नईदिल्ली। केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल (Petrol-Diesel) पर स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी (SAED) में ₹10 प्रति लीटर की कटौती की है। इस फैसले का मकसद वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच तेल कंपनियों पर पड़ रहे दबाव को कम करना है। हालांकि, इस कटौती का सीधा फायदा फिलहाल आम उपभोक्ताओं को नहीं मिला है क्योंकि रिटेल कीमतों में कोई बदलाव नहीं हुआ है।
कटौती से पहले कुल एक्साइज ड्यूटी पेट्रोल पर 21.9 रुपए और डीजल पर 17.8 रुपए प्रति लीटर थी, जो अब घटकर क्रमशः 11.9 रुपए और 7.8 रुपए प्रति लीटर रह गई है।
तेल विपणन कंपनियां (OMCs) लंबे समय से नुकसान झेलते हुए पेट्रोल-डीजल बेच रही हैं। पेट्रोल पर लगभग 24 रुपए प्रति लीटर और डीजल पर लगभग 30 रुपए प्रति लीटर का नुकसान कंपनियां उठा रही हैं। ऐसे में सरकार ने टैक्स घटाकर कंपनियों का कुछ बोझ खुद उठाया है, ताकि कंपनियों को कीमतें बढ़ाने की जरूरत न पड़े। यानी यह कदम कीमतों को बढ़ने से रोकने के लिए है, घटाने के लिए नहीं।
पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है। कीमतें करीब $70 प्रति बैरल से बढ़कर 120 रुपए तक पहुंच गईं। भारत अपनी जरूरत का लगभग 88% कच्चा तेल आयात करता है। इस कारण घरेलू बाजार पर दबाव बढ़ा है।
सरकार पर कितना असर?
इस कटौती से सरकार को भारी राजस्व नुकसान होगा। अनुमानित नुकसान करीब 1.5 से 1.6 लाख करोड़ रुपए सालाना है। हालांकि, सरकार ने डीजल और एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) पर निर्यात शुल्क लगाकर कुछ भरपाई की कोशिश की है। सरकारी तेल कंपनियों ने रिटेल कीमतें नहीं बढ़ाईं। निजी कंपनी Nayara Energy ने कीमतों में बढ़ोतरी की है। इससे साफ है कि कंपनियों पर लागत का दबाव बना हुआ है।
कांग्रेस का हमला
कांग्रेस ने सरकार के इस कदम को ‘भ्रामक राहत’ बताया है। कांग्रेस नेता पवन खेरा ने कहा कि ‘राहत सिर्फ हेडलाइन में है, हकीकत में नहीं। उपभोक्ताओं और डीलरों के लिए कीमतें जस की तस हैं।’
कांग्रेस का कहना है कि सरकार को सीधे जनता को राहत देनी चाहिए थी, न कि सिर्फ कंपनियों का बोझ कम करना चाहिए।











