सीबीआई निदेशक की चयन प्रक्रिया पर राहुल गांधी की खरी खरी

Rahul Gandhi

नई दिल्ली। कांग्रेस नेता Rahul Gandhi ने प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली पैनल की बैठक में अगले सीबीआई निदेशक के चयन के दौरान मजबूत असहमति नोट दिया। उन्होंने कहा कि वे पक्षपाती तौर तरीकों का हिस्सा नहीं बनेंगे।

राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि सरकार ने उन्हें उम्मीदवारों के सेल्फ अप्रेजल और 360-डिग्री रिपोर्ट्स उपलब्ध नहीं कराईं, जिससे चयन प्रक्रिया को मात्र औपचारिकता बना दिया गया है और लोकसभा में विपक्ष के नेता से रबर स्टैंप की तरह व्यवहार किया जा रहा है।

उन्होंने केंद्र सरकार पर सीबीआई का विपक्षी नेताओं, पत्रकारों और आलोचकों के खिलाफ दुरुपयोग करने का भी आरोप लगाया।

पीएम नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली उच्च-स्तरीय समिति की मंगलवार शाम प्रधानमंत्री निवास पर बैठक हुई। बैठक में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी भी शामिल थे।वर्तमान सीबीआई निदेशक प्रवीण सूद 24 मई 2026 को पद छोड़ रहे हैं।

राहुल गांधी के असहमति नोट में कहा गया है कि समिति को महत्वपूर्ण जानकारी देने से इनकार करके सरकार ने इसे मात्र औपचारिकता बना दिया है। राहुल ने कहा, ‘मैं इसमें भाग लेकर अपना संवैधानिक कर्तव्य नहीं छोड़ सकता। इसलिए मैं सबसे मजबूत शब्दों में असहमति दर्ज करता हूं।’

राहुल गांधी ने कहा कि बार-बार लिखित अनुरोधों के बावजूद उन्हें योग्य उम्मीदवारों की स्व-मूल्यांकन रिपोर्ट या 360-डिग्री रिपोर्ट नहीं दी गई।

बैठक के दौरान ही उन्हें 69 उम्मीदवारों के मूल्यांकन रिकॉर्ड पहली बार देखने को कहा गया, जबकि 360-डिग्री रिपोर्ट पूरी तरह से इनकार कर दी गई।उन्होंने कहा, “इन रिकॉर्ड्स की विस्तृत समीक्षा प्रत्येक उम्मीदवार के इतिहास और प्रदर्शन का आकलन करने के लिए आवश्यक है।

बिना किसी कानूनी आधार के जानकारी देने से इनकार करना चयन प्रक्रिया का मजाक उड़ाता है और सुनिश्चित करता है कि केवल आपका पूर्व-निर्धारित उम्मीदवार चुना जाए।”राहुल गांधी ने यह भी उल्लेख किया कि उन्होंने पिछले साल 5 मई की बैठक में भी असहमति दर्ज की थी और 21 अक्टूबर को प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर पारदर्शी प्रक्रिया के सुझाव दिए थे, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।

राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि सरकार सीबीआई का बार-बार दुरुपयोग कर रही है, जबकि यह भारत की प्रमुख जांच एजेंसी होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि विपक्षी नेता को चयन समिति में शामिल करने का उद्देश्य संस्थागत कब्जे को रोकना है, लेकिन उन्हें कोई अर्थपूर्ण भूमिका नहीं दी जा रही है।

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