नई दिल्ली। भारत के हाल के ब्रिक्स नौसैनिक अभ्यास में भाग नहीं लेने से वैश्विक रणनीतिक और कूटनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। भारत के चाबहार परियोजना से बाहर होने की खबरें पहले से सुर्खियों में है। अब कहा जा रहा है कि यह निर्णय भी अमेरिकी दबाव में लिया गया है।
इस संयुक्त नौसैनिक अभ्यास का नाम “Will for Peace 2026” रखा गया था और यह दक्षिण अफ्रीका के कोस्ट के पास आयोजित किया गया। इसमें चीन, रूस, दक्षिण अफ्रीका सहित कई देशों की नौसेनाएं शामिल रहीं, लेकिन भारत का नाम सूची में नहीं था।
सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों ने बताया कि भारत की राजनीतिक और रणनीतिक प्राथमिकता इस ब्लॉक को आर्थिक और विकास संबंधी मंच के रूप में बनाए रखने की है, न कि इसे सैन्य गठबंधन की तरह प्रस्तुत करने की। इसी कारण से भारत ने इस अभ्यास से दूरी बनाए रखी।
विश्लेषकों का कहना है कि भारत का यह निर्णय चीन की मौजूदगी वाले सैन्य अभ्यास में शामिल न होने का एक स्पष्ट संकेत भी है, क्योंकि भारत और चीन के बीच संवैधानिक सीमा विवाद और सुरक्षा मुद्दे का मामला अभी भी संवेदनशील है। इन्हीं कारणों से भारत ने रक्षा सहयोग को सीमित रखा है और अपने रणनीतिक स्वायत्तता पर बल दिया है।
भारत ने यह भी ध्यान में रखा है कि अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के साथ विकसित रणनीतिक साझेदारियाँ बनाए रखना उसके हित में है, और किसी सैन्य मंच में शामिल होने से यह संतुलन प्रभावित हो सकता है।
BRICS समूह की स्थापना मुख्य रूप से आर्थिक, वित्तीय और विकास सहकारिता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से हुई थी, और भारत इसी उद्देश्य पर अपने फोकस को बनाए रखना चाहता है।










