नई दिल्ली। चौंकाने वाला समाचार मध्य प्रदेश से मिल रहा है। अप्रैल 2022 में, लगभग 50 IAS और IPS अधिकारियों (50 Bureaucrats) ने मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के बाहरी इलाके के एक गांव में सामूहिक रूप से कृषि भूमि खरीदी। सोलह महीने बाद, मध्य प्रदेश कैबिनेट ने उसी भूमि पार्सल के पास से गुजरने वाले ₹3,200 करोड़ के वेस्टर्न बायपास प्रोजेक्ट को मंजूरी दे दी।
कुछ महीनों के अंदर, भूमि का उपयोग कृषि से आवासीय में बदल दिया गया, और कीमतें लगभग ₹82 प्रति वर्ग फुट से बढ़कर ₹3,000 प्रति वर्ग फुट तक पहुंच गईं। मध्य प्रदेश में घटी जिस घटना ने शासन व्यवस्था में पहुंच, प्रभाव और निजी निवेश तथा विशेषाधिकार प्राप्त जानकारी के बीच पतली रेखा पर असहज सवाल खड़े कर दिए हैं।
यह विवाद सबसे पहले नौकरशाहों द्वारा अचल संपत्ति रिटर्न (Immovable Property Returns) और भूमि रिकॉर्ड्स के माध्यम से मीडिया रिपोर्ट्स में सामने आया, जो अब एक भूमि सौदे से कहीं बड़ा हो चुका है। इसने प्रशासनिक व्यवस्था में पुराने बहस को फिर से जगा दिया है क्या वरिष्ठ सरकारी अधिकारी उन क्षेत्रों में निवेश कर सकते हैं जहां भविष्य के सार्वजनिक इंफ्रास्ट्रक्चर फैसलों से फायदा होने की संभावना है, जिन्हें वे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर सकते हैं?
अलग अलग अखबारों में छपी रिपोर्ट्स के अनुसार, immovable property returns और रजिस्ट्री रिकॉर्ड्स का हवाला देते हुए, मध्य प्रदेश के साथ-साथ दिल्ली, तेलंगाना, हरियाणा और महाराष्ट्र कैडर के अधिकारियों ने 2022 में भोपाल के पास कोलार क्षेत्र में कृषि प्लॉट्स खरीदे। लगभग 16 महीने बाद, मध्य प्रदेश सरकार ने उस क्षेत्र से गुजरने वाले ₹3,200 करोड़ के वेस्टर्न बायपास प्रोजेक्ट को मंजूरी दी।
11 गुना बढ़ गए दाम
2024 में भूमि को कृषि से आवासीय उपयोग में परिवर्तित कर दिया गया, जिससे इसकी वैल्यू बहुत ज्यादा बढ़ गई। रिपोर्ट्स का दावा है कि डाइवर्जन को मंजूरी मिलने के बाद ही दरें लगभग 11 गुना बढ़ गईं।मुख्य नएहत्वपूर्ण है कि नौकरशाह संपत्ति रखने के हकदार हैं और उन्हें सर्विस कंडक्ट रूल्स के तहत वार्षिक Immovable Property Returns के माध्यम से इसका खुलासा करना होता है।
चिंता का विषय यह है कि क्या विशेषाधिकार प्राप्त प्लानिंग जानकारी का एक्सेस तब असमान मैदान पैदा करता है जब सरकारी अधिकारी उन क्षेत्रों में निवेश करते हैं जो भविष्य के सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े होते हैं। ऐसी कई घटनाएं पहले भी घटी हैं।
मानेसर लैंड स्कैम
सबसे महत्वपूर्ण उदाहरणों में से एक हरियाणा का कथित मानेसर लैंड स्कैम है। CBI और ED जांच के अनुसार, 2004-2007 के बीच निजी बिल्डर्स ने किसानों से सैकड़ों एकड़ जमीन खरीदी, जब अफवाह फैली कि सरकार सार्वजनिक प्रयोजन के लिए भूमि अधिग्रहण करेगी।
जांचकर्ताओं ने बाद में आरोप लगाया कि किसानों से सस्ते में जमीन खरीदने के बाद अधिग्रहण प्रक्रिया वापस ले ली गई और डेवलपर्स को लाइसेंसिंग तथा भूमि उपयोग परिवर्तन से फायदा हुआ। CBI का दावा था कि लगभग 400 एकड़ जमीन करीब ₹100 करोड़ में खरीदी गई, जबकि उस समय बाजार मूल्य ₹1,500 करोड़ के आसपास था।
2018 में सुप्रीम कोर्ट ने अधिग्रहण प्रक्रिया रद्द कर दी और आगे जांच का आदेश दिया। पूर्व हरियाणा मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा और कई नौकरशाहों पर बाद में CBI ने चार्जशीट दायर की।महत्वपूर्ण अंतर यह है कि मानेसर अंततः आपराधिक जांच बन गया जिसमें साजिश, धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार के आरोप थे। मध्य प्रदेश का मामला अभी उस स्तर तक नहीं पहुंचा है।
अमरावती कैपिटल का मामला
आंध्र प्रदेश की अमरावती कैपिटल विवाद ने भी इसी तरह के सवाल उठाए।2014 में आंध्र प्रदेश के विभाजन के बाद, विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि राजनीतिक रूप से जुड़े व्यक्तियों ने आधिकारिक घोषणा से पहले उन गांवों में जमीन खरीदी जो प्रस्तावित राजधानी क्षेत्र में शामिल किए गए। कई मामले और जांच हुईं, हालांकि मामला काफी politicised और कानूनी रूप से विवादित हो गया।
भूमि अधिग्रहण में सरकार की मनमानी
इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स सार्वजनिक विश्वास पर निर्भर करते हैं क्योंकि सरकारें भूमि पर असाधारण शक्ति रखती हैं। वे इसे अधिग्रहित कर सकती हैं, जोनिंग बदल सकती हैं, डायवर्ट कर सकती हैं और नीति फैसलों के माध्यम से इसके बाजार मूल्य को बहुत खासा बदल सकती हैं।
यदि नागरिक यह विश्वास करने लगें कि अंदरूनी लोग जनता को पता चलने से पहले ही फैसलों से व्यवस्थित रूप से मुनाफा कमाते हैं, तो राज्य संस्थानों में विश्वास कमजोर हो सकता है।










