छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक सुकून भरा फैसला दिया कि किसी भी व्यक्ति को अपने निजी घर में शांतिपूर्ण प्रार्थना सभा आयोजित करने के लिए अब किसी प्रकार की पूर्व अनुमति लेने की जरूरत नहीं है। आज के नफरत भरे समय में यह फैसला सिर्फ सुकून नहीं देता बल्कि इसे अभूतपूर्व कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। न्यायाधीश नरेश कुमार चंद्रवंशी की अध्यक्षता वाली सिंगल बेंच ने अपने फैसले में कहा कि यह सिर्फ एक याचिका नहीं, बल्कि निजी धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ा मामला है। उन्होंने आदेश में लिखा कि केवल प्रार्थना सभा आयोजित करने के आधार पर पुलिस का हस्तक्षेप उचित नहीं माना जा सकता।
अभूतपूर्व यह है कि आज जब देश में तमाम लोकतांत्रिक और संवैधानिक संस्थाएं हिली हुई नजर आती हैं, तब ऐसे समय में कहीं से संविधान की याद दिलाता हुआ कोई फैसला सुकून भरा है। आज देश में अल्पसंख्यक, खासतौर पर मुस्लिम, ईसाई और देश के एक हिस्से में बौद्ध भी नफरत की भेंट चढ़ रहे हैं। विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल जैसे कट्टर हिंदुत्ववादी संगठन जिस तरह कानून को हाथ में लेकर सरेआम उन्मादी कार्रवाइयां कर रहे हैं, वह इस देश के लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए बेहद चिंता की बात है। तकलीफदेह यह है कि इन्हें सत्ता और सत्ता के दबाव में विभिन्न संवैधानिक संस्थाओं का संरक्षण भी मिलता रहता है।
छत्तीसगढ़ से लेकर उत्तर प्रदेश तक और राजस्थान से लेकर असम तक हमने ऐसी घटनाओं में पुलिस नाम की एक खामोश और पक्षपाती संस्था के रूप में देखा है। अपवादों को छोड़ दें तो आज देश में बड़े पैमाने पर उन्माद के आगे घुटने टेकती पुलिस और प्रशासन की घटनाएं सामने आ रही हैं। इस माहौल में सबसे ज्यादा खतरे में अगर कुछ है, तो वह न्याय, नागरिक की निजता, धार्मिक आस्था, हर नागरिक का अधिकार और समानता के मूल्य का है। ऐसे भी उदाहरण हैं जहां यह महसूस हुआ कि निचले स्तर से लेकर उच्चतम स्तर तक न्यायपालिकाओं से भी इन मूल्यों को सही ढंग से जीवित रखने की अपनी जिम्मेदारी में चूक हुई है।
जब देश में संविधान पर ही खतरे के बादल मंडराते नजर आते हैं, तब न्याय के एक उच्च मंच से संविधान के हक में आया कोई फैसला सुकून देता है और उम्मीदें खत्म नहीं होने देता। अब उम्मीद यह है कि बिलासपुर हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद कार्यपालिका, खास तौर पर पुलिस, यह सुनिश्चित करेगी कि इस प्रदेश में अब एक भी घटना ऐसी न हो जिसमें किसी व्यक्ति की धार्मिक आस्था के अधिकार पर हमला हो, चाहे वह किसी भी धर्म से जुड़ा हो।
आज के माहौल में इस एक फैसले के बाद कायदे से तो प्रदेश सरकार की जिम्मेदारी बन जाती है कि वह इस बात की निगरानी करे कि अल्पसंख्यक सुरक्षित रहें, प्रदेश में कानून का राज रहे और संविधान का इकबाल बुलंद रहे।
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