मोदी का आपातकाल! सच साबित हो रही है आडवाणी की आशंका

Modi's Emergency

जिस संविधान के तहत भारतीय जनता पार्टी आज केंद्र सहित कई राज्यों में सत्ता पर काबिज है, उस संविधान का भाजपा सरकारों ने 25 जून को हत्या दिवस मनाया। एक साल पहले यानी 25 जून, 2025 को आपातकाल के पांच दशक पूरे होने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस ‘संविधान हत्या दिवस’ को मनाने की शुरुआत की थी। अपने 12 साल के अब तक के शासनकाल में सभी लोकतांत्रिक परंपराओं और संवैधानिक संस्थाओं की चमक और हनक पूरी तरह नष्ट कर चुके प्रधानमंत्री मोदी ने आपातकाल की 51वीं बरसी पर एक सोशल मीडिया पोस्ट के जरिये लोगों को आपातकाल की याद दिला कर लोकतंत्र और संविधान में आस्था जताते हुए ऐसा भारत बनाने का संकल्प दोहराया है जो न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के प्रति हमेशा प्रतिबद्ध रहे।

आपातकाल यानी भारतीय लोकतंत्र का एक बेहद स्याह और शर्मनाक अध्याय….एक दु:स्वप्न…एक मनहूस कालखंड! पूरे 51 बरस हो गए जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपनी सत्ता की सलामती के लिए संवैधानिक प्रावधान का सहारा लेकर आपातकाल लागू कर समूचे देश को कैदखाने में तब्दील कर दिया था। विपक्षी दलों के तमाम नेता और कार्यकर्ता जेलों में ठूंस दिए गए थे। सेंसरशिप लागू कर अखबारों की आजादी का गला घोंट दिया गया था। संसद, न्यायपालिका, कार्यपालिका आदि सभी संवैधानिक संस्थाएं इंदिरा गांधी के रसोईघर में तब्दील हो चुकी थी, जिसमें वही पकता था, जो वे और उनके बेटे संजय गांधी चाहते थे। सरकार के मंत्रियों समेत सत्तारूढ़ दल के तमाम नेताओं की हैसियत मां-बेटे के अर्दलियो से ज्यादा नहीं रह गई थी। आखिरकार पूरे 21 महीने बाद जब चुनाव हुए तो जनता ने अपने मताधिकार के जरिए इस तानाशाही के खिलाफ शांतिपूर्ण ढंग से ऐतिहासिक बगावत की थी, जिससे देश को आपातकाल के अभिशाप से मुक्ति मिली थी।

कहा जा सकता है कि इंदिरा गांधी ने कुछ समय के लिए तानाशाहीपूर्ण रवैया अपनाने के बाद फिर से लोकतंत्र में आस्था जताते हुए चुनाव कराए और चुनाव में मिले जनादेश को स्वीकार भी किया। आपातकाल के बाद पांच दलों के विलय से बनी जनता पार्टी की सरकार ने और कुछ उल्लेखनीय काम किया हो या न किया हो लेकिन संवैधानिक प्रावधानों का सहारा लेकर देश पर दोबारा तानाशाही थोपे जाने की राह को उसने बहुत दुष्कर बना दिया था। ऐसा करना उस सरकार का प्राथमिक कर्तव्य था, जिसे उसने ईमानदारी से निभाया था। लेकिन यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि लोकतांत्रिक मूल्यों और नागरिक अधिकारों का अपहरण हर बार बाकायदा घोषित करके ही किया जाए, यह जरूरी नहीं। यह काम लोकतांत्रिक आवरण और कायदे-कानूनों की आड़ में भी हो सकता है, जो कि पिछले 12 साल से लगातार हो रहा है और भयावह रूप में हो रहा है।

