रायपुर। जब बस्तर (Bastar) में माओवाद की जड़ें मजबूत थीं और अंदरूनी इलाकों में ग्रामीणों के लिए सरकारी योजनाओं तथा बैंकिंग सेवाओं तक पहुंच आसान नहीं थी, उस दौर में कोंडागांव जिले की बड़े डोंगर शाखा में बैंक ऑफ इंडिया के तत्कालीन शाखा प्रबंधक पर गरीबों और ग्रामीण समुदायों से जुड़े खातों में 36.79 लाख रुपये की कथित वित्तीय हेराफेरी का आरोप लगा। राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण एवं एंटी करप्शन ब्यूरो (ईओडब्ल्यू/एसीबी) ने पूर्व शाखा प्रबंधक भावेश विश्वकर्मा के खिलाफ विशेष न्यायालय में करीब 1,500 पन्नों का चालान पेश किया है।
एजेंसी के मुताबिक, मामला कार्यालय, फसल बीमा, ग्राहकों और स्वयं सहायता समूहों के खातों से जुड़े कथित अनधिकृत लेनदेन का है। आरोप है कि बैंक की आंतरिक बैंकिंग प्रणाली में अन्य अधिकारियों की जानकारी और सहमति के बिना उनकी यूजर आईडी तथा पासवर्ड का इस्तेमाल कर लेनदेन किए गए। कुल 36 लाख 79 हजार 323 रुपये की राशि बैंक के खातों से आरोपी के व्यक्तिगत खाते तथा अन्य खातों में स्थानांतरित किए जाने का आरोप है।
फसल बीमा और स्व सहायता समूहों से जुड़े खातों का उल्लेख इस मामले को महज बैंकिंग अनियमितता से आगे ले जाता है। ये व्यवस्थाएं ग्रामीण परिवारों की आजीविका, कृषि जोखिमों और सामूहिक आर्थिक गतिविधियों से जुड़ी होती हैं।
ये।प्रकरण जिस दौर का है तब बस्तर माओवाद से प्रभावित था और यह इलाका खासतौर पर माओवादियों का गढ़ माना जाता था।
एजेंसी ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि कथित रूप से निकाली गई राशि में से कितनी रकम फसल बीमा के लाभार्थियों, स्वयं सहायता समूहों या अन्य ग्राहकों के खातों से संबंधित थी। यह भी स्पष्ट नहीं है कि कितने खाताधारक सीधे प्रभावित हुए।
एजेंसी के मुताबिक, भावेश विश्वकर्मा 25 जून 2019 से 18 जनवरी 2022 तक बैंक ऑफ इंडिया की बड़े डोंगर शाखा में शाखा प्रबंधक के पद पर पदस्थ थे। कथित अनियमितताएं इसी अवधि से संबंधित हैं। जांच के दौरान दस्तावेजों, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों और गवाहों के बयानों के आधार पर अभियोजन के लिए पर्याप्त साक्ष्य मिलने का दावा किया गया है।
बैंक ने विभागीय कार्रवाई के बाद 27 सितंबर 2022 को विश्वकर्मा की सेवाएं समाप्त कर दी थीं। अब ईओडब्ल्यू/एसीबी ने आपराधिक मामले में चालान पेश किया है। विभागीय कार्रवाई और आपराधिक अभियोजन अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं।
एजेंसी के मुताबिक, आरोपी के खिलाफ 4 अप्रैल 2022 को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 13(1)(c) और 13(2) के तहत मामला दर्ज किया गया था। ये प्रावधान लोकसेवक द्वारा संपत्ति के बेईमानी से दुरुपयोग और आपराधिक कदाचार से संबंधित हैं। अधिनियम में 2018 में संशोधन किया गया था।











