रायपुर। छत्तीसगढ़ में पारित धर्मांतरण विरोधी कानून को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल), छत्तीसगढ़ और न्याय, जवाबदारी एवं अधिकारों के लिये राष्ट्रीय समन्वय (नजर) ने इस कानून को संविधान विरोधी बताते हुए इसे तत्काल निरस्त करने की मांग की है। दोनों संगठनों का कहना है कि यह अधिनियम नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता, अंतरात्मा की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकारों पर गंभीर आघात है। रायपुर में आयोजित एक दिवसीय सम्मेलन ‘छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम का सच’ में यह मुद्दा प्रमुखता से उठा, जहां कई सामाजिक कार्यकर्ताओं, वकीलों और विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधियों ने कानून के प्रभावों पर चिंता जताई।
सम्मेलन में वक्ताओं ने कहा कि यह कानून राज्य में बहुलतावादी समाज को प्रभावित कर सकता है और धार्मिक पहचान के आधार पर सामाजिक विभाजन को बढ़ावा दे सकता है। फूलसिंह कचलाम ने आरोप लगाया कि धर्मांतरण का मुद्दा आदिवासी समाज को बांटने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे उनके सामूहिक संघर्ष कमजोर पड़ रहे हैं। वहीं पूर्व सरपंच राजमन सलाम ने अपने अनुभव साझा करते हुए सामाजिक बहिष्कार और उत्पीड़न के मामलों का उल्लेख किया। अन्य वक्ताओं ने कहा कि ऐसे कानून धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ भय और दबाव का वातावरण बनाते हैं और सामाजिक तनाव को बढ़ाते हैं।
दूसरे और तीसरे सत्र में विशेषज्ञों ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 25 हर नागरिक को धर्म की स्वतंत्रता देता है, लेकिन इस कानून में पूर्व अनुमति, प्रशासनिक निगरानी और कठोर दंड जैसे प्रावधान नागरिकों के निजी जीवन में हस्तक्षेप करते हैं। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के अनुभवों का हवाला देते हुए कहा गया कि ऐसे कानूनों का उपयोग कई बार अंतरधार्मिक विवाहों और व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं पर दबाव बनाने में हुआ है। वक्ताओं ने इसे लोकतांत्रिक मूल्यों और बहुलतावादी परंपरा के खिलाफ बताया।
सम्मेलन के अंत में कई प्रस्ताव पारित किए गए, जिनमें इस कानून को अस्वीकार करने, अंतरधार्मिक विवाहों की स्वतंत्रता का समर्थन करने और स्कूलों में धार्मिक गतिविधियों को अनिवार्य करने का विरोध शामिल है। साथ ही यह निर्णय लिया गया कि कानून को न्यायालय में चुनौती दी जाएगी और इसके खिलाफ व्यापक जन अभियान चलाया जाएगा। पीयूसीएल और नजर ने राज्य सरकार से इस अधिनियम को तुरंत वापस लेने की मांग करते हुए कहा कि लोकतंत्र में राज्य की भूमिका नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा करना है, न कि उन पर नियंत्रण बढ़ाना।








