नई दिल्ली। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने गुरुवार को राज्यसभा में कांग्रेस की आलोचना करते हुए उस पर आरोप लगाया कि वह बढ़ते सार्वजनिक ऋण पर चिंता जता रही है, जबकि साथ ही सरकार पर राज्यों को अधिक धनराशि जारी करने का दबाव डाल रही है। आज राज्यसभा में निर्मला सीतारमण और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बीच जमकर बहस हुई।
केंद्रीय बजट 2026-27 पर हुई बहस का जवाब देते हुए सीतारमण ने कहा कि विपक्ष अपने रुख में असंगतता दिखा रहा है।उन्होंने कहा, ‘कांग्रेस बढ़ते कर्ज को लेकर मगरमच्छ के आंसू बहाती है। वहीं दूसरी ओर, वे हमसे और अधिक कर्ज लेने और राज्यों को अतिरिक्त धनराशि जारी करने के लिए कहते हैं।’
वित्तीय विवेक पर जोर देते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार अत्यधिक उधार लेने से बचने के सिद्धांत का पालन करती है।उन्होंने कहा, ‘सरकार अंधाधुंध कर्ज नहीं ले सकती। यही सिद्धांत हमारा मार्गदर्शक है।’
वित्त मंत्री ने आगे कहा कि जहां विपक्ष अधिक खर्च पर ध्यान केंद्रित करता है, वहीं सरकार मापने योग्य परिणामों को प्राथमिकता देती है।
उन्होंने कहा, ‘हम राज्यों को वित्तीय सहायता देने में संकोच नहीं करते, लेकिन हम परिणाम चाहते हैं। वे खर्च को लेकर चिंतित हैं; हम परिणामों को लेकर चिंतित हैं।’
इस बहस में सीतारमण और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे के बीच तमिलनाडु की वित्तीय स्थिति को लेकर तीखी नोकझोंक भी देखने को मिली।
डीएमके सांसद पी. विल्सन द्वारा बढ़ते राष्ट्रीय ऋण के संबंध में उठाई गई चिंताओं का जवाब देते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि ऋण में कमी लाना केंद्र और राज्यों दोनों की साझा जिम्मेदारी है।
उन्होंने कहा, ‘चाहे केंद्र सरकार हो या राज्य सरकार, सभी को कर्ज कम करने की दिशा में काम करना होगा।’
तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एडप्पाडी के. पलानीस्वामी के बयानों का हवाला देते हुए, सीतारमण ने राज्य के पिछले कुछ वर्षों के ऋण लेने के रुझान का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि कई दशकों में लगातार सरकारों ने लगभग 5 लाख करोड़ रुपये का कर्ज जमा कर लिया है, और आरोप लगाया कि इसमें से एक बड़ा हिस्सा हाल के वर्षों में जोड़ा गया है।
उनकी टिप्पणियों पर विपक्षी बेंचों से विरोध शुरू हो गया जिसमें नेता प्रतिपक्ष खरगे ने केंद्रीय बजट पर बहस के दौरान तमिलनाडु के वित्त पर चर्चा की प्रासंगिकता पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा, ‘आप तमिलनाडु के बजट पर बोल रही हैं या केंद्रीय बजट पर? इसका इस सदन के कार्य से कोई लेना-देना नहीं है। यह उचित नहीं है।’
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