मिनाब के स्‍कूल पर अमेरिकी मिसाइल हमले में इस मासूम का केवल जूता और स्‍वेटर ही बचा, 168 बच्चे हुए थे शहीद

missile attack on Minab school

नेशनल ब्यूरो। नई दिल्ली

दक्षिणी ईरान के मिनाब स्थित शजराह तय्येबा प्राथमिक स्कूल में अमेरिकी मिसाइल हमले में नरसंहार का शिकार हुए बच्चों में एक 7 वर्षीय लड़का मकान नसीरी भी शामिल था। अमेरिकी टॉमहॉक मिसाइलों के हमले में उसके छोटे-नाजुक शरीर का कुछ भी नहीं बचा। उसके माता-पिता अब उस बेटे का इंतजार कर रहे हैं जो कभी लौटकर नहीं आएगा। उनके पास यादों के तौर पर सिर्फ एक सिलवटदार नीला स्वेटर और एक जोड़ी क्रीम रंग की स्नीकर्स रह गई हैं।

मकान की मृत्यु इस आक्रामक युद्ध की भयावह हकीकत का दर्दनाक सबूत है जिसे केवल वे लोग जानते समझते हैं जिन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ती है। 28 फरवरी को किए गए इस घातक अमेरिकी हमले को दुनिया का सबसे जघन्य नरसंहार माना जा रहा है, जिसमें स्कूल में पढ़ रही कम से कम 168 बच्चे (ज्यादातर 7 से 12 वर्ष की लड़कियाँ) मारे गए। हमले के समय कक्षाएं चल रही थीं और स्कूल की इमारत का बड़ा हिस्सा पूरी तरह तबाह हो गया। इस दुखद घटना के बाद ज्यादातर बच्चों के शव बरामद कर दफनाए गए, लेकिन मकान का शव भी नहीं मिला।

मकान के शरीर से कुछ भी नहीं बचा था, इसलिए उसके नाम पर एक प्रतीकात्मक कब्र बनाई गई है। पिछले 46 दिनों में सिर्फ उसका खून से सना हुआ कुचला नीला स्वेटर और एक क्रीम रंग की स्नीकर ही बरामद हुई। उसके अन्य कोई सामान नहीं मिले। उसके सभी सामान अब उसके पड़ोस की मस्जिद में एक छोटे शीशे के बॉक्स में रखे हुए हैं।

मिनाब के प्राथमिक स्कूल के सैकड़ों शहीद बच्चों की कब्रों के बीच मकान के नाम पर एक खाली कब्र भी बनी हुई है। 46 दिनों तक स्कूल की मलबे में तलाशी के बावजूद उसका शव नहीं मिला, इसलिए उसे लापता घोषित कर दिया गया।

घटना के दिन। मकान की माँ आसियेह राहीनेजाद घर का काम कर रही थीं, तभी फोन बज उठा। फोन पर मकान की टीचर मिस मंदाना सलारी थीं। उन्होंने आसियेह से कहा कि तुरंत स्कूल आकर मकान को ले जाएँ, क्योंकि दुश्मनों ने स्कूल पर हमला कर दिया है।आसियेह को उस दिन तेहरान में हुए हमले की कोई जानकारी नहीं थी। उन्होंने स्कूल बस ड्राइवर को फोन किया। ड्राइवर स्कूल के पास ही था और तुरंत वहाँ पहुँचने का वादा किया।आसियेह अभी फोन थामे ही थीं कि भयानक धमाका सुनाई दिया। स्कूल पर भारी बमबारी हो रही थी। आसियेह और उनके पति जो उस दिन घर पर थे तुरंत स्कूल की ओर दौड़े।

मकान के माता-पिता कार से उतरे और स्कूल की ओर भागे। बमों ने स्कूल की इमारतों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया था। चारों ओर अफरा-तफरी मची हुई थी। लोग इधर-उधर दौड़ रहे थे। मकान की माँ सोच रही थीं कि क्या करें और बेटे को ढूँढने कहाँ जाएँ। “जब हम स्कूल पहुँचे तो बहुत से बच्चे मलबे के नीचे दबे हुए थे, लेकिन कोई भी बच्चा जिंदा नहीं बचा था। हम वहाँ दोपहर 11:30 बजे से रात 2:30 बजे तक रहे। मलबे से निर्जीव शव निकाले जा रहे थे। कुछ बच्चे दम घुटने से मरे, ज्यादातर के शरीर के टुकड़े-टुकड़े हो गए थे।

वो बताते हैं पहले 38 दिनों तक हम रोज फॉरेंसिक विभाग जाते थे ताकि शहीद हुए छात्रों की पहचान कर सकें, लेकिन हमें मकान नहीं मिला। हमने डीएनए टेस्ट भी करवाया ताकि बेटे का शव मिल सके। सिर्फ उसकी किताबें और नोटबुक मिलीं। न तो शरीर का कोई टुकड़ा, न बैग, न ही उसके जूते मिले। 38वें दिन मेरे भाई को मेरे प्यारे बेटे की एक स्नीकर मिली।”28 फरवरी को, हमले वाले दिन, मकान के चाचा हम्ज़ेह राहीनेजाद स्कूल गए। हवा में धुआँ, धूल और जलते शवों की बदबू फैली हुई थी।“

