सिंगल यूज प्लास्टिक ढाई साल पहले बैन, कागजों में बंद रहा प्रतिबंध, अब छत्तीसगढ़ पर्यावरण मंडल की जागी नींद

रायपुर। छत्तीसगढ़ में सिंगल यूज प्लास्टिक पर पूर्ण प्रतिबंध (single use plastic ban) जून 2023 से ही लागू है, लेकिन पर्यावरण संरक्षण मंडल ने इसे गंभीरता से लेते हुए नगरीय प्रशासन विभाग को सूचित करने में ढाई साल लगा दिए। 3 दिसंबर 2025 को जारी निर्देश के बाद अब जाकर मंडल जागा है, जबकि इस ढाई साल में बाजारों में प्रतिबंधित प्लास्टिक सामग्री धड़ल्ले से बिकती और इस्तेमाल होती रही।

पर्यावरण कार्यकर्ता नितिन सिंघवी ने इसे सरकारी लापरवाही का घोर उदाहरण बताया और सवाल उठाया कि जब निर्माण से लेकर बिक्री तक सब प्रतिबंधित है, तो ये सामग्री कहां से आ रही है?

प्रतिबंधित वस्तुओं की लंबी सूची, लेकिन अमल शून्य

2023 के नियमों के तहत प्लास्टिक और नॉन-वूवन पॉलीप्रोपिलीन बैग (हैंडल वाले या बिना वाले) थर्मोकोल के डिस्पोजेबल कप-प्लेट-कटोरा-ग्लास-चम्मच-स्ट्रॉ, गुटखा-पान मसाला के प्लास्टिक पाउच, छोटी पीवीसी बैनर-फ्लेक्स, 200 मिली से कम क्षमता वाली पानी की बोतलें और गैर-पुनर्चक्रणीय मल्टीलेयर प्लास्टिक पैकेजिंग पूरी तरह बैन हैं।

सिंघवी के मुताबिक, उनकी 2017 की जनहित याचिका से शुरू हुआ प्रतिबंध कई बार कागजों तक सीमित रहा। नॉन-वूवन बैग पर 2020 में बैन के बावजूद 2022 में लॉबी के दबाव से छूट दी गई, फिर 2023 में दोबारा प्रतिबंधित किया गया लेकिन जमीनी स्तर पर कोई जांच नहीं हुई।

अधिकारियों की जवाबदेही पर सवाल, स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा

सिंघवी ने कड़े शब्दों में पूछा कि अधिकारी सिर्फ जागरूकता अभियान चलाकर क्यों संतुष्ट हैं? 30 साल में कोई ठोस विकल्प नहीं निकला, तो प्रतिबंध क्यों नहीं सख्ती से लागू किया? उन्होंने चेतावनी दी कि विशेष लॉबियां अधिसूचना में संशोधन करवा सकती हैं, लेकिन नेताओं और अधिकारियों को जनहित को प्राथमिकता देनी होगी।

प्लास्टिक प्रदूषण भारत को विश्व में तीसरे सबसे बड़े उपभोक्ता और पहले सबसे बड़े प्रदूषक बनाता है। माइक्रोप्लास्टिक अब हवा, पानी, भोजन और मानव शरीर फेफड़े, रक्त, मस्तिष्क, गर्भ तक पहुंच चुका है, जो हार्मोन असंतुलन, कैंसर और डीएनए क्षति का कारण बनता है।

आने वाली पीढ़ियों के लिए धीमा जहर

यह सिर्फ पर्यावरणीय नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का संकट है। प्लास्टिक कचरा नालियां जाम करता है, जलभराव बढ़ाता है और मच्छरों को पनपने देता है। वैज्ञानिक अध्ययन साबित कर चुके हैं कि माइक्रोप्लास्टिक जीवों और मनुष्यों की प्रजनन क्षमता को नुकसान पहुंचा रहा है। यदि प्रतिबंधों का सख्त पालन नहीं हुआ तो आने वाली पीढ़ियां इस लापरवाही के लिए कभी माफ नहीं करेंगी।

पूनम ऋतु सेन

पूनम ऋतु सेन युवा पत्रकार हैं, इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में बीटेक करने के बाद लिखने,पढ़ने और समाज के अनछुए पहलुओं के बारे में जानने की उत्सुकता पत्रकारिता की ओर खींच लाई। विगत 6 वर्षों से वीमेन, एजुकेशन, पॉलिटिकल, हेल्थ, लाइफस्टाइल से जुड़े मुद्दों पर लगातार खबर कर रहीं हैं और सेन्ट्रल इण्डिया के कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अलग-अलग पदों पर काम किया है। द लेंस में बतौर जर्नलिस्ट कुछ नया सीखने के उद्देश्य से फरवरी 2025 से सच की तलाश का सफर शुरू किया है।

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