8 महीने का DGP? छत्तीसगढ़ में पुलिस मुख्यालय से सत्ता के गलियारों तक क्यों उठ रहे हैं सवाल

DGP Arun Deo Gautam

रायपुर। छत्तीसगढ़ में आखिरकार पूर्णकालिक पुलिस महानिदेशक यानी DGP की नियुक्ति तो हो गई, लेकिन इस नियुक्ति के साथ ही सरकार के आदेश, सत्ता के भीतर की खींचतान और ब्यूरोक्रेसी की अंदरूनी राजनीति भी सामने आई है।

राज्य सरकार ने 1992 बैच के आईपीएस अधिकारी अरुण देव गौतम को पूर्णकालिक डीजीपी नियुक्त किया है। लेकिन इस नियुक्ति पत्र ने सियासी और प्रशासनिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है।

वजह यह है कि सरकार ने आदेश में लिखा है कि अरुण देव गौतम को ‘प्रभार ग्रहण करने की तिथि से’ डीजीपी पद पर पदस्थ किया जाता है। यानी उनकी नियुक्ति को उस तारीख से प्रभावी माना गया है, जब उन्होंने कार्यवाहक डीजीपी का प्रभार संभाला था।

अरुण देव गौतम ने 5 फरवरी 2025 को कार्यवाहक डीजीपी के तौर पर प्रभार लिया था। अब 16 मई 2026 को जारी आदेश में उनकी नियुक्ति उसी दिनांक से प्रभावी बताई गई है। इसका सीधा अर्थ यह निकाला जा रहा है कि उनकी नियुक्ति का कार्यकाल केवल शेष अवधि के लिए माना जाएगा, यानी करीब 8 महीने ही। जबकि उनकी सेवानिवृत्ति जुलाई 2027 में होनी है। सरकार ने उन्हें वो अतिरिक्त पांच महीने भी देना जरूरी नहीं समझा। इसे राज्य के सबसे वरिष्ठ आईपीएस की गरिमा के भी अनुकूल नहीं समझा जा रहा है।

मालूम हो कि इससे पहले 5 अगस्त 2022 को अशोक जुनेजा को जब यूपीएससी की अनुशंसा के आधार पर पूर्णकालिक डीजीपी बनाया गया था, तब आदेश में स्पष्ट रूप से लिखा गया था कि उन्हें आदेश जारी होने की तारीख से दो वर्ष के लिए नियुक्त किया जाता है।

अशोक जुनेजा, पूर्व डीजीपी।

जब अशोक जुनेजा को पूर्णकालिक डीजीपी बनाया गया तब उनका रिटायरमेंट जून 2023 था। दो वर्ष की नियुक्ति की वजह से उन्हें अगस्त 2024 यानी कि करीब 11 महीने 4 दिन का एक्स्ट्रा मिले।

यानी अशोक जुनेजा के मामले में ‘दो साल का निश्चित कार्यकाल’ दिया गया और अरुण देव गौतम के मामले में ‘प्रभार ग्रहण तिथि’ को आधार बना दिया गया। दिलचस्प यह है कि अशोक जुनेजा को तो सेवानिवृत्ति के बाद भी छह महीने की सेवा वृद्धि दी गई थी।

यहीं से सवाल उठ रहा है कि क्या सरकार ने जानबूझकर ऐसा आदेश निकाला ताकि 8 महीने बाद फिर डीजीपी पद को लेकर नई कवायद शुरू की जा सके?

सत्ता और संगठन में खींचतान की वजह से ऐसा आदेश

हिमांशु गुप्ता, जेल डीजी।

सियासी गलियारों में चर्चा है कि यह सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं थी बल्कि सत्ता और संगठन के बीच खींचतान का मामला बन चुका था।

भाजपा सूत्रों के मुताबिक संघ की पसंद अरुण देव गौतम थे। उनकी ईमानदार अफसर की छवि को देखते हुए संगठन का एक बड़ा वर्ग चाहता था कि वही डीजीपी बनें।

दूसरी तरफ बताते हैं कि उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा 1994 बैच के आईपीएस और जेल डीजी हिमांशु गुप्ता को डीजीपी बनाने के पक्ष में बताए जा रहे थे।

पवन देव, डीजी, पीएचक्यू।

इसी बीच सत्ता के भीतर एक और लॉबी सक्रिय थी, जो भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व से जुड़ी मानी जा रही है। यह वर्ग बैच के आईपीएस पवन देव को डीजीपी के रूप में देखना चाहता था।

यानी डीजीपी की कुर्सी सिर्फ प्रशासनिक नियुक्ति नहीं रही, बल्कि यह सत्ता, संगठन और ब्यूरोक्रेसी के बीच शक्ति संतुलन की लड़ाई बन गई।

अब यही चर्चा सबसे ज्यादा हो रही है कि सरकार ने ऐसा आदेश इसलिए निकाला ताकि अरुण देव गौतम फिलहाल डीजीपी बने रहें, लेकिन उन्हें दो साल का सुरक्षित कार्यकाल न मिले।

यदि आदेश में दो साल का निश्चित कार्यकाल दिया जाता, तो बाकी दावेदार फिलहाल तो इस दौड़ से बाहर हो जाते।
लेकिन ‘प्रभार ग्रहण तिथि से’ नियुक्ति का मतलब यह हुआ कि करीब 8 महीने बाद फिर से डीजीपी पद को लेकर नई चर्चा शुरू हो सकती है।

