7 साल, 62 केस, सजा 0, सबूतों की कमी ने उत्तराखंड धर्मांतरण कानून UFRA को किया फेल

अंग्रेजी अखबार द इंडियन एक्सप्रेस की विशेष जांच रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि उत्तराखंड सरकार द्वारा 2018 में लागू किए गए उत्तराखंड फ्रीडम ऑफ रिलिजन एक्ट (UFRA) के तहत पिछले सात सालों में दर्ज मामलों में बुनियादी कानूनी सबूतों की कमी साबित हुई है। रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर 2025 तक कुल 62 मामले दर्ज हुए लेकिन पूर्ण सुनवाई (ट्रायल) तक पहुंचे केवल 5 मामलों में सभी आरोपी बरी हो गए। कोई भी दोषसिद्धि नहीं हुई, जिससे कानून की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

यह कानून भाजपा सरकार के सत्ता में आने के एक साल बाद 2018 में बनाया गया था, इसका उद्द्येश्य कथित तौर पर जबरदस्ती, धोखाधड़ी, लालच, अनुचित प्रभाव या शादी के बहाने धर्म परिवर्तन को रोकना है। 2022 में सजा बढ़ाई गई (2-10 साल तक), और 2025 में और सख्त प्रावधान किए गए सजा 3 से 10 साल, चरम मामलों में 20 साल या उम्रकैद तक। हालांकि, 2025 संशोधन अभी पूरी तरह अधिसूचित नहीं हुआ, क्योंकि राज्यपाल ने क्लेरिकल एरर्स ठीक करने के लिए वापस भेज दिया।

मामलों की संख्या 2022 संशोधन के बाद तेजी से बढ़ी, 2023 में 20 और 2025 में सितंबर तक 18 मामले दर्ज हुए। आरटीआई के तहत 30 आवेदनों से प्राप्त 51 मामलों के कोर्ट रिकॉर्ड्स (13 जिलों से) के विश्लेषण से पता चलता है कि कम से कम 7 मामले बीच में ही खारिज हो गए, शिकायतकर्ता के मुकर जाने (hostile हो जाना), सबूतों की कमी और जबरदस्ती/प्रलोभन साबित न होने के कारण। केवल पांच मामले ही थे जिनमें सुनवाई पूरी की गई और यह पांचो मामलों में आरोपियों को कोर्ट ने बरी कर दिया है यानी यह पांचो ही मामले अदालत में टिक नहीं पाए यह सात मामले अदालत में खारिज कर दिए हैं 29 मामलों में जिम आरोपियों को जमानत मिली उनमें से 11 को उत्तराखंड हाई कोर्ट से जमानत मिली और एक को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिली इसके अलावा तीन मामलों में जमानत देने से कोर्ट ने इनकार कर दिया।

अदालतों ने अक्सर सहमति वाले रिश्ते, विरोधाभासी बयान या पुलिस की प्रक्रियागत खामियों का हवाला देकर जमानत दी। कई मामलों में तीसरे पक्ष (जैसे हिंदू संगठन VHP या अन्य) ने शिकायत की, जबकि कानून में केवल पीड़ित या उसके निकट परिजन ही शिकायत कर सकते हैं। ज्यादातर केस अंतर-धार्मिक विवाह या रिश्तों से जुड़े हैं, जहां अदालतें सहमति पर जोर देती हैं। कुछ में POCSO, बलात्कार या अपहरण के आरोप भी जोड़े गए, लेकिन सबूत कमजोर पाए गए।

इंटरफेथ जोड़ों द्वारा परिवार से सुरक्षा मांगने पर भी FIR दर्ज हुईं, लेकिन ज्यादातर में राहत मिली या केस रद्द हुए। उदाहरणस्वरूप, अमन सिद्दीकी उर्फ अमन चौधरी के मामले में परिवारों द्वारा तय शादी में हलफनामा दिया गया था कि महिला इस्लाम में नहीं बदलेगी, फिर भी उन्हें छह महीने जेल काटनी पड़ी। सुप्रीम कोर्ट ने 19 मई 2025 को जमानत दी। इसी तरह पादरी नरेंद्र सिंह बिष्ट, विनोद कुमार और अन्य मामलों में अभियोजन पक्ष जबरदस्ती साबित नहीं कर सका।

उत्तराखंड पुलिस ने रिपोर्ट पर कोई टिप्पणी नहीं की। कुल मिलाकर, कानून के सात साल बाद भी कोई सजा नहीं हुई, जिससे यह साबित होता है कि जबरन धर्मांतरण के दावों में ठोस सबूतों की कमी है और कानून का इस्तेमाल अक्सर स्वैच्छिक रिश्तों या धार्मिक गतिविधियों पर दबाव बनाने के लिए हो रहा है।

पूनम ऋतु सेन

पूनम ऋतु सेन युवा पत्रकार हैं, इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में बीटेक करने के बाद लिखने,पढ़ने और समाज के अनछुए पहलुओं के बारे में जानने की उत्सुकता पत्रकारिता की ओर खींच लाई। विगत 6 वर्षों से वीमेन, एजुकेशन, पॉलिटिकल, हेल्थ, लाइफस्टाइल से जुड़े मुद्दों पर लगातार खबर कर रहीं हैं और सेन्ट्रल इण्डिया के कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अलग-अलग पदों पर काम किया है। द लेंस में बतौर जर्नलिस्ट कुछ नया सीखने के उद्देश्य से फरवरी 2025 से सच की तलाश का सफर शुरू किया है।

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