राहिनेजाद बताते हैं घटना शुरू होते ही सुबह 5 बजे तक मैं अन्य लोगों के साथ खोए हुए बच्चों को ढूँढने में लगा रहा। हम पत्थरों के टुकड़े हटाते तो सिर्फ मासूम बच्चों के छोटे-छोटे हाथों, पैरों और सिरों के टुकड़े मिलते। यह एक दुःस्वप्न था युद्ध की सबसे भयानक क्रूरता। मैं इसे शब्दों में बयान नहीं कर सकता। यह इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत से भी ज्यादा दर्दनाक था। दूसरे दिन से हमने मकान को ढूँढने के लिए चाचा-भतीजों की 20 सदस्यीय टीम बनाई। हमने स्कूल के आसपास के जंगल में भी तलाशी ली। मैं गॉज बैंडेज और प्लास्टिक बैग लेकर जाता और मलबे के नीचे मिले किसी भी मांस या उँगली के टुकड़े को उठा लेता।मकान के शरीर पर उसके परिवार के अन्य सदस्यों की तरह एक तिल था, जो सर्दियों में ज्यादा गहरा हो जाता था। मैं उसी को ढूँढ रहा था, लेकिन वह जैसे गायब हो गया था।

मकान के माता पिता कहते हैं 38वें दिन तक हमें उम्मीद थी कि वह जिंदा मिल जाएगा। उस दिन मैं फिर घटनास्थल पर गया। तबाह इमारतों से करीब 100 मीटर दूर बगीचे के पेड़ों के बीच कुछ बैग और जूते पड़े थे। मैंने उन्हें एक बॉक्स में रखकर अपनी बहन के घर ले गया।घर में बहुत से लोग थे। मैंने आसियेह से पूछा कि क्या इनमें से कोई चीज मकान की है। क्रीम रंग की स्नीकर देखते ही वह बेहोश हो गईं। यह एक कयामत जैसा मंजर था — क्रूरता से निशाना बनाए गए उस प्राथमिक स्कूल की सबसे बड़ी त्रासदी।”

मकान की शहादत पर ईरानी सरकार की प्रवक्ता फातेमा मोहाजेरानी ने अपने एक्स अकाउंट पर लिखा: “उसका नाम मकान था। वह सिर्फ 7 साल का था। उसके पास सिर्फ एक खून से सना स्वेटर और एक जूता रह गया। मिनाब के स्कूल पर हमला गलती नहीं था यह मानवाधिकार और बच्चों के अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन है। कोई भी बहाना एक बच्चे की जान वापस नहीं ला सकता। चुप रहना भी अपराध है।”

मकान के नाम पर मिनाब के शहीद कब्रिस्तान में एक प्रतीकात्मक कब्र है, उसके पड़ोस की महदिया मस्जिद में एक स्मारक है, और उसके पिता के जन्मस्थान खोमेनीशहर में भी एक स्मारक बनाया गया है। उनके चाचा के अनुसार, वहाँ एक सड़क का नाम भी मकान के नाम पर रखा जाएगा।

आसियेह मस्जिद जाती हैं जहाँ मकान की यादें शीशे के बॉक्स में रखी हैं। कभी-कभी वे उसकी खाली कब्र पर भी जाती हैं और अपने लापता बेटे के लिए रोती हैं।इस्फहान प्रांत में मिनाब के शहीद छात्रों की पहली यादगार समारोह में बोलते हुए आसियेह ने कहा: “मुझे डर लगता था कि मुझे मकान को कब्र में रखना पड़ेगा, मैं यह सहन नहीं कर पाती। मैंने अल्लाह से मदद माँगी, शायद इसी वजह से हमें उसका शव नहीं मिला।”168 शहीद छात्रों के माता-पिता की ओर से उन्होंने सिर्फ एक वाक्य कहा: “हम चाहते हैं कि हमारे बच्चों के नरसंहार का बदला लिया जाए।

इस त्रासदी ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया है और व्यापक निंदा हुई है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगठनों तथा अधिकारियों ने हमले की कड़ी निंदा की है।ईरानी रेड क्रिसेंट सोसाइटी के प्रमुख ने कहा, “मिनाब स्कूल की घटना की किसी अन्य घटना से तुलना नहीं की जा सकती। गाजा में भी इतनी बड़ी संख्या में छात्र एक साथ नहीं मारे गए थे।” उन्होंने इसे “अनोखी और बेहद दर्दनाक घटना” बताया।यूनेस्को ने भी हमले की निंदा करते हुए कहा कि “शिक्षा के लिए समर्पित जगह पर छात्रों की हत्या अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के तहत स्कूलों को दी गई सुरक्षा का गंभीर उल्लंघन है।”

नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मलाला यूसुफजई ने भी हमले की निंदा की और सोशल मीडिया पर लिखा: “वे लड़कियाँ स्कूल गई थीं पढ़ने, अपने भविष्य के सपनों के साथ। आज उनकी जिंदगियाँ क्रूरता से समाप्त कर दी गईं। मैं अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों से, खासकर दक्षिणी ईरान में लड़कियों के स्कूल पर हमले से टूट गई हूँ…”

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now