यानी सरकार ने फिलहाल एक संतुलन साध लिया। संघ की पसंद भी पूरी हो गई और और बाकी दावेदारों के लिए भविष्य का रास्ता भी खुला छोड़ दिया गया।

सरकार के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि सरकार में श्री गौतम को लेकर एक शिकायत आम है कि उनकी मेज पर आने के बाद फाइलें सरकती नहीं,निर्णय पेंडिंग रहते हैं। यह भी दावा किया गया कि श्री गौतम ने कथित तौर पर सरकार की पसंद के कुछ फैसलों को भी रोके रखा था। चर्चा है कि इन्हीं कारणों से गृह मंत्री और उनके बीच दूरियां भी नजर आने लगी थीं।

यूपीएससी से नाम आए एक साल, दबाव की वजह से ऐसा फैसला

सबसे दिलचस्प बात यह है कि यूपीएससी ने 13 मई 2025 को ही राज्य सरकार को डीजीपी पद के लिए पैनल भेज दिया था। सामान्य तौर पर यूपीएससी तीन नाम भेजता है, लेकिन इस बार पात्र अधिकारियों की कमी के कारण सिर्फ दो नाम भेजे गए थे अरुण देव गौतम और हिमांशु गुप्ता। इसके बावजूद राज्य सरकार करीब एक साल तक फैसला नहीं ले सकी।

सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि किसी भी राज्य में लंबे समय तक ‘प्रभारी डीजीपी’ नहीं रखा जा सकता। ‘टी. धंगोपल राव बनाम यूपीएससी’ मामले में कोर्ट ने नियुक्ति में देरी पर कड़ी टिप्पणी भी की थी। इसके बाद भी छत्तीसगढ़ में 15 महीने से भी ज्यादा समय तक प्रभारी डीजीपी ही थे।

यही नहीं, नवंबर 2025 में नवा रायपुर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई डीजी कॉन्फ्रेंस में भी छत्तीसगढ़ की तरफ से ‘कार्यवाहक डीजीपी’ ही शामिल हुए थे। इसे लेकर भी सवाल उठे थे कि आखिर मेजबान राज्य अब तक स्थायी डीजीपी क्यों तय नहीं कर पाया?
यूपीएससी ने भी राज्य सरकार से पूछा था कि आखिर नियमित डीजीपी की नियुक्ति अब तक क्यों नहीं हुई?

ऐसे में माना जा रहा है कि सरकार पर कानूनी और संस्थागत दबाव लगातार बढ़ रहा था। इसलिए आखिरकार नियुक्ति करनी पड़ी।

कई जिलों में एसपी रहे, झीरम कांड के बाद बस्तर आईजी बनाए गए

अरुण देव गौतम 1992 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं। मूल रूप से उत्तर प्रदेश के कानपुर के रहने वाले गौतम ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में एमए और जेएनयू से अंतरराष्ट्रीय कानून में एमफिल किया है।

वे मध्यप्रदेश कैडर से आईपीएस बने थे और बाद में छत्तीसगढ़ कैडर चुना।

उन्होंने कोरिया, रायगढ़, जशपुर, राजनांदगांव, सरगुजा और बिलासपुर जैसे जिलों में एसपी के रूप में काम किया। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में उनकी कार्यशैली को प्रभावी माना जाता है।

2009 के राजनांदगांव नक्सली हमले के बाद उन्हें वहां एसपी बनाकर भेजा गया था। वहीं झीरम घाटी हमले के बाद बस्तर आईजी के रूप में उन्होंने अहम भूमिका निभाई थी।

फिलहाल अरुण देव गौतम डीजीपी बन गए हैं। लेकिन जिस तरीके से आदेश जारी हुआ है, उसने यह साफ कर दिया है कि पुलिस मुख्यालय से लेकर सत्ता के गलियारों तक लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है।

यह भी पढ़ें: छत्तीसगढ़ को मिला स्थायी DGP: 15 महीने से कार्यवाहक डीजीपी की जिम्मेदारी संभाल रहे अरुणदेव गौतम को ही मिली जिम्मेदारी

दानिश अनवर

दानिश अनवर, द लेंस में जर्नलिस्‍ट के तौर पर काम कर रहे हैं। उन्हें पत्रकारिता में करीब 14 वर्षों का अनुभव है। द लेंस से पहले दैनिक भास्‍कर में इन्‍वेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग टीम में सीनियर रिपोर्टर, नवभारत में क्राइम रिपोर्टर, नईदुनिया में स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट और पत्रिका अखबार में रिपोर्टर के तौर पर 10 साल काम किया। इन सभी अखबारों में दानिश अनवर ने विभिन्न विषयों जैसे- क्राइम, पॉलिटिकल, एजुकेशन, स्‍पोर्ट्स, कल्‍चरल और स्‍पेशल इन्‍वेस्टिगेशन स्‍टोरीज कवर की हैं। दानिश को प्रिंट का अच्‍छा अनुभव है। वह सेंट्रल इंडिया के कई शहरों में काम कर चुके हैं।

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