लेंस डेस्क। USD-INR Buy-Sell Swap Auction : भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने डॉलर की तुलना में रुपये की लगातार कमजोरी को रोकने और बैंकिंग व्यवस्था में तरलता बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं।
केंद्रीय बैंक 16 दिसंबर 2025 को 5 अरब अमेरिकी डॉलर (लगभग 45,000 करोड़ रुपये) के यूएसडी-आईएनआर बाय-सेल स्वैप की नीलामी ((USD-INR Buy-Sell Swap Auction) आयोजित करेगा। इस ऑपरेशन का मुख्य उद्देश्य सिस्टम में अतिरिक्त रुपये उपलब्ध कराना है, जिससे न केवल तरलता की स्थिति सुधरेगी बल्कि रुपये को कुछ सहारा भी मिलेगा।
मौजूदा समय में रुपया डॉलर के मुकाबले 90 के स्तर से आगे निकल चुका है, जो इसकी कमजोरी को दर्शाता है। स्वैप व्यवस्था में बैंक आरबीआई को डॉलर बेचेंगे और इसके बदले में रुपये प्राप्त करेंगे। यह एक साधारण विदेशी मुद्रा स्वैप होगा, जिसमें 36 महीने की अवधि होगी।
नीलामी मल्टीपल प्राइस फॉर्मेट में होगी, जहां न्यूनतम बोली 1 करोड़ डॉलर की होगी और उसके बाद 10 लाख डॉलर के गुणकों में बोली लगाई जा सकेगी। अवधि समाप्त होने पर बैंक उतनी ही राशि के डॉलर वापस खरीदने के लिए बाध्य होंगे।
इसके अलावा आरबीआई तरलता बढ़ाने के लिए अन्य उपाय भी कर रहा है। 11 दिसंबर और 18 दिसंबर को दो चरणों में ओपन मार्केट ऑपरेशन (OMO) के तहत सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद नीलामी होगी, जिसमें प्रत्येक चरण में 50,000 करोड़ रुपये की खरीदारी की जाएगी। कुल मिलाकर 1 लाख करोड़ रुपये की यह खरीदारी बाजार में सीधे रुपये डालेगी।
आरबीआई ने साफ किया है कि वह बाजार की स्थितियों और तरलता पर कड़ी नजर रखेगा और जरूरत पड़ने पर आगे भी उचित कदम उठाएगा। ये उपाय दिसंबर महीने में वित्तीय व्यवस्था को स्थिर और सुचारू बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
कैसे होता है ऑक्शन?
USD-INR बाय-सेल स्वैप एक प्रकार का विदेशी मुद्रा स्वैप सौदा है, जिसमें RBI बैंकों या वित्तीय संस्थाओं से अमेरिकी डॉलर (USD) खरीदता है और भारतीय रुपये (INR) देता है। यह सौदा दो भागों में होता है।
पहला है बाय (Buy), RBI तुरंत (स्पॉट रेट पर) डॉलर खरीदता है। इसके बाद सेल (Sell), एक तय समय बाद (फॉरवर्ड रेट पर, जैसे 3 महीने या 1 साल बाद) वही डॉलर वापस बेचता है।
नीलामी (Auction): RBI इस स्वैप की नीलामी आयोजित करता है, जहां योग्य बैंक अपनी बोली लगाते हैं। सबसे अच्छी बोली (जैसे प्रीमियम या रेट पर) जीतती है और RBI तय राशि के स्वैप सौदे करता है।
यह अस्थायी विदेशी मुद्रा उधार-लेन का तरीका है, जो रुपये की अर्थव्यवस्था में तरलता (पैसे की उपलब्धता) को प्रभावित करता है।
प्रक्रिया कैसे काम करती है?
RBI पहले से घोषणा करता है कि वह कितनी राशि के USD-INR स्वैप की नीलामी करेगा। इसमें स्वैप की अवधि और अन्य शर्तें बताई जाती हैं।
बैंक बोली लगाते हैं। बोली में वे बताते हैं कि वे कितने डॉलर RBI को देंगे और बदले में कितना प्रीमियम (अतिरिक्त लाभ) चाहते हैं। RBI सबसे कम प्रीमियम वाली बोलियों को चुनता है।
सौदे के तुरंत बाद बैंक RBI को डॉलर देते हैं और RBI उन्हें रुपये देता है। इससे बाजार में रुपये की तरलता बढ़ जाती है। तय तारीख पर RBI डॉलर वापस देता है और बैंक रुपये लौटा देते हैं। स्वैप पूरा होने पर सब कुछ बैलेंस हो जाता है, लेकिन बीच में अर्थव्यवस्था पर असर पड़ता है। यह पूरी प्रक्रिया इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म पर होती है, और केवल RBI द्वारा अधिकृत बैंक ही हिस्सा ले सकते हैं।
USD-INR Buy-Sell Swap Auction : क्यों जरूरत पड़ी?
जब अर्थव्यवस्था में पैसे की कमी होती है (जैसे महंगाई या आर्थिक मंदी के समय), तो यह स्वैप बाजार में अतिरिक्त रुपये इंजेक्ट करता है, बिना RBI के विदेशी मुद्रा भंडार को स्थायी रूप से कम किए। अगर रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हो रहा है, तो यह स्वैप डॉलर की आपूर्ति बढ़ाकर रुपये को मजबूत करने में मदद करता है।
विदेशी मुद्रा भंडार का प्रबंधन के लिए भी यह जरूरी है। RBI अस्थायी रूप से डॉलर उधार लेता है, जिससे उसके भंडार बढ़ते हैं। यह बिना बाजार में सीधे हस्तक्षेप किए विदेशी मुद्रा को संतुलित करता है। महंगाई या आर्थिक दबाव को नियंत्रित करना के लिए। उदाहरण के लिए अगर तेल की कीमतें बढ़ रही हैं या विदेशी निवेश कम हो रहा है, तो यह उपकरण RBI को लचीलापन देता है।











