नई दिल्ली। विरोध प्रदर्शनों के दौरान महिला पत्रकारों से कथित बदसलूकी और यौन उत्पीड़न के मामले में बुधवार (14 अक्टूबर) को सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में सुनवाई हुई। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि आज के तकनीकी दौर में मोबाइल रखने वाला हर व्यक्ति खुद को पत्रकार बता रहा है। लोग वीडियो रिकॉर्ड कर रील बनाते हैं और सोशल मीडिया पर अपलोड कर देते हैं। ऐसे में स्वतंत्र पत्रकार और रील बनाने वालों के बीच अंतर करना मुश्किल हो गया है।
महिला पत्रकारों की सुरक्षा के लिए समिति की मांग
नेटवर्क ऑफ वुमेन इन मीडिया, इंडिया (NWMI) समेत अन्य संगठनों की याचिका पर वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने पत्रकारों की सुरक्षा के लिए अंतरिम आदेश और महिला अध्यक्ष वाली समिति बनाने की मांग की। उन्होंने कहा कि प्रदर्शन के दौरान महिला पत्रकारों को अपना काम करने से रोका गया और उनके साथ दुर्व्यवहार हुआ।
डिजिटल सबूत सुरक्षित रखने के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित एजेंसियों को सीसीटीवी फुटेज और डिजिटल सबूत सुरक्षित रखने के निर्देश दिए। अदालत ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 172 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर भी नोटिस जारी किया। इससे पहले अदालत ने दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी से पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार पर स्पष्टीकरण मांगा था।







