GMT vs MST: हर दिन हमारी घड़ी, मोबाइल, ट्रेन, हवाई जहाज और इंटरनेट सब एक ही शहर के समय के हिसाब से चलते हैं। वह शहर है लंदन और उसके पास से गुजरने वाली ग्रीनविच रेखा लेकिन भारत में कुछ दिनों से समय गणना को लेकर नयी बहस जारी है दरअसल केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने उज्जैन में आयोजित एक बड़े अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में ऐलान किया कि अब वक्त आ गया है कि ग्रीनविच मीन टाइम (GMT) की जगह ‘महाकाल स्टैंडर्ड टाइम’ (MST) को दुनिया का नया मानक समय बनाया जाए। यह बयान प्राचीन भारतीय खगोल विज्ञान, आधुनिक राजनीति और वैश्विक व्यवस्था के बीच एक दिलचस्प बहस का शुरूआती बिंदु बन गया है।
क्या है शिक्षा मंत्री का दावा ?
2 से 5 अप्रैल 2026 तक उज्जैन में आयोजित ‘महाकाल: द मास्टर ऑफ टाइम’ अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि उज्जैन प्राचीन काल से दुनिया की समय गणना का मूल केंद्र रहा है। उन्होंने दावा किया कि उज्जैन वह जगह है जहाँ भूमध्य रेखा (Equator) और कर्क रेखा (Tropic of Cancer) मिलती हैं, और आधुनिक AI टूल्स भी यही मानते हैं। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव की मौजूदगी में प्रधान ने कहा ‘अब वह समय आ गया है जब GMT की जगह तार्किक रूप से महाकाल स्टैंडर्ड टाइम (MST) स्थापित किया जाए।’
क्या कहता है प्राचीन भारतीय खगोल विज्ञान
प्राचीन भारतीय खगोल विज्ञान में उज्जैन को समय गणना का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता रहा है। सूर्य सिद्धांत (लगभग 4वीं-5वीं शताब्दी ईस्वी) जैसे प्रमुख ग्रंथ में स्पष्ट उल्लेख है कि शून्य देशांतर रेखा (Prime Meridian) उज्जैन (तत्कालीन अवंति) और रोहतक के बीच से गुजरती थी। इस आधार पर प्राचीन काल में समय और स्थान की गणना उज्जैन को केन्द्र मानकर की जाती थी। महान खगोलविद वराहमिहिर (6वीं शताब्दी) उज्जैन में रहकर कार्य करते थे। उस समय उज्जैन को पृथ्वी का नाभिदेश यानी केंद्र बिंदु माना जाता था। यह शहर कर्क रेखा (लगभग 23.18° उत्तर अक्षांश) के निकट स्थित है, जिसके कारण सूर्य की स्थिति से समय की सटीक गणना करना अपेक्षाकृत आसान था।
आज भी हिंदू पंचांग उज्जैन के समय को आधार मानकर तैयार किए जाते हैं, जो भारतीय मानक समय (IST) से लगभग 29 मिनट पीछे है। मध्यकाल में अरबी खगोलविदों ने भी उज्जैन को ‘Arin’ नाम से जाना और इसे अपनी गणनाओं में Prime Meridian के रूप में इस्तेमाल किया। नई NCERT कक्षा 6 की सामाजिक विज्ञान किताब में भी उज्जैन को प्राचीन प्रधानमध्य रेखा के रूप में उल्लेख किया गया है।
विवाद क्यों खड़ा हुआ?
मंत्री के बयान में एक बड़ा भौगोलिक दावा विवाद का कारण बना कि ‘उज्जैन में Equator और Tropic of Cancer मिलते हैं’। वैज्ञानिक रूप से यह असंभव है। दोनों रेखाएँ समानांतर हैं और कभी नहीं मिल सकतीं। उज्जैन Equator से लगभग 2,500 किमी उत्तर में है। अखिल भारतीय शिक्षा बचाओ समिति AISEC महासचिव डॉ. तरुण कांति नस्कर ने इस बयान को मिडिल स्कूल स्तर की भूल बताया है। दूसरी तरफ कांग्रेस और कई शिक्षाविदों ने भी सवाल उठाए हैं।
दरअसल 1884 के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में ग्रीनविच को वैश्विक Prime Meridian चुना गया था, इससे पहले कई सभ्यताओं भारत, यूनान, बगदाद, पेरिस की अपनी-अपनी Prime Meridian थी। Prime Meridian कोई भौगोलिक विशेष रेखा नहीं है। यह पूरी तरह arbitrary है। कोई भी देशांतर रेखा चुनी जा सकती है।
आज यह बदलाव क्यों संभव नहीं है?
1884 में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में ग्रीनविच (Greenwich) को दुनिया की आधिकारिक प्रधानमध्य रेखा घोषित किया गया था। आज पूरा विश्व कोऑर्डिनेटेड यूनिवर्सल टाइम (Coordinated Universal Time – UTC) पर चलता है जो GMT पर आधारित है। हवाई यातायात, GPS, सैटेलाइट, बैंकिंग, इंटरनेट और सभी आधुनिक सिस्टम इसी मानक पर निर्भर हैं। किसी भी नए मेरिडियन को शून्य मानने के लिए दुनिया के सभी देशों की सहमति जरूरी है। व्यावहारिक रूप से यह बदलाव असंभव है हालांकि सांस्कृतिक और शैक्षणिक चर्चा की जा सकती है।
बयान का आगे क्या प्रभाव होगा?
यह बयान मुख्य रूप से प्रतीकात्मक और सांस्कृतिक है। सरकार इसे भारतीय ज्ञान प्रणाली को बढ़ावा देने और औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति के रूप में देख रही है। संभव है कि इससे उज्जैन की वेधशाला को अधिक फंडिंग मिले पंचांग को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रमोट किया जाए और स्कूली पाठ्यक्रम में भारतीय खगोलशास्त्र पर ज्यादा जोर दिया जाए। 2047 के विकसित भारत के लक्ष्य में इसे डीकोलोनाइजेशन (Decolonization) का हिस्सा माना जा रहा है।
हालांकि, उदित राज जैसे विपक्षी नेताओं ने इस पर कटाक्ष किया है और कहा है कि दुनिया आस्था से नहीं, विज्ञान और तर्क से चलती है।अभी तक ISRO या किसी प्रमुख वैज्ञानिक संगठन ने इस प्रस्ताव पर आधिकारिक टिप्पणी नहीं दी है। इतिहासकार और खगोल प्रेमी उज्जैन की प्राचीन महत्ता को सही मानते हैं, लेकिन GMT को बदलने को व्यावहारिक रूप से असंभव बताते हैं।