इस सिलसिले में भाजपा के वरिष्ठतम नेता और देश के पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी की उस आशंका को नहीं भुलना चाहिए जो उन्होंने नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के एक साल बाद आपातकाल की 40वीं सालगिरह के मौके पर व्यक्त की थी। भाजपा को सत्ता का स्वाद चखाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले आडवाणी ने 18 जून, 2015 को अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस को दिए साक्षात्कार में देश को आगाह किया था कि लोकतंत्र को कुचलने में सक्षम ताकतें आज पहले से अधिक ताकतवर हैं और पूरे विश्वास के साथ यह नहीं कहा जा सकता कि आपातकाल जैसी घटना फिर दोहराई नहीं जा सकती। बकौल आडवाणी, ”भारत का राजनीतिक तंत्र अभी भी आपातकाल की घटना के मायने पूरी तरह से समझ नही सका है और मैं इस बात की संभावना से इनकार नहीं करता कि भविष्य में भी इसी तरह से आपातकालीन परिस्थितियां पैदा कर नागरिक अधिकारों का हनन किया जा सकता है।’’ 

आडवाणी ने कहा था, ”आज मीडिया का काफी ज्यादा विस्तार हो चुका है, लेकिन क्या वह लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्ध भी है? कहा नहीं जा सकता। सिविल सोसायटी ने भी जो उम्मीदें जगाई थीं, उन्हें वह पूरी नहीं कर सकी है। लोकतंत्र के सुचारू संचालन में जिन संस्थाओं की भूमिका होती है, आज भारत में उनमें से केवल न्यायपालिका को ही अन्य संस्थाओं से अधिक जिम्मेदार ठहराया जा सकता है’’

आडवाणी का यह बयान यद्यपि 11 साल पुराना है लेकिन इसकी प्रासंगिकता तब से कहीं ज्यादा अब महसूस की जा सकती है। आधुनिक भारत के राजनीतिक विकास के सफर में लंबी और सक्रिय भूमिका निभा चुके एक तजुर्बेकार राजनेता के तौर पर आडवाणी की इस आशंका के मद्देनजर अगर हम आज अपनी राजनीतिक और संवैधानिक संस्थाओं के मौजूदा स्वरूप और उनके चाल-चलन को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो हम पाते हैं कि आज देश आपातकाल से भी बुरे और भयावह दौर से गुजर रहा है।

इंदिरा गांधी ने तो संवैधानिक प्रावधानों का सहारा लेकर देश पर आपातकाल थोपा था, लेकिन आज तो औपचारिक तौर आपातकाल लागू किए बगैर ही वह सब कुछ बल्कि उससे भी कहीं ज्यादा हो रहा है, जो आपातकाल के दौरान हुआ था। फर्क सिर्फ इतना है कि आपातकाल के दौरान सब कुछ अनुशासन के नाम पर हुआ था और आज जो कुछ हो रहा है, वह विकास और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर।

केंद्र सहित देश के आधे से ज्यादा राज्यों में सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी के भीतर वाजपेयी-आडवाणी का दौर खत्म होने के बाद पिछले 12 वर्षों में ऐसी प्रवृत्तियां मजबूत हुई हैं, जिनका लोकतांत्रिक मूल्यों से कोई सरोकार नहीं है। सरकार और पार्टी में सारी शक्तियां एक समूह के भी नहीं बल्कि दो ही व्यक्तियों की मुट्ठी में हैं।

प्रधानमंत्री मोदी देश-विदेश में जहां भी जाते हैं, उनके उत्साही ‘समर्थकों’ का प्रायोजित समूह उन्हें देखते ही मोदी-मोदी का शोर मचाता है और किसी रॉक स्टार की तर्ज पर मोदी इस पर मुदित नजर आते हैं। ऐसे ही जलसों में भाषणों के दौरान उनके मुंह से निकलने वाली इतिहास और विज्ञान संबंधी अजीबोगरीब जानकारियों और देश की आर्थिक स्थिति से संबंधित बेसिरपैर के दावों पर बजने वाली तालियों के वक्त उनकी अहंकारी मुस्कान हैरान करने वाली होती है।

