नई दिल्ली। नेपाल-चीन सीमा पर 26 अगस्त को ग्लेशियर का हिस्सा टूटने और आइस-रॉक एवलांच के बाद आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड का असर कई दिन बाद भी बना हुआ है। भोटेकोशी–त्रिशूली कॉरिडोर के रसुवा, नुवाकोट और आसपास के इलाकों में बाढ़ ने सड़क, पुल, गांव और जलविद्युत परियोजनाओं को भारी नुकसान पहुंचाया है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक नेपाल में मृतकों की संख्या 626 तक पहुंच गई है, जबकि बड़ी संख्या में लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। खराब मौसम ने राहत और बचाव अभियान को और मुश्किल बना दिया है। सुरक्षाबल मलबे, सुरंगों और बाढ़ से प्रभावित इलाकों में लगातार लोगों की तलाश कर रहे हैं।
तबाही के बीच सैकड़ों भारतीय भी संपर्क से बाहर
इस आपदा के बाद सबसे बड़ी चिंता लापता लोगों को लेकर है। नेपाल की रिपोर्टों के अनुसार, 2,400 से ज्यादा लोग अब भी लापता हैं और हजारों राहतकर्मी बचाव अभियान में जुटे हैं। नेपाल और तिब्बत को मिलाकर यह संख्या करीब 3,000 तक पहुंचने की बात कही जा रही है। भारत के विदेश मंत्रालय के मुताबिक, 320 भारतीय नागरिक अभी संपर्क से बाहर हैं, जबकि करीब 400 भारतीयों के चीनी क्षेत्र में फंसे होने की जानकारी भी सामने आई है।
इसी बीच Infosys Public Services के CEO Lax Gopisetty के भी संपर्क से बाहर होने की जानकारी सामने आई है। कंपनी के मुताबिक, गोपिसेट्टी निजी यात्रा पर नेपाल गए थे। Infosys ने कहा है कि वह संबंधित अधिकारियों के संपर्क में है और उनके परिवार को हरसंभव सहयोग दिया जा रहा है।

बिहार की चिंता क्यों बढ़ी, कोसी का क्या है कनेक्शन?
नेपाल की आपदा ने बिहार में भी चिंता बढ़ा दी है। हालांकि, विशेषज्ञों के मुताबिक भोटेकोशी और मुख्य कोसी एक ही नदी नहीं हैं। भोटेकोशी, त्रिशूली-नारायणी नदी तंत्र से जुड़ी है। इसलिए मौजूदा घटना को सीधे वर्ष 2008 जैसी कोसी बाढ़ से जोड़ना वैज्ञानिक तौर पर सही नहीं होगा।
फिर भी नेपाल के ऊपरी हिमालयी क्षेत्रों में होने वाली अत्यधिक बारिश, ग्लेशियर टूटने, भूस्खलन या किसी प्राकृतिक मलबा-बांध के टूटने से बड़ी मात्रा में पानी, चट्टान और गाद नीचे की ओर बह सकती है। सीमा पार आने वाले इस अतिरिक्त पानी का असर भारत के नदी तंत्र पर पड़ सकता है। यही वजह है कि बिहार में गंडक, गंगा, कोसी और बूढ़ी गंडक जैसी नदियों के जलस्तर पर लगातार नजर रखी जा रही है।
असली वैज्ञानिक चिंता कोसी बेसिन को लेकर
सबसे बड़ा सवाल मुख्य कोसी बेसिन को लेकर है। कोसी का ऊपरी कैचमेंट हिमालय में स्थित है, जहां ढलान काफी ज्यादा है। तेज बहाव अपने साथ मिट्टी, रेत, बजरी और चट्टानों का भारी मलबा लेकर आता है। जब यही पानी बिहार के अपेक्षाकृत सपाट मैदानों में पहुंचता है तो उसकी रफ्तार कम हो जाती है और तलछट नीचे जमने लगती है।
