जग्गी हत्याकांड में पूर्व CM के बेटे को सुप्रीम राहत, SC ने हाईकोर्ट के फैसले पर लगाई रोक, कहा – यह कैसा फैसला

Jaggi Murder Case

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने आज जग्गी हत्याकांड (Jaggi Murder Case) से जुड़े छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के उस फैसले पर रोक लगा दी, जिसमें पूर्व छत्तीसगढ़ मुख्यमंत्री अजीत जोगी के बेटे अमित जोगी को 2003 के नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (NCP) नेता राम अवतार जग्गी हत्याकांड में दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी

जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने अमित जोगी की अपील पर नोटिस जारी करते हुए यह आदेश दिया।

कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट के फैसले का प्रभाव और संचालन स्थगित रहेगा।कोर्ट ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के एक अन्य आदेश पर भी रोक लगा दी, जिसमें CBI को अपील दायर करने की अनुमति दी गई थी और अमित जोगी को 31 मार्च तक जमानत बांड और सरकारी जमानतदार पेश करने के निर्देश दिए गए थे अनुपालन न करने पर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी गई थी।

अमित जोगी की ओर से सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल और मुकुल रोहतगी ने बहस की, जबकि जवाबदेह पक्ष की ओर से सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा और गोपाल शंकरनारायणन उपस्थित रहे।

सुनवाई के दौरान जस्टिस संदीप मेहता ने हाईकोर्ट द्वारा अमित जोगी को सुनवाई दिए बिना ही दोषसिद्धि और सजा सुनाए जाने पर सवाल उठाया। उन्होंने टिप्पणी की — “कैसा फैसला है ये… सुनवाई से पहले ही दोषसिद्धि और सजा?”

दरअसल, 4 जून 2003 को राम अवतार जग्गी की गोली मार कर हत्या कर दी गई। 2007 में ट्रायल कोर्ट ने अन्य आरोपियों को दोषी ठहराया, लेकिन अमित जोगी को बरी कर दिया। CBI ने इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की।

शिकायतकर्ता सतीश जग्गी ने भी बरी किए जाने के आदेश को चुनौती दी।

2011 में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने CBI की अपील को गैर-मेंटेनेबल मानकर खारिज कर दिया था। पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने इस राय से असहमति जताई और हाईकोर्ट को CBI की अपील को मेरिट पर सुनने के निर्देश दिए।

दूसरे दौर में हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि अमित जोगी इस षड्यंत्र के ‘मास्टरमाइंड, मुख्य वास्तुकार और ड्राइविंग फोर्स’ थे।

कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर कोई पक्ष जानबूझकर देरी की रणनीति अपना रहा है तो वह बेबस दर्शक की तरह चुपचाप नहीं बैठ सकता

हाईकोर्ट ने कहा कि अमित जोगी को अपना केस तैयार करने के लिए पर्याप्त समय मिलने के बावजूद उन्होंने बार-बार स्थगन मांगा और बहस शुरू करने का कोई प्रयास नहीं किया।

सभी सबूतों और सामग्री का जिक्र करते हुए हाईकोर्ट ने आगे कहा कि सबूतों से साफ है कि अमित जोगी पूरे षड्यंत्र के मास्टरमाइंड थे और उस समय के मुख्यमंत्री के बेटे होने के नाते उनके पास कमांडिंग पोजीशन थी। वे इतने प्रभावशाली थे कि पुलिस अधिकारियों को प्रभावित करके ऐसे लोगों को व्यवस्थित करवा सकते थे जो खुद को हमलावर के रूप में पेश करें।

बत्रा हाउस, होटल ग्रीन पार्क और सीएम हाउस में आरोपी व्यक्तियों के साथ अमित जोगी की लगातार मुलाकातों और फंड के लेन-देन के सबूत स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि वे शुरुआत से ही सभी गतिविधियों से अवगत थे और पूरा अपराध अमित जोगी के निर्देशों पर ही अंजाम दिया गया था।

हाईकोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि पूर्व मुख्यमंत्री के पुराने सहयोगी चिमन सिंह को अमित जोगी ने बुलाकर यह आपराधिक षड्यंत्र रचने के लिए याह्या धेबर और अभय गोयल के साथ मिलाया था।

इसका मकसद विधानसभा चुनाव से पहले NCP की रैली को बाधित करना था। षड्यंत्र का एक हिस्सा उस समय के मुख्यमंत्री के आधिकारिक आवास पर ही रचा गया था।

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