आपातकाल के दौर में उस समय के कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने चापलूसी और राजनीतिक बेहयाई की सारी सीमाएं लांघते हुए ‘इंदिरा इज इंडिया-इंडिया इज इंदिरा’ का नारा पेश किया था। आज भाजपा में तो जेपी नड्डा, शिवराज सिंह चौहान, देवेंद्र फड़णवीस आदि से लेकर नीचे के स्तर तक ऐसे कई नेता हैं, जो नरेंद्र मोदी को जब-तब दैवीय शक्ति का अवतार बताने में कोई संकोच नहीं करते। वैसे इस सिलसिले की शुरुआत करने वाले वेंकैया नायडू थे, जिन्हें इनाम स्वरूप देश का उप राष्ट्रपति बनाया गया था।

जहां तक संवैधानिक संस्थानों की बात है, आज देश में लोकतंत्र का पहरुआ कहे जा सकने वाला एक भी ऐसा संस्थान नजर नहीं आता, जिसकी लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष मूल्यो को लेकर प्रतिबद्धता संदेह से परे हो। आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी ने तो सिर्फ मंशा ही जताई थी कि देश में न्यायपालिका सरकार के प्रति प्रतिबद्ध होना चाहिए, लेकिन आज न्यायपालिका एक तरह से सरकार का ही अंग बन चुकी है। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्टों के न्यायाधीश सत्तारूढ़ दल के नेताओं की तरह सार्वजनिक मंचों से प्रधानमंत्री मोदी की चापलूसी भरी तारीफ करते हैं और राजनीतिक मुद्दों पर भी सरकार के सुर में सुर मिलाते हुए बयान देते हैं।

चुनाव आयोग की साख और विश्वसनीयता पूरी तरह चौपट हो चुकी है और वह एक तरह से चुनाव मंत्रालय मे तब्दील हो गया है। मतदाता सूची तैयार करने का काम सत्तारूढ़ पार्टी के हितों को ध्यान में रख कर किया जाने लगा है और किसी भी चुनाव का कार्यक्रम तय करने तक में भी प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी की सुविधा को ध्यान रखा जाता है। चुनाव में मिले प्रतिकूल जनादेश को दलबदल और राज्यपालों की मदद से कैसे तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है, उसकी मिसाल पिछले 12 वर्षों के दौरान हम गोवा, मणिपुर, बिहार, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय आदि कई राज्यों में देख चुके है। राज्यसभा चुनाव में ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने के लिए सत्तारूढ़ दल की ओर से विपक्षी विधायकों की खरीद-फरोख्त का नजारा भी इन वर्षों में देश ने कई बार देखा है।

नौकरशाही की जनता और संविधान के प्रति कोई जवाबदेही नहीं रह गई है। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो समूची नौकरशाही सत्ताधारी दल की मशीनरी की तरह काम करती दिखाई पडती है। सूचना का अधिकार कानून लगभग बेअसर बना दिया गया है। सीबीआई, आयकर विभाग, प्रवर्तन निदेशालय जैसी एजेंसियां विपक्षी नेताओं और सरकार से असहमत सामाजिक कार्यकर्ताओं, लेखकों और बुद्धिजीवियों को परेशान करने का औजार बन गई हैं। इस काम में भी न्यायपालिका सरकार की परोक्ष रूप से सहायक बनी हुई है।

जिस मीडिया को हमारे यहां लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की मान्यता दी गई है, उसकी स्थिति भी बेहद चिंताजनक है। आज की पत्रकारिता आपातकाल के बाद जैसी नही रह गई है। इसकी अहम वजह है- बडे कॉरपोरेट घरानों का मीडिया क्षेत्र में प्रवेश और मीडिया समूहों में ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने की होड़। इस मुनाफाखोरी की प्रवृत्ति ने ही मीडिया संस्थानों को पूरी तरह जनविरोधी और सरकार का पिछलग्गू बना दिया है।

सरकार की ओर से मीडिया को दो तरह से साधा जा रहा है- उसके मुंह में विज्ञापन ठुंस कर या फिर सरकारी एजेंसियों के जरिए उसकी गर्दन मरोड़ने का डर दिखाकर। इस सबके चलते सरकारी और गैर सरकारी मीडिया का भेद लगभग खत्म सा हो गया है।

