और रबी दोनों मौसम में समय पर उर्वरक उपलब्ध कराना है। समिति उर्वरक आपूर्ति, वितरण और प्रबंधन की निगरानी करेगी तथा राज्य सरकार को आवश्यक सुझाव और अनुशंसाएं देगी।
फिलहाल सरकार ने इसे पूरी तरह प्रशासनिक निर्णय बताया है।अगर यह सिर्फ प्रशासनिक निर्णय भी है तो भी यह सवाल उठता है कि क्या रामविचार नेताम ने इस मंत्रालय को कसावट के साथ नहीं संभाला ? छत्तीसगढ़ में पिछले दिनों किसानों को खाद की उपलब्धता को लेकर जितनी हाय तौबा मची,किसान जितना परेशान रहे,मीडिया में यह मुद्दा जितना उछला उससे साय सरकार की ही नकारात्मक छवि बनी और बताते हैं कि स्वयं मुख्यमंत्री इसे लेकर अप्रसन्न थे।
प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि मुख्यमंत्री श्री साय ने उपसमिति की अध्यक्षता अरुण साव को सौंपे जाने के प्रस्ताव को इसी वजह से ही मंजूरी दी थी।
रामविचार नेताम साय सरकार के सबसे वरिष्ठ और अनुभवी आदिवासी मंत्री हैं। इस फैसले का राजनीतिक असर क्या होगा इस पर प्रेक्षकों की नजर है।











