नई दिल्ली। दिल्ली में एक न्यूज रूम ऐसा है जहां दो माइक्रोवेव रखे हैं – एक में शाकाहारी और दूसरे में मांसाहारी भोजन गर्म किया जाता है। इसमें भला किसी को क्या दिक्कत हो सकती है ? पर जब ये पता चलता है कि इस न्यूज रूम से एक के बाद एक मुस्लिम पत्रकार बाहर हो रहे हैं तो सवाल उठता है कि आखिर वहां पक क्या रहा है? और जब आप यह जानेंगे कि यह न्यूज रूम उस संस्थान का है जिसे हिंदुस्तान में कभी पत्रकारों का मक्का कहा जाता था तो हैरानी ही नहीं ,सवाल भी उठना लाजिमी है!
जी हां यह न्यूजरूम है हिंदुस्तान में बीबीसी की हिंदी सेवा का जिसका दिल्ली में दफ्तर अब कलेक्टिव न्यूज रूम के नाम से संचालित है– यह हिंदुस्तान में बीबीसी की पत्रकारिता की नई कंपनी है।

वही बीबीसी जिस पर पिछले दिनों मोदी सरकार ने छापा डाला था और उसके बाद पत्रकारों में चर्चा है कि अब वहां पत्रकारिता के माइक्रोवेव में जो पक रहा है उसमें बीबीसी की अपनी पहचान वाली खुशबू नहीं रही।
बीबीसी छोड़ चुके एक पत्रकार ने दिलचस्प जानकारी दी।
कुछ दिनों पहले एक बैठक हुई जिसमें मांसाहार और शाकाहार का मुद्दा उठा तो यह तय हुआ कि पैंट्री में दो माइक्रोवेव रखे जायेंगे – एक शाकाहार के लिए और दूसरा मांसाहार के लिए।इस बैठक में बीबीसी,भारत के नए संस्थान ‘कलेक्टिव न्यूज रूम’ के सीईओ और पत्रकार शामिल थे।दो माइक्रोवेव को लेकर हुई चर्चा और इसके इंतजाम को बीबीसी का नया दिलचस्प चेहरा कहा गया।
इस पत्रकार ने दावा किया कि आज भी बीबीसी के न्यूज रूम में बातचीत में शायद गैरबराबरी नजर ना आए लेकिन दफ्तर के भीतर दलित,हिन्दू मुस्लिम की वाइब्ज अब महसूस की जाती हैं।
इस पर पत्रकार और पत्रकारिता के प्रेक्षक अब खुल कर बातें करते हैं। बल्कि द मूकनायक की संस्थापक और दलित पत्रकार मीना कोतवाल के प्रकरण को लें तो यहां तक कह सकते हैं कि बीबीसी हिंदी में जातिगत और धार्मिक भेदभाव की घटनाएं नई नहीं हैं।
पत्रकारों में चर्चा है कि मीना कोतवाल को 2011 में इसी किस्म के भेदभाव की वजह से नौकरी छोड़नी पड़ी थी।
तब मीना के साथ हुए कथित भेदभाव को लेकर न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपने एक आर्टिकल में लिखा था कि जब उन्होंने अपनी इस शिकायत को बीबीसी लन्दन स्थित अधिकारियों तक पहुंचाया तो बाद में उन्हें पता चला कि उनका कॉन्ट्रैक्ट रिन्यू नहीं किया गया है।
इसके बाद उनकी शिकायत भी खारिज कर दी गई।
न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक बीबीसी ने इसे अंदरूनी मामला बता कर जवाब देने से भी इंकार कर दिया।
अब जिस बात को लेकर दिल्ली के पत्रकारों में बीबीसी ,भारत का ‘कलेक्टिव न्यूज रूम’ चर्चा में आया है वो हैरान करने वाला ही नहीं चिंता का भी कारण है।
चर्चा इस बात को लेकर है कि अचानक बीबीसी हिंदी सेवा से मुस्लिम पत्रकार अलग होने लगे हैं। क्यों ?
