भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान IIT Roorkee की एक आंतरिक एडवाइजरी को लेकर देशभर में बहस छिड़ गई है। संस्थान की ओर से छात्रों, कर्मचारियों और फैकल्टी को भेजे गए ईमेल में राजनीतिक गतिविधियों और सोशल मीडिया पर सार्वजनिक बयान देने को लेकर संस्थान के आचरण नियमों का पालन करने की सलाह दी गई है। एडवाइजरी में कहा गया है कि बिना पूर्व अनुमति किसी राजनीतिक गतिविधि में शामिल होने या ऐसा सार्वजनिक बयान देने से बचें, जिससे संस्थान और केंद्र सरकार के संबंध प्रभावित हो सकते हों।

यह एडवाइजरी ऐसे समय सामने आई है जब देश में राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) से जुड़े परीक्षा विवादों को लेकर छात्र संगठनों का विरोध प्रदर्शन जारी है। सोशल मीडिया पर यह दावा भी किया गया कि छात्रों को अपने निजी सोशल मीडिया अकाउंट पर चल रहे छात्र आंदोलनों के समर्थन में पोस्ट करने से रोका गया है जिसके बाद मामला तेजी से चर्चा में आ गया।
तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा ने इस एडवाइजरी की आलोचना करते हुए कहा कि यह छात्रों के संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार पर सवाल खड़ा करती है। उनका कहना है कि भारत के संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है और छात्रों की आवाज़ को इस तरह सीमित नहीं किया जाना चाहिए।
विवाद बढ़ने के बाद IIT रुड़की ने सफाई जारी करते हुए कहा कि यह कोई नया आदेश नहीं है। संस्थान के अनुसार, हर शैक्षणिक सत्र की शुरुआत में ऐसी एडवाइजरी नियमित रूप से जारी की जाती है और इसका उद्देश्य केवल पहले से लागू आचरण नियमों की जानकारी देना है, न कि छात्रों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नया प्रतिबंध लगाना।
हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि क्या शैक्षणिक संस्थानों में छात्रों की राजनीतिक अभिव्यक्ति पर संस्थागत सीमाएं तय की जा सकती हैं या फिर लोकतांत्रिक व्यवस्था में छात्रों को भी अन्य नागरिकों की तरह अपनी राय सार्वजनिक रूप से रखने का पूरा अधिकार होना चाहिए। यह सवाल अब केवल IIT रुड़की तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि देशभर में अकादमिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों पर व्यापक चर्चा का विषय बन गया है।










