नई दिल्ली। हिंदुस्तान ने बीजेपी के केंद्र में आने के बाद पहले हिंदुत्व के अलग अलग प्रयोग देखे। अब यह प्रयोग देश की पेट्रोलियम नीति से हो रहा है जिसमें पूरा देश ही एक प्रयोगशाला है और डेढ़ अरब लोग उस प्रयोग में सैंपल बनने को मजबूर हैं। आम जनता हलकान है और इस प्रयोगशाला को संचालित करने वाले सड़क और राजमार्ग मंत्रालय के मंत्री नितिन गडकरी (Nitin Gadkari) इस शोर को प्रायोजित बता रहे हैं।ई20 इथेनॉल ब्लेंडिंग पेट्रोल को लेकर पूरे देश में हाहाकार की स्थिति है। पेट्रोल पंप मालिकों को जनता के कोप का सामना करना पड़ रहा है।
Nitin Gadkari की प्रयोगशाला में अदभुत प्रयोग
पेट्रोल में 20 फीसदी इथेनॉल की ब्लेंडिंग भारत सरकार ने इसी वर्ष 1 अप्रैल से से पूरे देश में अनिवार्य कर दी है। पेट्रोलियम मंत्रालय ने इसके लिए फरवरी 2026 में आधिकारिक अधिसूचना जारी की थी।अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में इस प्रयोग को स्वीकार किया और कहा कि अगले साल तक इसके परिणाम प्राप्त कर लिए जायेंगे। दिलचस्प है कि यह प्रयोग यहीं नहीं रुकना है।
सड़क परिवहन मंत्रालय ने केंद्रीय मोटर वाहन नियमों में संशोधन का प्रस्ताव देकर E20 से आगे बढ़ते हुए E85 (85 फीसदी एथेनॉल) और E100 (100 फीसदी एथेनॉल) जैसे उच्च मिश्रण वाले ईंधनों के लिए भी मानक और बुनियादी ढांचा तैयार करना शुरू कर दिया है। मतलब यह कि तेल उत्पादक देशों और बड़े निर्यातक रूस से रिश्ते खराबकर स्वदेशी ईंधन के प्रयोग के नाम पर पूरी तरह से ईंधन के लिए इथेनॉल पर निर्भरता की योजना बनाई जा रही है।
दूसरे देशों में इथेनॉल की वजह से क्यों नहीं होते वाहन खराब
सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है कि दुनिया के तमाम देशों में जहां पेट्रोलियम पदार्थों में इथेनॉल की ब्लेंडिंग की जाती है वहां गाड़ियां खराब क्यों नहीं होती है जबकि भारत में यह बहुत ज्यादा हो रहा है। इसका उत्तर साफ है कि सरकार ने आधी अधूरी तैयारियों के साथ इसे पूरी तरह लागू कर दिया। दरअसल जिन देशों में लंबे समय से पेट्रोल में इथेनॉल जैसे E10 या E85 का इस्तेमाल हो रहा है, वहां भी शुरुआत में गाड़ियां खराब होने और इंजन में दिक्कतें आने की शिकायतें आई थीं।
इथेनॉल नमी को सोखता है, जिससे ईंधन टैंक में जंग लगना, रबर के पाइप का गलना और इंजन में रुकावट जैसी समस्याएं होती हैं।विकसित देशों जैसे अमेरिका और ब्राजील ने इन समस्याओं से निपटने के लिए बड़े कदम उठाए। वहां की ऑटोमोबाइल कंपनियों ने बहुत पहले ही इंजनों में जंग-रोधी धातुओं जैसे स्टेनलेस स्टील और खास तरह के रबर व प्लास्टिक पाइपों का उपयोग शुरू कर दिया था।
रिफाइनरी से लेकर पेट्रोल पंप तक ईंधन में नमी को रोकने के लिए वाटर-सेपरेटर फिल्टर और उन्नत स्टोरेज टैंक का उपयोग किया जाने लगा और ईंधन की स्थिरता बनाए रखने के लिए विशेष केमिकल मिलाए जा रहे हैंजो इंजन को नुकसान से बचाते हैं जो भारत में नहीं हुआ।
भारत में E 20 से वाहनों को क्या नुकसान
भारत में 2023 से पहले निर्मित अधिकांश पुराने वाहन E20 और E85 ईंधन के लिए पूरी तरह अनुकूल नहीं हैं।अप्रैल 2023 में BS6 Phase 2 लागू होने से पहले की गाड़ियाँ आमतौर पर केवल E5 या E10 के लिए डिज़ाइन की गई थीं। हालांकि, होंडा जैसी कुछ कंपनियों ने 2009 के बाद से ही अपने वाहनों को E20 मैटेरियल कंपैटिबल बनाना शुरू कर दिया था, लेकिन यह सभी ब्रांड्स पर लागू नहीं होता।यदि आप 2023 से पहले के पुराने वाहनों में उच्च इथेनॉल वाले इन ईंधनों का उपयोग करते हैं, तो निम्नलिखित प्रभाव पड़ सकते हैं:
इंजन और फ्यूल सिस्टम को नुकसान: इथेनॉल नमी lपानी को सोखता है और स्वभाव से संक्षारक जंग लगाने वाला होता है। पुराने वाहनों के रबर पाइप, सील, गैस्केट और फ्यूल इंजेक्टर्स इसके संपर्क में आकर जल्दी खराब या लीक हो सकते हैं।
