नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने दिल्ली हाई कोर्ट को बताया कि वह भ्रष्टाचार या कदाचार की शिकायतों पर जानकारी नहीं रखता है। यह दावा सुप्रीम कोर्ट अपने ही कार्यालय द्वारा संसद को कुछ हफ्ते पहले दी गई 8,630 शिकायतों के आंकड़े से मेल नहीं खाता।
सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने 1 अप्रैल को दिल्ली हाई कोर्ट को बताया कि वह भ्रष्टाचार या कदाचार की शिकायतों पर जजों के नाम से कोई जानकारी नहीं रखता है। यह बयान सुप्रीम कोर्ट के पब्लिक इंफॉर्मेशन ऑफिसर की ओर से वकील रुखमिणी बोबडे ने जस्टिस पुरुषैंद्र कुमार कौरव के समक्ष दिया। उन्होंने आरटीआई आवेदन को बेवजह की कार्रवाई करार दिया। उन्होंने कहा कि रजिस्ट्री ऐसी जानकारी इकट्ठा करने के लिए संसाधन नहीं बर्बाद कर सकती।
सौरव दास की आरटीआई
यह मामला सौरव दास बनाम सीपीआईओ, सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया का है। पत्रकार और आरटीआई कार्यकर्ता सौरव दास ने अप्रैल 2023 में मद्रास हाई कोर्ट के पूर्व कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस टी. राजा के बारे में तीन सवाल पूछे थे क्या उनके खिलाफ भ्रष्टाचार या अनुचित आचरण की कोई शिकायत मिली थी? कितनी शिकायतें मिलीं? उन पर क्या कार्रवाई हुई?
सुप्रीम कोर्ट के केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी ने जवाब देने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि जानकारी “जिस रूप में मांगी गई है, उस रूप में रखी नहीं गई है”। पहली अपीलीय प्राधिकारी ने भी इनकार को बरकरार रखा। केंद्रीय सूचना आयोग ने मामले को वापस भेजा, लेकिन सीपीआईओ ने फिर वही आधार पर इनकार कर दिया। इसके बाद दास ने वकील प्रशांत भूषण के माध्यम से दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया।
1 अप्रैल की सुनवाई में एक महत्वपूर्ण डेवलपमेंट हुआ। जस्टिस कौरव ने संकेत दिया कि इस मामले का संस्थान पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने दोनों पक्षों को एक ऐसा तंत्र सुझाने को कहा जो दो उद्देश्यों को संतुलित करे। ईमानदार जजों की प्रतिष्ठा की रक्षा और जनता को यह जानकारी देने का अधिकार कि शिकायतों का निपटारा कैसे किया जाता है। मामले की अगली सुनवाई 7 मई को होगी।
क्या कहा था संसद में
सुप्रीम कोर्ट का यह दावा कि वह जजों की शिकायत का डेटा नहीं रखता, संसद को हालिया खुलासे के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। फरवरी 2026 में केंद्रीय कानून मंत्रालय ने लोकसभा को बताया कि मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय को 2016 से 2025 के बीच बैठे जजों के खिलाफ कुल 8,630 शिकायतें मिली थीं। यह डेटा सुप्रीम कोर्ट ने ही उपलब्ध कराया था। शिकायतों में वृद्धि हुई 2016 में 729 से बढ़कर 2025 में 1,102 हो गई, यानी करीब 51 फीसदी की बढ़ोतरी।
प्रशांत भूषण ने उठाया मामले को
सुनवाई के दौरान प्रशांत भूषण ने इस विरोधाभास को उठाया। सुप्रीम कोर्ट ने संसद को साल-वार कुल आंकड़े दिए हैं। फिर वह कैसे कह सकता है कि आरटीआई आवेदक द्वारा मांगे गए प्रारूप में जानकारी नहीं रखी गई है? कम से कम 8,630 शिकायतों को दर्ज करने के लिए जज की पहचान दर्ज करना जरूरी होगा। बिना उस बुनियादी जानकारी के कुल आंकड़ा बेमानी है।
बोबडे ने जवाब दिया कि संसदीय डेटा केवल सभी बैठे जजों के खिलाफ कुल शिकायतों से संबंधित है, न कि जज-विशिष्ट ब्रेकडाउन से। लेकिन सुनवाई के बाद दास ने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर लिखा कि यह दावा “काफी अजीब” है। शिकायत दर्ज करते समय जज का नाम तो लॉजिकल रूप से दर्ज होना ही चाहिए। वरना 8,630 का आंकड़ा कैसे निकाला गया?
हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी
हाई कोर्ट ने बार-बार पूछा कि ऐसा कैसे संभव है कि ऐसी कोई डेटा नहीं रखी गया साथ ही उसने इस बात पर चिंता जताई कि इससे जनता में क्या धारणा बन रही है। बड़े-बड़े कुल आंकड़े देने के बावजूद शिकायतों के निपटारे पर कोई स्पष्टता न होने से निष्क्रियता का आभास होता है, जो न्यायपालिका की छवि के लिए हानिकारक है।
रजिस्ट्री की जवाब का पेंच
दास ने किसी खास प्रारूप में जानकारी नहीं मांगी थी। उन्होंने बाइनरी सवाल पूछा था कि क्या जस्टिस टी. राजा के खिलाफ शिकायतें मिली थीं? इसका जवाब केवल हाँ या ना में हो सकता है। भूषण ने कहा कि दास ने यह भी ऑफर किया था कि सुप्रीम कोर्ट जो प्रारूप कहे, उसी में नया आरटीआई दाखिल कर देंगे।
जस्टिस कौरव का जवाब काफी बोलता था ।आवेदक सौ अलग-अलग प्रारूपों में आवेदन कर सकता है, लेकिन मुद्दा यह नहीं है। रजिस्ट्री तकनीकी औपचारिकता का सहारा लेकर खुलासे से इनकार नहीं कर सकती। “जिस रूप में मांगी गई है, उस रूप में रखी नहीं गई” यह समस्या उच्च न्यायपालिका के साथ आरटीआई कार्यकर्ताओं को बार-बार मिलता है। यह यह नहीं बताता कि जानकारी अस्तित्व में है या नहीं, बल्कि सवाल को प्रक्रियागत गतिरोध में धकेल देता है।
आरटीआई अधिनिया का उल्लंघन
यह जवाब आरटीआई अधिनियम की धारा 4(1) से मेल नहीं खाता। इस प्रावधान के तहत हर सार्वजनिक प्राधिकरण पर सकारात्मक दायित्व है कि रिकॉर्ड को “उचित रूप से सूचीबद्ध और अनुक्रमित” किया जाए ताकि सूचना का अधिकार सुगम हो। कंप्यूटरीकरण योग्य रिकॉर्ड को उचित समय में कंप्यूटराइज किया जाना चाहिए। यह विवेकाधीन नहीं है।
अगर सुप्रीम कोर्ट को दस साल में 8,630 शिकायतें मिलीं और उन्हें जज के अनुसार नहीं निकाल सकता, तो वह इस कानूनी दायित्व का उल्लंघन कर रहा है।बोबडे ने खुलासे का विरोध करने के लिए 2019 के पांच जजों वाली संवैधानिक पीठ के फैसले सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया बनाम सुभाष चंद्र अग्रवाल का हवाला दिया। इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।उस फैसले ने सबसे पहले यह माना कि आरटीआई अधिनियम सीजेआई के कार्यालय पर लागू होता है। फिर इसकी सीमा तय की।
कोलेगियम सदस्यों के बीच नियुक्ति और ट्रांसफर प्रक्रिया में आदान-प्रदान की जानकारी को फिड्यूशरी संबंध के रूप में संरक्षित माना गया। लेकिन फैसले ने कोलेगियम की विचार प्रक्रिया और सार्वजनिक हित से संबंधित जानकारी के बीच अंतर किया। धारा 8(1)(j) के तहत सार्वजनिक गतिविधि से असंबंधित व्यक्तिगत जानकारी छूट प्राप्त है, लेकिन सार्वजनिक गतिविधि से संबंधित व्यक्तिगत जानकारी छूट प्राप्त नहीं है।
गरिमा और गोपनीयता को एक करता कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट की स्थिति की गहरी समस्या यह है कि वह गरिमा और गोपनीयता को एक कर रही है। मूल तर्क यह है कि शिकायत की जानकारी खुलासे से न्यायिक स्वतंत्रता को नुकसान पहुंचेगा। लेकिन वास्तव में गोपनीयता ही जन विश्वास को कमजोर कर रही है।
संसदीय डेटा में 8,630 शिकायतें बताई गईं, लेकिन यह नहीं बताया गया कि उनके बाद क्या हुआ। लगभग उसी समय सुप्रीम कोर्ट ने कक्षा 8 की एनसीईआरटी की किताब के एक अध्याय पर स्वतः संज्ञान लिया जिसमें न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का जिक्र था और किताब पर प्रतिबंध लगा दिया और उसके तीन लेखकों को सरकारी कामों से ब्लैकलिस्ट कर दिया।
यह तुलना काफी चौंकाने वाली थी।न्यायपालिका के अपने डेटा से हजारों शिकायतें दर्ज होने की पुष्टि हुई। संसदीय रिकॉर्ड से निपटान की जानकारी न होने की पुष्टि हुई। और न्यायपालिका की प्रतिक्रिया स्कूल की किताब दबाना थी।








