नेशनल ब्यूरो। नई दिल्ली
भारत उन 85 संयुक्त राष्ट्र सदस्य देशों में शामिल नहीं है, जिन्होंने इज़राइल के कब्जे वाले वेस्ट बैंक में विस्तार की निंदा की है। फिलिस्तीनी मिशन ने संयुक्त राष्ट्र में इन 85 देशों और तीन वैश्विक समूहों अरब लीग, इस्लामी सहयोग संगठन (OIC) और यूरोपीय संघ द्वारा जारी संयुक्त बयान को अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स पर पोस्ट किया है।
बयान पर हस्ताक्षर करने वाले देशों में चीन, बंगलादेश, जापान, ब्राजील ,फ्रांस, ब्रिटेन ,कनाडा समेत कई देश शामिल हैं। बयान में कहा गया है: “हम इज़राइल द्वारा वेस्ट बैंक में अपनी अवैध उपस्थिति का विस्तार करने के उद्देश्य से लिए गए एकतरफा फैसलों और उपायों की कड़ी निंदा करते हैं। ऐसे फैसले अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत इज़राइल के दायित्वों के विपरीत हैं और इन्हें तुरंत वापस लिया जाना चाहिए। हम इस संबंध में किसी भी प्रकार के विलय का दृढ़ विरोध करते हैं।”
हाल के महीनों में इज़राइल ने कब्जे वाले वेस्ट बैंक में निर्माण बढ़ाया है और क्षेत्र पर पूर्ण नियंत्रण आसान बनाने के लिए प्रशासनिक बाधाओं को हटा दिया है, लेकिन 15 फरवरी को उसके सरकार के हालिया फैसले से भूमि विनियमन प्रक्रिया शुरू होगी, जिससे क्षेत्र में बड़े पैमाने पर भूमि पर कब्जा संभव हो जाएगा।

एसोसिएटेड प्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, यह फैसला भूमि स्वामित्व पंजीकरण प्रक्रिया को फिर से शुरू करने का रास्ता खोलता है, जो 1967 के मध्य पूर्व युद्ध के बाद से वेस्ट बैंक में रुकी हुई थी। जब इज़राइल किसी क्षेत्र के लिए भूमि पंजीकरण प्रक्रिया शुरू करता है, तो भूमि पर दावा करने वाले सभी लोगों को स्वामित्व साबित करने वाले दस्तावेज जमा करने होते हैं। इज़राइली एंटी-सेटलमेंट समूह पीस नाउ ने एपी को बताया कि यह प्रक्रिया फिलिस्तीनियों से मेगा लैंड ग्रैब यानि जमीन की खुली लूट की तरह है।
यह बयान इसलिए उल्लेखनीय है क्योंकि गाजा में इज़राइल के हमलों का समर्थन करने वाले देश जैसे जर्मनी ने भी वेस्ट बैंक में इस कदम की निंदा की है।भारत, जो ऐतिहासिक रूप से उत्पीड़ित लोगों का समर्थक रहा है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में इज़राइल का खुला समर्थन करके अपना रुख बदल चुका है।
पिछले साल जून में, जब संयुक्त राष्ट्र के तीन-चौथाई से अधिक सदस्य देशों ने गाजा में तत्काल युद्धविराम, हमास द्वारा बंधकों की रिहाई और निर्बाध मानवीय सहायता की मांग वाली प्रस्ताव का समर्थन किया, तो भारत ने परहेज किया था, यह तर्क देते हुए कि स्थायी शांति केवल सीधी बातचीत से ही संभव है।2024 में, भारत ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के उस प्रस्ताव से परहेज किया था, जिसमें गाजा में तत्काल युद्धविराम और इज़राइल पर हथियार प्रतिबंध की मांग की गई थी।
बयान में आगे कहा गया है: “हम 1967 से कब्जे वाले फिलिस्तीनी क्षेत्र, जिसमें पूर्वी यरुशलम शामिल है, की जनसांख्यिकीय संरचना, चरित्र और स्थिति को बदलने के उद्देश्य से किए गए सभी उपायों को अस्वीकार करते हैं। ऐसे उपाय अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करते हैं, क्षेत्र में शांति और स्थिरता के लिए चल रहे प्रयासों को कमजोर करते हैं, व्यापक योजना के विपरीत हैं और संघर्ष को समाप्त करने वाले शांति समझौते की संभावना को खतरे में डालते हैं।”
इन देशों ने न्यूयॉर्क घोषणा में व्यक्त अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टि की है कि अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र के संबंधित प्रस्तावों और 19 जुलाई 2024 के अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की सलाहकारी राय के अनुरूप ठोस कदम उठाए जाएंगे, ताकि फिलिस्तीनी लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार को साकार किया जा सके और उनके कब्जे वाले फिलिस्तीनी क्षेत्र, जिसमें पूर्वी यरुशलम शामिल है, में अवैध बस्ती नीति, जबरन विस्थापन और विलय की नीतियों और धमकियों का मुकाबला किया जा सके।
17 फरवरी को संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी व्यक्तिगत रूप से इज़राइल की कार्रवाइयों की निंदा की।उन्होंने कहा था कि मैं इज़राइली सरकार के कब्जे वाले वेस्ट बैंक में भूमि पंजीकरण प्रक्रियाओं को फिर से शुरू करने के फैसले की निंदा करता हूं। यह फैसला फिलिस्तीनियों को उनकी संपत्ति से वंचित कर सकता है और क्षेत्र में इज़राइल के अवैध नियंत्रण का विस्तार करने का जोखिम पैदा करता है। मैं इज़राइल से इन उपायों को वापस लेने और सभी से स्थायी शांति के एकमात्र रास्ते अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप बातचीत से दो-राज्य समाधान को बनाए रखने का आह्वान करता हूं।”