समय के साथ नदी की तलहटी ऊंची होने और उसकी पानी संभालने की क्षमता प्रभावित होने का खतरा बढ़ सकता है। ऐसे में अत्यधिक पानी आने पर नदी के फैलने और आसपास के निचले इलाकों में बाढ़ का जोखिम बढ़ सकता है। मुख्य कोसी सुन कोसी, अरुण और तमोर नदियों के संगम से बनती है और बिहार में भीमनगर के पास प्रवेश करती है। इसलिए भविष्य में इसके ऊपरी कैचमेंट में कोई बड़ी प्राकृतिक घटना होती है तो उसका असर उत्तर बिहार के बड़े हिस्से तक पहुंच सकता है।
नेपाल का आत्मनिर्भर मॉडल, लेकिन चुनौती ने बदली जरूरत
आपदा के बीच नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने राहत और बचाव के लिए राज्य की पूरी क्षमता लगाने की बात कही। शुरुआती दौर में नेपाल ने विदेशी सर्च एंड रेस्क्यू टीमों को तत्काल अनुमति देने के बजाय अपनी सेना, नेपाल पुलिस और सशस्त्र पुलिस बल के जरिए अभियान पर जोर दिया।
हालांकि, जैसे-जैसे आपदा का पैमाना सामने आया, जरूरत सिर्फ अतिरिक्त लोगों की नहीं बल्कि विशेष तकनीकी विशेषज्ञता की भी महसूस होने लगी। सुरंगों से लोगों को निकालना, संचार व्यवस्था बहाल करना, क्षतिग्रस्त ढांचे की मरम्मत और शवों की पहचान जैसे कामों के लिए विशेषज्ञ सहायता की जरूरत बढ़ी है।
भारत समेत कई देशों ने बढ़ाया मदद का हाथ
भारत की ओर से राहत सामग्री भेजने और अस्थायी पुलों समेत तकनीकी मदद की पेशकश की जानकारी सामने आई है। इसके अलावा चीन, दक्षिण कोरिया, ब्रिटेन, अमेरिका, यूरोपीय संघ, संयुक्त राष्ट्र, विश्व स्वास्थ्य संगठन, रेड क्रॉस और विश्व बैंक समेत कई देशों एवं संस्थाओं ने राहत तथा पुनर्निर्माण में सहायता की पेशकश की है।

नेपाल सरकार के सामने अब चुनौती केवल लोगों को बचाने तक सीमित नहीं है। टूटे पुल और सड़कें, बिजली और संचार व्यवस्था तथा बाढ़ से तबाह बुनियादी ढांचे को फिर से खड़ा करना भी बड़ी जिम्मेदारी है। पुनर्निर्माण की लागत कई अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान इस चुनौती की गंभीरता को दिखाता है।
हिमालय में हुआ हादसा, असर सीमाओं से बहुत दूर
इस पूरी आपदा ने एक बार फिर दिखाया है कि हिमालयी क्षेत्र में प्राकृतिक घटनाएं किसी एक देश की सीमा तक सीमित नहीं रहतीं। ग्लेशियर या बर्फ-चट्टान का बड़ा हिस्सा टूटने से नदी में अचानक पानी और मलबे की मात्रा बढ़ सकती है। कई बार इससे अस्थायी झील या प्राकृतिक मलबा-बांध बन जाता है और उसके टूटने पर नीचे की ओर तेज रफ्तार से सैलाब आ सकता है।
मानसून के दौरान पहले से ऊंचे नदी जलस्तर के साथ यह अतिरिक्त पानी हालात को और गंभीर बना सकता है। ऐसे में रियल-टाइम नदी निगरानी, शुरुआती चेतावनी प्रणाली और भारत-नेपाल-चीन के बीच बेहतर सूचना साझा करना अब पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है।
बिहार के लिए सबक: नेपाल की घटना पर नजर जरूरी
मौजूदा भोटेकोशी हादसा सीधे तौर पर मुख्य कोसी की बाढ़ नहीं है, लेकिन इसने उत्तर बिहार की पुरानी चिंता फिर सामने ला दी है। हिमालयी नदियां एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं और ऊपरी इलाकों में होने वाली बड़ी जल-भौगोलिक घटनाओं का असर नीचे के मैदानी क्षेत्रों पर पड़ सकता है।