बीबीसी से जुड़े एक पत्रकार ने नाम ना छापने की शर्त पर कहा कि यकीन नहीं होगा लेकिन बीबीसी के इस दफ्तर में हिंदू,मुस्लिम,दलित का माहौल पहले भी रहा है।यह स्थिति तब और खुल कर सामने आई जब देश की क्षेत्रीय भाषाओं में कंटेंट टीम गठित की गई।
इस पत्रकार का यह ऑब्जर्वेशन कम चौंकाने वाला नहीं है कि कई पत्रकारों को जानबूझ कर ऐसी परिस्थितियों में उलझाया गया जिससे वो नौकरी से इस्तीफा ही दे दें।
The lens इस ऑब्जर्वेशन की पुष्टि नहीं करता लेकिन लेकिन बीबीसी से जुड़े और बीबीसी छोड़ चुके अनेक पत्रकारों ने अलग–अलग इस ऑब्जर्वेशन को आरोप की शक्ल में कहा।
देश और दुनिया में स्वतंत्र पत्रकारिता की अगुवाई कर रहे बीबीसी के भीतर जो कुछ घट रहा है वो आज मुस्लिम पत्रकारों के खिलाफ भेदभाव के आरोपों की शक्ल में सामने है।
तथ्य यह है कि पिछले दो वर्षों में कम से कम चार मुस्लिम पत्रकारों ने बीबीसी हिंदी सेवा छोड़ दी।
इनमें से कम से कम तीन ने तो सीधे उन परिस्थितियों को जिम्मेदार ठहराया जो कथित रूप से आज वहां निर्मित हैं।
उल्लेखनीय है कि आज बीबीसी हिंदी ‘कलेक्टिव न्यूज रूम’ के नाम से बनी जिस कंपनी के जरिए भारत में संचालित है उसका नेतृत्व वरिष्ठ पत्रकार रूपा झा और मुकेश शर्मा करते हैं।
बीबीसी से जुड़े इन पत्रकारों ने नाम ना देने के आग्रह के साथ The lens से कहा कि अब काम की परिस्थितियां बीबीसी की अपनी परंपराओं और उन समतावादी मानदंडों के अनुकूल नहीं हैं जिनके लिए बीबीसी जाना जाता था और पत्रकारों का मक्का जैसे विशेषणों से पहचाना जाता था ।
किन मुस्लिम पत्रकारों की गई नौकरियां

जब ‘कलेक्टिव न्यूज रूम’ अस्तित्व में आया उस समय ज़ुबैर अहमद , जो बीबीसी के बहुत वरिष्ठ संवाददाता थे,उनकी नौकरी गई।
इसी तरह वरिष्ठ पत्रकार फैसल मोहम्मद अली,जो लगभग पांच वर्ष बीबीसी के मध्य भारत संवाददाता रहे,उन्होंने कंपनी की नौकरी छोड़ दी।
इसके अलावा माजिद जहांगीर, मोअज्ज़िज़ इमाम, सलमान रावी और इलमा हसन को बीबीसी को अलविदा कहना पड़ा।
मोअज्ज़िज़ इमाम का कहना था कि बीबीसी में हमें वो स्वतंत्रता नहीं थी जो होनी चाहिए थी,सो हमने अपना अलग काम करने की योजना बनाई है।
फैसल मोहम्मद अली ने The lens से कहा कि उन्हें कोलकाता ब्यूरो शुरू करने के लिए भेजा जा रहा था पर उन्होंने इंकार कर दिया क्योंकि तब तक उन्हें लगने लगा था कि कुछ अच्छा नहीं होने वाला है।
खबर है कि एक पत्रकार ने बनारस में हो रही बुलडोजिंग पर मोदी सरकार के विरुद्ध एक ऐसी स्टोरी की जिससे आरएसएस को नुकसान था।
वो पत्रकार अब बीबीसी में नियमित श्रेणी में नहीं है।
वरिष्ठ पत्रकार सलमान रावी का मामला तो गजब का बताया जा रहा है।
उन्हें भोपाल से कोलकाता स्थानांतरित किया गया जहां वे जाना नहीं चाहते थे,लेकिन आदेश था तो गए।
काम से जुड़ी अंदरूनी परेशानियों के कारण उन्होंने अपने दफ्तर को बस एक मैसेज भेजा था जिसमें उन्होंने कहा था कि ऐसे परेशान करेंगे तो काम कैसे करेंगे?
बताते हैं कि उनके इस मैसेज को इस्तीफा मान लिया गया !
सलमान रावी के बाद इल्मा हसन को कोलकाता भेजा गया ,छह महीने बाद उनकी नौकरी भी जाती रही।बताया गया कि उनका तो अनुबंध ही एक वर्ष का था जिसे आमतौर पर बढ़ाया भी जाता है पर ऐसा क्या हुआ कि इल्मा हसन को अनुबंध भी पूरा करने से वंचित रखा गया?
सवाल यही उठा कि क्या बीबीसी कर्मचारी मित्र नहीं रहा?
