गिग वर्करः रफ्तार पर रोक, चुनौतियां कम नहीं

January 14, 2026 8:14 PM
10-minute delivery rule abolished

केंद्रीय श्रम मंत्रालय ने फटाफट डिलीवरी करने वाले ऐप आधारित ई-कॉमर्स की दस मिनट डिलीवरी व्यवस्था पर आखिरकार रोक लगा दी है, जिससे निश्चय ही लाखों गिग वर्कर को राहत मिलेगी। इस रफ्तार ने गिग वर्करों की जिंदगियों को जोखिम में डाल रखा था।

भोजन और तमाम तरह की घरेलू जरूरत की चीजों की डिलीवरी से जुड़ी ब्लिंकिट, स्वैगी, जोमैटो और जेप्टो जैसी कंपनियों के लाखों गिग वर्करों की ओर देश का ध्यान 31 दिसंबर को तब गया था, जब उन्होंने दस मिनट में डिलीवरी करने के दबाव सहित अन्य मांगों को लेकर हड़ताल कर दी थी।

बीते एक दशक के दौरान जिस तेजी से फटाफट डिलीवरी से जुड़ी कंपनियों के कारोबार बढ़े हैं, उसके कारण आम लोगों की जीवन शैली में भी बदलाव आया है। दूसरी ओर तेजी से बढ़ते इस कारोबार के बावजूद घरों में डिलीवरी करने वाले लाखों गिग वर्कर पर भी लगातार दबाव बढ़ता गया है।

दरअसल मुश्किल यह है कि गिग वर्कर न तो औपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों में गिने जाते हैं और न ही अनौपचारिक क्षेत्र के। एक तरह के अनुबंध से ये अपनी कंपनियों से बंधे होते हैं और उन्हें प्रति डिलीवरी के हिसाब से भुगतान किया जाता है।

जाहिर है, कंपनियां उन्हें अपना कर्मचारी नहीं मानतीं। इस दौर की नई परिभाषा में वे उनके पार्टनर हैं! लेकिन स्याह सचाई यह है कि उनकी स्थिति कुशल या अर्ध कुशल या अकुशल श्रमिकों से भी बदतर है।

गिग वर्कर्स को औपचारिक रूप से भारत के कानूनी ढांचे में नई श्रम संहिता, सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 में संगठित और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के साथ जोड़ा गया है। इसके मुताबिक गिग वर्कर पारंपरिक नियोक्ता-कर्मचारी संबंध के बाहर हैं।

दरअसल यह व्यवस्था फटाफट डिलीवरी देने वाली ऐप आधारित कंपनियों को हर तरह की जवाबदेही से मुक्त कर देती है। बेशक कुछ कंपनियों में गिग वर्कर की सोशल सिक्योरिटी और न्यूनतम डिलीवरी जैसी व्यवस्थाएं हैं, लेकिन आम तौर पर उनका हाल मानसून पर निर्भर सीमांत किसानों जैसा है!

गिग वर्करों की दुश्वारियों को देश में रोजगार के व्यापक परिदृश्य में देखने की भी जरूरत है, जहां उन्हें सिर्फ आंकड़ा मान लिया गया है। जबकि उनका यह रोजगार पूरी तरह से अनिश्चित और संबंधित कंपनियों की मेहरबानियों पर निर्भर है।

नीति आयोग की 2022 की एक रिपोर्ट के मुताबिक गिग वर्करों की संख्या 2030 तक 2.35 करोड़ हो जाएगी। ऐसे में यह और भी जरूरी हो जाता है कि सरकार उन्हें औपचारिक रूप से श्रम संहिता के दायरे में लाए और उन्हें भी पीएफ, मेडिकल इंश्योरेंस और अन्य तरह की सामाजिक सुरक्षा दी जाएं। अच्छा हो कि सरकार आगामी बजट में इसके लिए प्रावधान करे।

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