नई दिल्ली। संसद की स्वास्थ्य स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि रेजिडेंट डॉक्टरों जो मेडिकल कॉलेजों में PG करते समय मरीजों का इलाज करते हैं की ड्यूटी को पायलटों जैसा नियमित और सुरक्षित बनाया जाए।
समिति का कहना है कि डॉक्टरों को लगातार बहुत लंबी ड्यूटी जो कि 24-36 घंटे की शिफ्ट हो जाती है करने से थकान हो जाती है, जिससे इलाज में गलतियां हो सकती हैं और मरीजों की जान को खतरा बढ़ जाता है।
इसलिए पायलटों की तरह आराम का समय तय करना चाहिए, ड्यूटी घंटे सीमित करने चाहिए और रोस्टर की निगरानी करनी चाहिए। समिति ने सरकार से ‘क्लिनिकल ड्यूटी घंटे विनियमन’ नीति बनाने और सख्ती से लागू करने की सिफारिश की है।

यूनाइटेड डॉक्टर्स फ्रंट (UDF) के चेयरपर्सन डॉ. लक्ष्य मित्तल ने इस सिफारिश का स्वागत किया है। उन्होंने स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा को पत्र लिखकर मांग की है कि रेजिडेंट डॉक्टरों के लिए भी पायलटों जैसा ड्यूटी नियम तुरंत लागू किया जाए, ताकि थकान कम हो और मरीज सुरक्षित रहें।
मामला क्या था?
भारत में 1992 में केंद्र सरकार ने यूनिफॉर्म रेजीडेंसी स्कीम जारी की थी। इसमें साफ नियम थे कि रेजिडेंट डॉक्टरों की सप्ताह में अधिकतम 48 घंटे ड्यूटी और एक बार में अधिकतम 12 घंटे लगातार ड्यूटी लगाई जाएगी।
लेकिन ज्यादातर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल इन नियमों का पालन नहीं करते। रेजिडेंट डॉक्टर अक्सर 70 से 100 घंटे प्रति सप्ताह तक काम करते हैं, जिसमें 24-36 घंटे की लगातार शिफ्ट आम है। इससे डॉक्टरों में थकान, बर्नआउट, मानसिक तनाव और आत्महत्या की घटनाएं बढ़ गई हैं। साथ ही, थके हुए डॉक्टर से मरीजों के इलाज में गलती होने का खतरा भी बढ़ जाता है।
UDF (United Doctors Front) ने इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में PIL दायर की थी। जिस पर कोर्ट ने केंद्र, राज्यों और NMC से जवाब मांगा था।
हाल ही में महाराष्ट्र सरकार ने 1992 के नियम को लागू करने के निर्देश दिए हैं, जो एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है। संसद की समिति की सिफारिश अब पूरे देश में इन नियमों को सख्ती से लागू करने की दिशा में महत्वपूर्ण है।