क्या बीबीसी में मुस्लिम पत्रकार ही कथित तौर पर असंतुष्ट रहे या और भी पत्रकारों को ऐसी स्थितियों का सामना करना पड़ा ?
दिल्ली में पत्रकारिता के प्रेक्षक बीबीसी भारत पर कथित रूप से ब्राह्मणवादी होने के पुराने आरोपों को दोहराने लगे हैं और ये ऐसे आरोप थे जिनका बीबीसी ने हमेशा खंडन ही किया है।
अब चर्चित पत्रकार मीना कोतवाल जो कहती हैं वह गौर करने वाली बात है।
उन्होंने The lens से कहा कि एक चीज तो उनके वक्त में भी थी कि बीबीसी,हिंदी में उन्हें कभी कोई पसमांदा मुसलमान नहीं दिखाई दिया।वो अगड़े मुसलमानों को ही पसंद करते थे।
नाखुश हैं पूर्व पत्रकार
वरिष्ठ पत्रकार जितेंद्र कुमार कहते हैं कि बीबीसी अब ब्राह्मणवादी ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन हो गया है।
उनका साफ आरोप था कि दलित और मुस्लिम पत्रकारों को इतना परेशान किया जाता है कि वे नौकरी छोड़ दें और ऐसा होता दिख रहा है।
उन्होंने कहा कि जबसे ‘कलेक्टिव न्यूज रूम’ बना है तबसे स्थिति और खराब हुई है।
वैसे भी दलितों ,बहुजनों की जगह नहीं थी लेकिन जो अंग्रेजों का फॉर्मूला था कि सवर्णों और मुस्लिमों में अगड़ों की उपस्थिति होनी चाहिए थी,वही बीबीसी ,हिंदी में नजर भी आया।
बीबीसी हिंदी के पूर्व प्रमुख रह चुके एक वरिष्ठ पत्रकार अपना नाम ना देने की शर्त के साथ कहते हैं कि बीबीसी पर सरकार के छापे के बाद स्थितियां बहुत बदल गईं हैं।
उन्होंने कहा – ‘आप जिसे पत्रकारिता समझ रहे हैं वो पत्रकारिता वहां है नहीं।लेकिन यह भी सच है कि इसके लिए बीबीसी को जिम्मेदार बताना कहीं से दुरुस्त नहीं है।कंटेंट जेनरेशन की जिम्मेदारी जिनकी है वही इसके लिए जिम्मेदार हैं।’
उन्होंने इस बात से इंकार किया कि उनके वक्त बीबीसी,हिंदी के न्यूज रूम में किसी भी तरह का भेदभाव था ।
वर्तमान में बीबीसी हिंदी की इस कंपनी ‘कलेक्टिव न्यूज रूम’ के एक निदेशक के बारे में तो यह भी दिलचस्प जानकारी मिली कि वो दिल्ली में काम करते हुए आरएसएस के एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने मेरठ चले गए थे।
खबरों की आउट सोर्सिंग से शुरू हुआ भेदभाव

बीबीसी की पहचान तब तक तो अत्यंत महत्वपूर्ण थी ही जब तक बीबीसी रेडियो हुआ करता था।
31 जनवरी 2020 को बीबीसी हिन्दी की रेडियो सेवा बंद कर दी गई।
मार्च 2024 में ‘कलेक्टिव न्यूज रूम’ नाम की एक नई कंपनी अस्तिव में आई जो बीबीसी के लिए कंटेंट जनरेट करने का काम करती थी। बीबीसी इसी कंपनी से खबरें आउट सोर्स करती थी।
रूपा झा इस कंपनी की सीईओ बन गई और मुकेश शर्मा, संजय मजूमदार, सारा हसन आदि कंपनी में पदासीन हो गए ।
यह कंपनी फिलहाल 6 भाषाओं के लिए कंटेंट जेनरेट करती है।
लंबे समय तक बीबीसी को अपनी सेवा देने वाले एक मुस्लिम पत्रकार कहते हैं ‘ तभी से चीजें लगातार बदलने लगी, काम करना लगातार मुश्किल हो रहा था, खबरों को लेकर तमाम तरह के प्रतिबंध लगाए गए।’
मुस्लिमों के लिए मुश्किल होता न्यूज़रूम
स्वतंत्र पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव कहते हैं कि जो भी भेदभाव हो रहा है वह संस्थागत कम व्यक्तिपरक ज़्यादा है।