माइलेज में कमी: इथेनॉल की ऊर्जा सघनता शुद्ध पेट्रोल से कम होती है, जिससे पुराने वाहनों के माइलेज में गिरावट आ सकती है।
सरकार के दावों में कितना दम
सरकार के अनुसार E20 ईंधन से वाहनों को कोई गंभीर मैकेनिकल नुकसान पहुंचने के ठोस वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिले हैं, फिर भी इसके व्यावहारिक प्रभावों की समीक्षा की जा रही है।नीति आयोग और मंत्रालय के प्रारंभिक अध्ययनों के अनुसार, E10 की तुलना में E20 ईंधन से वाहनों का एक्सेलरेशन बेहतर होता है और कार्बन उत्सर्जन में लगभग 30 फीसदी तक की कमी आती है।
सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी कहते हैं कि हमने इस्तेमाल करने से पहले प्रयोग किए हैं लेकिन इसका विवरण अनुपलब्ध है। एक दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि जब तक इथेनॉल बनाने के लिए गन्ने का इस्तेमाल किया जाता था तब तक सब ठीक था लेकिन जबसे चावल का इस्तेमाल किया जाने लगा तबसे समस्या गहरा गई।
भारत में पेट्रोल में मिलाने और टूटे हुए चावल से एथेनॉल बनाने की आधिकारिक शुरुआत वर्ष 2020 में हुई।राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति-2018 के तहत ‘राष्ट्रीय जैव ईंधन समन्वय समिति’ (NBCC) ने 20 अप्रैल 2020 को हुई अपनी बैठक में सरप्लस चावल को एथेनॉल उत्पादन के लिए इस्तेमाल करने की मंजूरी दी थी। इसके अलावा, अगस्त 2022 में देश में पराली से एथेनॉल बनाने के पहले कमर्शियल प्लांट की शुरुआत पानीपत में की गई।
पहाड़ जैसी पर्यावरणीय चुनौतियां
एक बड़ा सवाल पर्यावरण का है। द लेंस ने अपनी रिसर्च में पाया कि देश में इस समय पेट्रोल में मिलाने (ब्लेंडिंग) के लिए औसतन 75 से 90 करोड़ लीटर प्रति माह इथेनॉल का उत्पादन और आपूर्ति हो रही है। अगर हम देश में हर साल लगभग 1,000 करोड़ लीटर इथेनॉल उत्पादन का औसत मानकर चलें, तो पानी की खपत का अनुमान आपकी रूह कंपा देगा। डिस्टिलरी में 1 लीटर इथेनॉल बनाने में लगभग 4 से 5 लीटर पानी खर्च होता है। एक हजार करोड़ लीटर के लिए फैक्ट्री में 5 हजार करोड़ लीटर पानी खर्च होगा।यह मात्रा बहुत बड़ी नहीं है। लेकिन ठहरिए असली पानी खेती में लगता है। 1 लीटर इथेनॉल के लिए आवश्यक गन्ने को उगाने में लगभग 2,000 से 2,500 लीटर पानी की जरूरत होती है। यानि एक हजार करोड़ लीटर इथेनॉल बनाने में कुल 25,000,000 करोड़ लीटर पानी लगेगा जो कावेरी और ताप्ती नदियों के वार्षिक बहाव दर के बराबर है। आप अंदाजा लगाये इससे पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
निजी कंपनियां बाहर भेज रही शुद्ध ईंधन
निजी कंपनियां रिलायंस और नयारा आदि नीदरलैंड, चाड, फ्रांस और अन्य यूरोपीय संघ के देशों के साथ साथ सिंगापुर, संयुक्त अरब अमीरात, बांग्लादेश और श्रीलंकाई बाजार के पेट्रोलियम पदार्थ बेचती है। वाणिज्यिक आंकड़ों के अनुसार, भारत का कुल पेट्रोलियम उत्पाद निर्यात लगातार मजबूत बना हुआ है। पिछले डेढ़ महीने के दौरान रिलायंस की जामनगर रिफाइनरी और नयारा एनर्जी की वाडीनार रिफाइनरी ने मिलकर वैश्विक बाजारों में लाखों टन ईंधन की आपूर्ति की है। अकेले नयारा एनर्जी ने हाल ही में रूस को ही करीब 60,000 मीट्रिक टन से अधिक पेट्रोल का निर्यात ट्रेडर्स के जरिए किया है।
इसके अलावा, दोनों कंपनियों का कुल मासिक पेट्रोलियम निर्यात औसतन 7 से 9 अरब डॉलर के बीच बना हुआ है। लेकिन यह तेल इथेनॉल मिश्रित नहीं था। यह दीगर है कि वो भारत में खुद अपनी टंकियों लड़ ब्लेंडेड ईंधन बेच रहे हैं। विदेशों में ब्लेंडिंग का काम खुद ही किया जा रहा हैं।
आईआईटियन और केमिनल इंजीनियर राघव अवस्थी कहते हैं कि इथेनॉल की एक रासायनिक विशेषता है कि यह पानी को बहुत तेजी से सोखता है। यदि इसे समुद्री जहाजों के जरिए लंबी दूरी तक भेजा जाए, तो नमी के कारण पेट्रोल और इथेनॉल अलग हो सकते हैं, जिससे ईंधन खराब होने का खतरा रहता है।










