रायपुर। संसद में पारित खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम (MMDR एक्ट) को लेकर छत्तीसगढ़ में सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत ने केंद्र की मोदी सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह संशोधन केवल कानून में बदलाव नहीं, बल्कि खनिज संपदा वाले राज्यों के संवैधानिक और आर्थिक अधिकारों पर हमला है।
डॉ. महंत ने कहा कि केंद्र सरकार की प्राथमिकता गरीब और खनिज संपन्न राज्यों के हितों की बजाय बड़े कॉरपोरेट घरानों के हितों की रक्षा करना है। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले के बाद छत्तीसगढ़ समेत कई राज्यों के लिए वर्ष 2005 से लंबित खनिज राजस्व की वसूली का रास्ता खुला था, लेकिन अब संशोधन के जरिए उस फैसले के प्रभाव को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है।
‘सरकार बताए छत्तीसगढ़ को कितना नुकसान होगा’
नेता प्रतिपक्ष ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय से इस संशोधन के संभावित वित्तीय प्रभाव पर स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है। उन्होंने सवाल उठाया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद छत्तीसगढ़ को कितनी राशि मिलने की उम्मीद थी और संशोधन के बाद उस पर कितना असर पड़ेगा।
डॉ. महंत ने कहा कि अगर ओडिशा में संभावित तौर पर एक लाख करोड़ रुपये तक के नुकसान की चर्चा हो रही है, तो छत्तीसगढ़ सरकार को भी जनता को बताना चाहिए कि राज्य को कितने हजार करोड़ रुपये का संभावित नुकसान हो सकता है।
उन्होंने सरकार से पूछा कि क्या इस संबंध में कोई अध्ययन कराया गया है? क्या राज्य सरकार ने केंद्र के सामने इस विधेयक का विरोध किया? और क्या भाजपा के सांसदों ने संसद में छत्तीसगढ़ के हितों की आवाज उठाई?
‘छत्तीसगढ़ का पक्ष लिया या कॉरपोरेट का?’
डॉ. महंत ने भाजपा सांसदों से सवाल किया कि यदि उन्होंने इस संशोधन का विरोध नहीं किया तो उन्हें जनता को बताना चाहिए कि उन्होंने छत्तीसगढ़ का पक्ष लिया या कॉरपोरेट घरानों का।
उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ की खनिज संपदा सिर्फ कोयला, लौह अयस्क और बॉक्साइट नहीं है, बल्कि यह प्रदेश के आदिवासियों, युवाओं और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ी है।
डॉ. महंत के मुताबिक खनिजों से मिलने वाला राजस्व राज्य के स्कूलों, अस्पतालों, सड़कों, सिंचाई और अन्य विकास कार्यों के लिए इस्तेमाल होना चाहिए। उन्होंने कहा कि जिन इलाकों से खनिज निकाले जाते हैं, वहां के लोग विस्थापन, प्रदूषण और जंगलों के नुकसान का सामना करते हैं। ऐसे में उनके हिस्से का राजस्व भी सुरक्षित रहना चाहिए।
‘किसके दबाव में कानून बदला गया?’
नेता प्रतिपक्ष ने केंद्र सरकार से यह भी पूछा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राज्यों को उसका लाभ मिलने से पहले ही कानून में संशोधन करने की इतनी जल्दी क्यों थी।
उन्होंने सवाल उठाया कि यह संशोधन किसके हितों की रक्षा के लिए लाया गया और इसका सबसे बड़ा लाभार्थी कौन होगा?
डाॅ. महंत ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार के बड़े आर्थिक फैसलों को लेकर देश में यह धारणा मजबूत हो रही है कि उनका फायदा चुनिंदा कॉरपोरेट घरानों को पहुंचता है। उनके मुताबिक MMDR संशोधन ने इस आशंका को और बढ़ाया है।
छत्तीसगढ़ सरकार से श्वेतपत्र जारी करने की मांग
डॉ. महंत ने राज्य सरकार से मांग की कि वह इस पूरे मामले पर तत्काल श्वेतपत्र जारी करे और स्पष्ट करे कि संशोधन से छत्तीसगढ़ के राजस्व पर कितना प्रभाव पड़ेगा।
उन्होंने कहा कि अगर इस कानून के कारण छत्तीसगढ़ को आर्थिक नुकसान होता है तो राज्य सरकार को जनता के सामने जवाब देना होगा कि उसने अपने राज्य के हितों की रक्षा के लिए क्या कदम उठाए।
डॉ. महंत ने कहा कि छत्तीसगढ़ की खदानें कॉरपोरेट मुनाफे के लिए नहीं, बल्कि प्रदेश की जनता की साझा संपत्ति हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि गरीब राज्यों का हक छीनकर अमीर कॉरपोरेट घरानों के हितों की रक्षा करना न तो आर्थिक नीति है और न ही संघवाद।
नेता प्रतिपक्ष का यह बयान ऐसे समय आया है, जब MMDR संशोधन को लेकर खनिज संपदा वाले राज्यों के राजस्व और अधिकारों पर राजनीतिक बहस तेज हो गई है।