अभिषेक 2005 की एक घटना की याद दिलाते हैं जब अचला शर्मा भारत में बीबीसी की प्रमुख थी। उसी वर्ष फ़िलिस्तीन में चुनाव हुए थे और हमास भारी मतों से विजयी हुआ था।
अभिषेक श्रीवास्तव याद करते हैं कि उन्होंने बीबीसी में बतौर संवाददाता लिखित परीक्षा पास कर ली थी और इंटरव्यू के लिए गए थे। उनसे पूछा गया कि वे फ़िलिस्तीन को लेकर क्या सोचते है? तो उन्होंने कहा कि वहाँ हमास की सरकार बननी चाहिए।
श्री श्रीवास्तव ने कहा –‘मेरा चयन नहीं हुआ, बाद में मुझे पता लगा कि बीबीसी हमास को एक टेरेटिस्ट ऑर्गेनाइजेशन के तौर पर देखता था इसलिए मेरा जवाब उसकी पॉलिसी के अधीन नहीं था।’
अभिषेक श्रीवास्तव कहते हैं कि बीबीसी में ब्राह्मण संपादकों और शिया मुसलमानों का बोलबाला रहा है। अगर मुसलमानों के साथ किसी प्रकार का भेदभाव वर्तमान में हो रहा है तो निश्चित तौर पर इसकी वजह मीडिल ईस्ट का पिछले कुछ समय से चला आ रहा घटनाक्रम होगा जिसे हर मुसलमान का स्वाभाविक जुड़ाव है।
नाम ना छापने की शर्त पर बीबीसी हिंदी से जुड़े एक पत्रकार कहते हैं कि हाल के दिनों में छोटे बड़े की अपसंस्कृति न्यूज़ रूम में बढ़ गई है, मनमाने ढंग से कंटेंट को नियंत्रित किया जाता है, दक्षिणपंथियों का बोलबाला है और इस प्रवृत्ति को बढ़ाने वालों को खुली छूट मिलने लगी है।
पुराने दिनों को याद करते हुए एक पत्रकार ने ताजा हालात पर एक दिलचस्प वाकया सुनाया।उन्होंने बताया कि ‘कलेक्टिव न्यूज रूम’ के निदेशकों में से एक ने तो एक बार सबके बीच में हँसते हुए यह भी कहा कि मैं अब निदेशक हूँ तहज़ीब से रहा करो। इस पत्रकार ने कहा कि यह बीबीसी की काम की परंपरागत संस्कृति के खिलाफ टिप्पणी थी और इसे तब पत्रकारों ने इसी तरह दर्ज भी किया।
‘कलेक्टिव न्यूजरूम’ का जवाब – सवाल किससे है यह स्पष्ट नहीं
शुक्रवार को भेजे गए सवालों के जवाब The lens को बीबीसी के ‘कलेक्टिव न्यूजरूम’ की ओर से शनिवार आधी रात को मिले।
यह बताना आवश्यक है कि लेंस की खबर बीबीसी को लेकर है ना कि बीबीसी की फ्रेंचाइजीनुमा कंपनी ‘कलेक्टिव न्यूजरूम’ को लेकर, लेकिन भारत में बीबीसी का जो चेहरा हैं हमने स्वाभाविक रूप से जवाब के लिए सबसे पहले उनसे संपर्क किया।
उल्लेखनीय है कि ‘कलेक्टिव न्यूजरूम’ वह आउटसोर्सिंग कंपनी है जो बीबीसी हिन्दी के लिए कंटेंट जेनरेट करती है।
हमें इस खबर से जुड़े पांच सवालों को लेकर इसी कलेक्टिव न्यूजरूम की सीईओ रूपा झा की सहायक निष्ठा भाटिया द्वारा जवाब दिया गया।
अपने जवाब में उन्होंने कहा है कि ‘कलेक्टिव न्यूज रूम’ एकदम अलग कंपनी है। उन्होंने पूछा– ‘आपका सवाल बीबीसी से है या ‘कलेक्टिव न्यूज रूम’ से? अगर बीबीसी से है तो हम उसका जवाब देने को अधिकृत नहीं हैं।’
उनका जवाब अंग्रेजी में आया है।
हम उनका पूरा जवाब पहले मूल अंग्रेजी में फिर उसका हिंदी अनुवाद भी नीचे दे रहे हैं –
Hello,My name is Nishtha Bhatia. I am the Executive Assistant of the CEO – Collective Newsroom – Rupa Jha.
I see that you have sent a list of queries to her.
