नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने 28 जनवरी 2026 को समय की कमी के कारण उन याचिकाओं पर सुनवाई नहीं की, जो कई राज्यों के धर्मांतरण विरोधी कानूनों (Anti-Conversion Laws) की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाती हैं। ये याचिकाएं सिटीजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP) के नेतृत्व में दायर की गई हैं। अब कोर्ट ने इस मामले को 3 फरवरी 2026 को सूचीबद्ध करने का आदेश दिया है। ये मामले 2020 से सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं।
याचिकाकर्ता इन कानूनों को चुनौती दे रहे हैं, जो उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, हरियाणा, झारखंड और कर्नाटक जैसे नौ राज्यों में लागू हैं। ये कानूनों को ‘धर्म की स्वतंत्रता’ या ‘अवैध धर्मांतरण रोकथाम’ के नाम से जाना जाता है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ये कानून जबरन या धोखे से धर्म बदलने को रोकने के बहाने बनाए गए हैं लेकिन वास्तव में ये वयस्कों की व्यक्तिगत पसंद, विवाह और धार्मिक आजादी पर अनुचित रोक लगाते हैं।
इनमें मुख्य प्रावधान हैं:
धर्म बदलने से पहले जिला मजिस्ट्रेट को पहले से सूचना देनी पड़ती है।
पुलिस जांच होती है और घोषणा सार्वजनिक की जाती है।
अंतरधार्मिक विवाह से जुड़े धर्म परिवर्तन को संदिग्ध मानकर आपराध माना जाता है।
कोई भी तीसरा व्यक्ति शिकायत कर सकता है।
आरोपी को साबित करना पड़ता है कि धर्म परिवर्तन स्वेच्छा से हुआ था ।
CJP के वकीलों का तर्क है कि ये प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता), 21 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजता) और 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) का उल्लंघन करते हैं। वे कहते हैं कि ऐसे कानूनों से ‘लव जिहाद’ जैसी अफवाहें फैलती हैं, जिससे अंतरधार्मिक जोड़ों पर हमले, धमकियां और पुलिस उत्पीड़न बढ़ा है। ये कानून अल्पसंख्यकों और महिलाओं के खिलाफ इस्तेमाल हो रहे हैं।
इस मामले में अंतरिम राहत की मांग अप्रैल 2025 से लंबित है। 16 अप्रैल 2025 और 16 सितंबर 2025 को कोर्ट ने राज्यों से जवाब मांगे थे लेकिन अब तक कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। यह सुनवाई अब 13वीं बार टल चुकी है। CJP के वरिष्ठ अधिवक्ता चंदर उदय सिंह, अधिवक्ता सृष्टि अग्निहोत्री और संजना थॉमस इस मामले में पैरवी कर रहे हैं।
याचिकाकर्ता चाहते हैं कि कोर्ट इन कानूनों के सबसे सख्त हिस्सों पर तुरंत रोक लगाए, ताकि लोगों की स्वतंत्रता प्रभावित न हो।अगली सुनवाई 3 फरवरी 2026 को होगी, जहां कोर्ट अंतरिम राहत पर फैसला ले सकता है या मामले को और गहराई से सुन सकता है। यह फैसला देश में धर्म परिवर्तन और अंतरधार्मिक विवाह से जुड़े कानूनों पर बड़ा असर डाल सकता है।










