नई दिल्ली। सुप्रसिद्ध फोटोग्राफर Raghu Rai नहीं रहे। 83 साल की उम्र में उनका निधन हो गया। वह फोटोग्राफर जिसने भोपाल गैस त्रासदी से लेकर इंदिरा गांधी तक यानी राजनीति से लेकर इतिहास के पन्नों पर बड़ी-बड़ी घटनाओं को कैमरे की आंखों से देखा वह नहीं रहा। रघु राय का नाम देश के साथ-साथ विदेश में भी बेहद सम्मान से लिया जाता था। यह इंटरव्यू लेंस जर्नलिस्ट आवेश तिवारी द्वारा दस वर्ष पूर्व लिया गया था।
मैं नहीं चाहता मेरे सपनों में भी वो खौफनाक मंजर दोबारा दिखाई दे! मुझे लग रहा था जैसे मैं किसी बड़े युद्धक्षेत्र में पहुंच गया हूं हर तरफ लाशें, हर तरफ धुंआ धुंआ। मौत का सन्नाटा क्या होता है मैंने भोपाल में देखा। त्रासदी उस हद को पार कर चुकी थी जिसके बाद लोगों को यह सब कुछ अदभुत नहीं लग रहा था। भोपाल गैस काण्ड को कैमरे की लेंस से पूरी दुनिया को दिखाने वाले सुप्रसिद्ध फोटोग्राफर रघु राय जब भोपाल गैस काण्ड की उस भयावह सुबह को बयाँ करते हैं तो उनकी आँखों में एक अजीब सा खौफ अपने आप आकर ठहर जाता है।
रघु राय बताते हैं ‘मौत की उस रात को जब यूनियन कार्बाइड से गैस लीक होना शुरू हुई उसके तक़रीबन आधे घंटे बाद मेरी पत्रिका के दिल्ली दफ्तर को इसकी खबर मिल गई थी, मुझे तत्काल वहां जाने को कहा गया ,मैंने कहा “बिलकुल जाऊंगा’। वो कहते हैं ‘मैंने सोचा सुबह की पहली फ्लाईट लेकर भोपाल निकलूंगा तब तक पेरिस से मैगनम (विश्व प्रसिद्ध फोटोग्राफी एजेंसी ) वालों का फोन आ गया, वो कह रहे थे कि लोग मर रहे हैं जल्दी जाओ’।
3 दिसंबर की सुबह 8.30 बजे मैं भोपाल में था,लोग शहर छोड़ रहे थे मैं शहर में प्रवेश कर रहे था। मैं हमीदिया हास्पिटल की और निकल पड़ा, रास्ते में गाय, भैंस, कुत्तों के साथ इंसानों की भी लाशें नजर आ रही थी, एक आदमी अपनी पत्नी की लाश कंधे पर अकेले ऐसे लेकर जा रहा था जैसे यह कोई सामान्य सी बात हो, वो आदमी और उसकी पत्नी के लटके पांव मुझे बार बार याद आते हैं, मैंने वो तस्वीर खिंची थी।
मैंने यूनियन कार्बाइड की सामने वाली झुग्गियों में देखा जहाँ गैस का सर्वाधिक असर हुआ था लोग आंखों पर गीली पट्टियां रखे हुए थे, परिवार के परिवार तबाह हो गए थे, सारी आशाएं ख़त्म हो चुकी थी।
रघु राय कहते हैं कि यूनियन कार्बाइड की दुर्घटना दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी है ,चेर्नोबिल में भी उतने लोग नहीं मरे थे जितने भोपाल में मरे। रघु राय कहते हैं मुझे कहना नहीं चाहिए पर यूँ लगता है जिन्होंने ज्यादा गैस निगल ली वो भाग्यशाली थे कि वो मर गए ,जिन्होंने कम गैस निगली वो रोज रोज मर रहे थे”। रघु राय से जब हम पूछते हैं कि आपको उस वक्त क्या लगा कि फोटोग्राफी का धर्म बड़ा है या सेवा का?
रघु राय कहते हैं मेरा धर्म उस समय फोटोग्राफी करने का था, मैं उस वक्त किसी की मदद क्या करता? उस वक्त गैस पीड़ितों के लिए, भोपाल के लिए ,देश के लिए, मैंने ईमानदारी से तस्वीरे खिंची। रघु कहते हैं मैंने कभी कोई गलतफहमी नहीं रखता जो सेवा करने वाले थे वो सेवा कर रहे थे। न तो उस वक्त यूनियन कार्बाइड ने मिक का कोई एंटीडोज बताया और न ही भारत सरकार ने उस त्रासदी को लेकर कोई वैज्ञानिक अनुसंधान किया।
उनके अनुसार यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम किसी भी दुर्घटना से कुछ नहीं सीखते। यूनियन कार्बाइड अपनी उम्र पूरी कर चूका था उसे बंद कर देना चाहिए था ,आज भी वो प्लांट वहां पर हैं। अब तक भोपाल पीड़ितों को पूरी तरह से मुआवजा नहीं मिला है। रघु कहते हैं हमें इस अंधाधुंध विकास के दौर में भी सावधान रहना होगा नहीं तो देश में ही नहीं दुनिया में कभी भी कहीं भी कोई भोपाल फूट पड़ेगा ।