Your email will need to be directed to Jyoti Priyadarshi, who handles all complaints and media queries. Her email address is : Jyoti…. She is currently on leave, so there may be a delay in response.
I would also like to clarify an important point. It is not entirely clear from your email whether your queries are intended for Collective Newsroom or for the BBC. Collective Newsroom is an independent Indian company and does not represent the BBC.
If your query relates to the BBC, this is not the appropriate channel, and you would need to reach out directly to the BBC’s media communications team. If your query is regarding Collective Newsroom, then Jyoti will be able to look into this once she is back from leave .
I hope this helps clarifies.
Thanks & RegardsNishtha BhatiaFounder’s Office
इस जवाब का हिंदी अनुवाद
नमस्कार,
मेरा नाम निष्ठा भाटिया है। मैं कलेक्टिव न्यूज़रूम की सीईओ रूपा झा की कार्यकारी सहायक हूँ। मैंने देखा कि आपने उन्हें प्रश्नों की एक सूची भेजी है। आपका ईमेल ज्योति प्रियदर्शी को भेजा जाना चाहिए, जो सभी शिकायतों और मीडिया संबंधी प्रश्नों को संभालती हैं। उनका ईमेल पता है: Jyoti…..।
वे फिलहाल अवकाश पर हैं, इसलिए जवाब देने में देरी हो सकती है। मैं एक महत्वपूर्ण बात स्पष्ट करना चाहूँगी। आपके ईमेल से यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि आपके प्रश्न कलेक्टिव न्यूज़रूम के लिए हैं या बीबीसी के लिए। कलेक्टिव न्यूज़रूम एक स्वतंत्र भारतीय कंपनी है और बीबीसी का प्रतिनिधित्व नहीं करती है।
यदि आपका प्रश्न बीबीसी से संबंधित है, तो यह उचित माध्यम नहीं है, और आपको सीधे बीबीसी की मीडिया संचार टीम से संपर्क करना होगा।
यदि आपका प्रश्न कलेक्टिव न्यूज़रूम से संबंधित है, तो ज्योति अवकाश से लौटने के बाद इस पर विचार कर सकेंगी। आशा है इससे आपको स्पष्टीकरण मिल गया होगा।
धन्यवाद एवं सादर
निष्ठा भाटिया
संस्थापक कार्यालय
The lens का कथन
लेंस की यह रिपोर्ट उस अग्रणी मीडिया संस्थान बीबीसी,हिंदी को लेकर है जो पत्रकारिता और न्यूजरूम से जुड़े अपने मानदंडों को लेकर सुविख्यात रहा है।
यह एक तकनीकी प्रश्न हो सकता है कि हमारे सवाल बीबीसी से हैं या उसकी कंपनी ‘कलेक्टिव न्यूज रूम’ से।
अपने पाठकों की सहूलियत के लिए हम अपने सवाल यहां दे रहे हैं –
1- क्या हाल के वर्षों में कम से कम पांच मुस्लिम पत्रकारों ने बीबीसी को छोड़ा है या फिर इस्तीफा दिया है?
2- क्या कुछ पत्रकारों ने अपने वर्क कॉन्ट्रेक्ट को नियमित से अस्थाई कराया है?
3- क्षेत्रीय भाषाओं में कंटेंट क्रिएशन में कितने दलित और मुस्लिम हैं?
4- क्या बीबीसी की पैंट्री में दो माइक्रोवेव इस्तेमाल किए जा रहे हैं। जिनमें एक में मांसाहारी और एक में शाकाहारी खाना गरम किया जाता है?
5- बीबीसी हिन्दी के वर्कफोर्स में कितने दलित और मुस्लिम हैं
हमारी अपेक्षा है कि इन सवालों का संबंध यदि ‘कलेक्टिव न्यूज रूम’ से है तो हमें वहां से जवाब मिले ताकि हम अपनी रिपोर्ट में उसे जोड़ सकें और यदि इन सवालों का संबंध बीबीसी,हिंदी से है तो हमारा आग्रह है कि इन सवालों को ‘कलेक्टिव न्यूज रूम’ बीबीसी,हिंदी में उस जगह तक पहुंचाने में हमारी मदद कर दे जहां से इन सवालों के जवाब मिल सकें।
हम अपने पाठकों तक निष्पक्ष खबर पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं और इन सवालों के जवाब खबर के दूसरे पक्ष को भी पारदर्शिता के साथ प्रस्तुत करने में सहायक होंगे।











