रायपुर। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की ओर से पेश किए गए बजट को सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस यानी CITU ने काफी कमजोर और दिशा-रहित करार दिया है।
CITU के छत्तीसगढ़ राज्य सचिव धर्मराज महापात्र की ओर से जारी बायन में कहा गया है कि आर्थिक सर्वेक्षण खुद मानता है कि अर्थव्यवस्था एक नाजुक दौर से गुजर रही है, वैश्विक हालात अनिश्चित हैं, फिर भी बजट इन समस्याओं का कोई ठोस हल नहीं देता।
ट्रेड यूनियनों की लंबे समय से चेतावनी है कि सरकार वैश्विक पूंजीवाद के संकट को मजदूरों और आम लोगों पर ही थोप रही है। श्रम कानूनों को और कमजोर करने, गुणवत्ता के मानकों को ढीला करने जैसे कदमों से मजदूरों के हक छीने जा रहे हैं और छोटे-घरेलू उद्योग प्रभावित हो रहे हैं। बजट की शुरुआत “युवा शक्ति” के नारे से हुई, लेकिन अंत में सिर्फ 2047 के दूर के लक्ष्यों और एक समिति बनाने की बात है। युवाओं को अभी अच्छी, सुरक्षित नौकरियां चाहिए, न कि सिर्फ बड़े-बड़े वादे।
वित्त मंत्री का यह नौवां बजट रिकॉर्ड तो है, लेकिन यह एक तरह का दिखावा लगता है। राजकोषीय घाटा 4.3% और कर्ज-जीडीपी अनुपात 55.6% तक लाने की कोशिश में सरकार ने भुखमरी, बेरोजगारी जैसी असली समस्याओं को नजरअंदाज किया है। कुल खर्च 53.5 लाख करोड़ का है, लेकिन सामाजिक सहायता और कल्याण कार्यक्रमों में लगातार कटौती हो रही है। गरीबों के हाथ से पैसे छीने जा रहे हैं।
बड़ी कंपनियों पर ज्यादा टैक्स लगाने की बजाय सरकार ने उन्हें और राहत दी है। न्यूनतम वैकल्पिक कर (MAT) 15% से घटाकर 14% कर दिया, कॉरपोरेट्स के लिए कई छूटें बढ़ाईं, जांच में आसानी के लिए समय सीमा कम की। वहीं आम आदमी पर GST और व्यक्तिगत आयकर का बोझ 28.7 लाख करोड़ का है। पहली बार व्यक्तिगत आयकर का संग्रह (14.66 लाख करोड़) कॉरपोरेट टैक्स (12.31 लाख करोड़) से ज्यादा हो गया है।
गैर-टैक्स राजस्व बढ़ाने के लिए PSU से ज्यादा डिविडेंड लेने की योजना है, जिससे उन पर दबाव बढ़ रहा है। बाहरी अनुदान में 49.5% की बढ़ोतरी से नीतिगत स्वतंत्रता पर सवाल उठ रहे हैं। ब्याज और कर्ज चुकाने के बोझ से विकास और कल्याण के खर्च में कटौती हो रही है।
यह बजट अमीरों और बड़े कारोबारियों के लिए तोहफा साबित हो रहा है। इलेक्ट्रॉनिक्स, परमाणु ऊर्जा, डेटा सेंटर जैसी योजनाओं में निजी कंपनियों को छूट और सब्सिडी दी गई है। रेलवे में हाई-स्पीड कॉरिडोर पर खर्च बढ़ा, लेकिन आम यात्रियों की सुविधा और सीनियर सिटीजन रियायतें नहीं बहाल हुईं।
एमएसएमई को समर्थन का दावा है, लेकिन असल आवंटन में ज्यादा फायदा निचले स्तर की गतिविधियों को। SEZ से घरेलू बाजार में सस्ते सामान बेचने की छूट से लोकल फर्मों को नुकसान। कृषि योजनाओं में मुद्रास्फीति के बाद कोई असली बढ़ोतरी नहीं, उर्वरक सब्सिडी में कटौती। SC/ST, ग्रामीण विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, लैंगिक समानता के बजट में कमी आई है।
रोजगार के मामले में गिग वर्कर्स और असंगठित मजदूरों के लिए कुछ नहीं। बजट पूरी तरह मजदूर-विरोधी और कॉरपोरेट-समर्थक लगता है। यह असमानता को और बढ़ा रहा है और असली विकास को रोक रहा है। CITU इस बजट को पूरी तरह खारिज करती है और 12 फरवरी की आम हड़ताल के साथ सड़कों पर विरोध तेज करने का आह्वान करती है।










