नोएडा, गुड़गांव और मानेसर में मजदूर आंदोलन पर रासुका और दमन की निंदा

Noida Labor Protest

नई दिल्ली। नोएडा, गुड़गांव, मानेसर, फरीदाबाद, भिवाड़ी और पानीपत में लाखों मजदूर अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं। इन प्रदर्शनों में 400 से ज्यादा मजदूरों, बुद्धिजीवियों और विद्यार्थियों को गिरफ्तार किया गया है। अब उन पर रासुका (राष्ट्रीय सुरक्षा कानून) लगाने की घोषणा की गई है।

क्रांतिकारी सांस्कृतिक मंच (RCF), जाति उन्मूलन आंदोलन (CAM), अखिल भारतीय क्रांतिकारी विद्यार्थी संगठन (AIRSO) और अखिल भारतीय क्रांतिकारी महिला संगठन (AIRWO) ने इसकी तीखी निंदा की है।

इन संगठनों ने भाजपा सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि मजदूरों के गुस्से का पाकिस्तान या नक्सली लिंक ढूंढने के बजाय सरकार को कॉरपोरेट घरानों की गुलामी छोड़नी चाहिए।

इन संगठनों ने मांग की है कि मजदूरों को तुरंत मासिक 30,000 रुपये न्यूनतम वेतन दिया जाए। चारों श्रम कानून (लेबर कोड) को रद्द किया जाए। ठेका प्रथा खत्म की जाए। स्थाई काम पर स्थाई नौकरी दी जाए। सभी गिरफ्तार मजदूरों, बुद्धिजीवियों और विद्यार्थियों को तुरंत रिहा किया जाए। उन पर लगाए गए फर्जी मुकदमे वापस लिए जाएं। 9 और 13-14 अप्रैल की हिंसा की न्यायिक जांच हो और दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई की जाए।

संगठनों का आरोप है कि मोदी सरकार ने RSS के मार्गदर्शन में देशी-विदेशी कॉरपोरेट घरानों  के फायदे के लिए मजदूरों के सैकड़ों साल पुराने अधिकार छीन लिए हैं। काम के घंटे बढ़ा दिए गए, न्यूनतम मजदूरी कम कर दी गई और मजदूरों की नौकरी बहुत आसानी से छीनी जा सकती है। आज ज्यादातर मजदूर 10,000 रुपये से भी कम वेतन पर परिवार चलाने को मजबूर हैं। महंगाई और बेरोजगारी के कारण मजदूरों में गुस्सा बढ़ रहा है।

संगठनों ने कहा कि सरकार मजदूरों से बात करने और उनके मुद्दों को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाने की बजाय दमन का रास्ता अपना रही है। ट्रेड यूनियन बनाने का संवैधानिक अधिकार भी कमजोर कर दिया गया है।

उन्होंने योगी सरकार द्वारा नोएडा-गाजियाबाद में घोषित 21% वेतन वृद्धि को भी खोखला बताया। संगठनों के अनुसार, वृद्धि के बाद भी अकुशल मजदूर को सिर्फ 13,690 रुपये, अर्धकुशल को 15,059 रुपये और कुशल मजदूर को 16,868 रुपये ही मिलेंगे, जो महंगाई के हिसाब से बहुत कम है। उन्होंने कहा कि यह वृद्धि मजदूरों के आंदोलन के दबाव में हुई है, न कि सरकार की मेहरबानी से।

इन चारों संगठनों ने गोदी मीडिया पर भी हमला बोला और कहा कि वह मजदूरों के आक्रोश को पाकिस्तान और नक्सलियों से जोड़ने की कोशिश कर रहा है, जबकि असल समस्या कॉरपोरेट शोषण है।

अंत में इन संगठनों ने देश भर के मजदूरों, किसानों, दलितों, अल्पसंख्यकों और प्रगतिशील ताकतों से अपील की है कि वे इस मजदूर आंदोलन के साथ खड़े हों और एकजुटता दिखाएं।

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