पिछले 10-12 वर्षों के दौरान जो एक नई और खतरनाक प्रवृत्ति विकसित हुई वह है सरकार, सत्तारूढ़ दल और मीडिया द्वारा सेना का अत्यधिक महिमामंडन और हर काम में सेना का इस्तेमाल। यह सही है कि हमारे सैन्यबलों को अक्सर तरह-तरह की मुश्किल चुनौतियों से जूझना पड़ता है, इस नाते उनका सम्मान होना चाहिए लेकिन उनको किसी भी तरह के सवालों से परे मान लेना और सैन्य नेतृत्व से राजनीतिक बयानबाजी कराना तो एक तरह से सैन्यवादी राष्ट्रवाद की दिशा में कदम बढ़ाने जैसा है।

आपातकाल कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि सत्ता के अतिकेंद्रीयकरण, निरंकुशता, व्यक्ति-पूजा और चाटुकारिता की निरंतर बढ़ती गई प्रवृत्ति का ही परिणाम थी। आज उससे भी ज्यादा खतरनाक नजारा दिख रहा है। सारे अहम फैसले संसद तो क्या, केंद्रीय मंत्रिपरिषद की भी आम राय से नहीं किए जाते; सिर्फ और सिर्फ प्रधानमंत्री और उनके मुख्य सिपहसालार यानी गृह मंत्री अमित शाह की चलती है।

आपातकाल के दौरान संजय गांधी और उनकी चौकड़ी की भूमिका सत्ता-संचालन में गैर-संवैधानिक हस्तक्षेप की मिसाल थी, तो आज वही भूमिका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ निभा रहा है। संसद को अप्रासंगिक बना दिया गया है। जनहित से जुडे मामलों में न्यायपालिका के यदा-कदा आने वाले आदेशों की भी सरकारों की ओर से खुलेआम अवहेलना हो रही है। असहमति की आवाजों को बेरहमी से चुप करा देने या फर्जी देशभक्ति के शोर में डूबो देने की कोशिशें साफ नजर आ रही हैं।

आपातकाल के दौरान और उससे पहले सरकार के विरोध में बोलने वाले को अमेरिका या सीआईए का एजेंट करार दे दिया जाता था तो अब स्थिति यह है कि सरकार से असहमत हर व्यक्ति को पाकिस्तान परस्त या देशविरोधी करार दे दिया जाता है। आपातकाल में इंदिरा गांधी के बीस सूत्रीय और संजय गांधी के पांच सूत्रीय कार्यक्रमों का शोर था तो आज विकास और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के आवरण में हिंदुत्ववादी एजेंडे पर तेजी से अमल किया जा रहा है। इस एजेंडा के तहत अल्पसंख्यकों, दलितों और आदिवासियों का तरह-तरह से उत्पीड़न हो रहा हैं।

कुल मिला कर आज जो माहौल देश में बना हुआ, उसके आगे पांच दशक पुराना आपातकाल बहुत फीका लगता है। वह संवैधानिक आपातकाल तो 21 महीने बाद खत्म हो गया था। उसके बाद देश ने इंदिरा गांधी को माफ भी कर दिया था। फिर से सत्ता में आने के बाद इंदिरा गांधी ने कभी उस आपातकाल को कभी जायज ठहराने या उसे दोहराने जैसा कोई काम नहीं किया। लेकिन मौजूदा असंवैधानिक आपातकाल की कोई मियाद तय नहीं है। लोगों के नागरिक अधिकार गुपचुप तरीके से कुतरे जा रहे हैं। अधिकांश मामलों में न्यायपालिका या तो मूकदर्शक बनी रहती है या हस्तक्षेप का थोड़ा-बहुत दिखावा कर सरकार के सुर में सुर मिलाने लगती है।

सरकार जिस तरह अनैतिक हथकंडों के जरिये लोकसभा में अपने दो तिहाई बहुमत का इंतजाम करने में तेजी जुटी है, उससे यही लगता है कि इस देश को अभी और बुरे दिन देखना होंगे।

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