नई दिल्ली। बजट सत्र से पहले 29 जनवरी को भारतीय रुपये ने गिरावट का नया रिकॉर्ड बना दिया है। डालर के मुकाबले रुपया 92 के स्तर को पार कर गया। शुरुआती कारोबार में यह 92 के पार निकल गया, जो कि पिछले बंद भाव से लगभग 1 पैसे की गिरावट दर्शाता है।
यह पहली बार है जब रुपया इस स्तर को छू रहा है, जो कि विदेशी निवेशकों की लगातार निकासी और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं का नतीजा माना जा रहा है। हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की ओर से हस्तक्षेप की उम्मीद है, लेकिन बाजार में डॉलर की मांग लगातार बढ़ रही है।
गिरावट के प्रमुख कारण
रुपये की इस तेज गिरावट के पीछे कई वैश्विक और घरेलू कारक जिम्मेदार हैं। सबसे बड़ा दबाव विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) की ओर से लगातार निकासी से आ रहा है।
जनवरी 2026 में ही लगभग 4 अरब डॉलर की निकासी हो चुकी है, जबकि पूरे 2025 में यह आंकड़ा 18 अरब डॉलर तक पहुंचा था। निवेशक सुरक्षित संपत्तियों जैसे सोना या अन्य उभरते बाजारों की ओर रुख कर रहे हैं, खासकर चीन के प्रोत्साहन पैकेजों के कारण। दूसरा बड़ा कारण अमेरिका द्वारा भारत पर लगाए गए ऊंचे टैरिफ हैं।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने स्टील और एल्युमिनियम जैसे उत्पादों पर 50 प्रतिशत तक टैरिफ लगा दिए हैं, जो वैश्विक स्तर पर भारत के लिए सबसे ज्यादा हैं। इससे भारत के निर्यात प्रभावित हुए हैं, और अमेरिका-भारत व्यापार समझौते में देरी ने अनिश्चितता बढ़ा दी है।
इसके अलावा, भू-राजनीतिक तनाव जैसे अमेरिका-ग्रीनलैंड विवाद और अमेरिकी फेडरल रिजर्व की नीतियां भी डॉलर को मजबूत बना रही हैं, जिससे उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव बढ़ा है।
बजट सत्र से पहले अर्थव्यवस्था पर कितना बड़ा झटका?
बजट 1 फरवरी को आने वाला है, ऐसे में रुपये की यह गिरावट भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा चुनौतीपूर्ण संकेत है। हालांकि, भारत की जीडीपी वृद्धि मजबूत बनी हुई है।
सितंबर 2025 तिमाही में 8.2 प्रतिशत की दर दर्ज की गई लेकिन मुद्रा की कमजोरी आयात-निर्भर क्षेत्रों को प्रभावित कर सकती है। कच्चा तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स, रत्न और आभूषण जैसे क्षेत्रों में लागत बढ़ने से मुद्रास्फीति का दबाव बन सकता है, जो आम घरेलू बजट को प्रभावित करेगा।
दूसरी ओर यह निर्यातकों के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है, क्योंकि कमजोर रुपया भारतीय उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में सस्ता बनाता है।
आईटी, कपड़ा और फार्मा जैसे क्षेत्र लाभ उठा सकते हैं, जो टैरिफ के प्रभाव को कुछ हद तक कम कर सकता है। लेकिन कुल मिलाकर, पूंजी निकासी और व्यापार अनिश्चितता से निवेशकों का विश्वास डगमगा सकता है, जो बजट में विकास नीतियों की जरूरत को बढ़ाएगा।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अगर अमेरिका-भारत व्यापार समझौता जल्द होता है, तो यह दर्द अल्पकालिक रहेगा, लेकिन वर्तमान में यह अर्थव्यवस्था की मजबूती को छिपा रहा है। आरबीआई की ओर से डॉलर बिक्री और अन्य उपायों से स्थिति नियंत्रण में आ सकती है, लेकिन बजट से पहले यह एक बड़ा परीक्षण है।








