नेशनल ब्यूरो| नई दिल्ली
कलकत्ता हाईकोर्ट की एकल-न्यायाधीश पीठ ने गुरुवार को टिप्पणी की कि चुनाव आयोग अपने नियम बार-बार बदल रहा है।न्यायमूर्ति कृष्णा राव ने कहा कि यह देखा गया है कि चुनाव आयोग बार-बार अपना रुख बदल रहा है।
अधिसूचना के अनुसार, चुनाव आयोग ने न्यायाधीशों को मतदान अधिकारी के रूप में नियुक्त करने का प्रावधान किया है। न्यायाधीश ने कहा हमें नियुक्त करो, हम जाएंगे और ड्यूटी करेंगे। आप जब चाहे नियम बदल रहे हैं।
यह टिप्पणी कॉलेज के शिक्षकों को चुनाव ड्यूटी पर लगाने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई के दौरान की गई। न्यायमूर्ति कृष्णा राव ने कहा कि चुनाव आयोग की अधिसूचना में न्यायाधीशों को मतदान अधिकारी नियुक्त करने का प्रावधान है।
उन्होंने यह भी कहा कि बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (SIR) के लिए भी न्यायाधीशों को ड्यूटी पर भेजा जा सकता है।चुनाव आयोग के वकील ने तर्क दिया कि याचिका चुनाव से ठीक पहले दाखिल की गई है और नए लोगों को भर्ती कर उन्हें चुनाव ड्यूटी के लिए ट्रेनिंग देने का समय नहीं बचा है।न्यायमूर्ति कृष्णा राव ने तीखा जवाब दिया।
उन्होंने कहा “यह कोई तर्क नहीं हो सकता। अगर चुनाव के बाद याचिका दाखिल की जाए तो अदालत क्या करेगी? अगर अदालत अनियमितताओं पर आँखें मूंद लेगी तो वे जारी रहेंगी।”
आयोग के वकील ने अदालत को बताया कि अगर अब अधिसूचना में हस्तक्षेप किया गया तो सभी 23 जिलों में चुनाव ड्यूटी के लिए नए कर्मियों की नियुक्ति करनी पड़ेगी। न्यायमूर्ति राव ने जवाब दिया: “क्या इसका मतलब यह है कि तुम अनुचित अधिसूचना जारी करोगे और उसे स्वीकार करना पड़ेगा? फिर मैं इस मामले को सुप्रीम कोर्ट भेज रहा हूँ। वहाँ आयोग को यह तर्क देना चाहिए। चूँकि न्यायाधीशों को SIR के लिए नियुक्त किया गया है, तो उन्हें यहाँ भी इस्तेमाल किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट जाओ।”
मामले की अगली सुनवाई शुक्रवार को होगी। इसी पीठ ने साउथ पॉइंट एजुकेशन सोसाइटी नामक स्कूल से चुनाव ड्यूटी के लिए आठ स्कूल बसों की रिक्विजिशन को रद्द कर दिया। अदालत ने इसे मनमाना और कानूनी रूप से अस्थिर बताया।
अदालत ने कहा कि कानून की उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया और प्रशासनिक दखलंदाजी से छात्रों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर गहरी चिंता जताई।याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील बिस्वरूप भट्टाचार्य ने चुनाव आयोग की 8 फरवरी 2023 की अधिसूचना का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि स्कूल बसों को केवल अंतिम उपाय के रूप में requisition किया जा सकता है।
अदालत ने नोट किया कि राज्य इस मामले में ऐसी कोई अपरिहार्य परिस्थिति साबित करने में नाकाम रहा। इस फैसले ने चुनाव संबंधी लॉजिस्टिक्स और शैक्षणिक संस्थानों के सुचारू संचालन के बीच चल रहे संघर्ष को एक बार फिर उजागर कर दिया









