नई दिल्ली। मद्रास हाईकोर्ट ने कहा है कि आज के सामाजिक संदर्भ में तमिलनाडु (Tamil Nadu) को अलग देश बनाने की बात राजद्रोह नहीं मानी जाएगी। बल्कि ऐसी टिप्पणी करने वाले व्यक्ति को मानसिक स्वास्थ्य की समस्या वाला माना जाएगा।
न्यायमूर्ति डी. भारथा चक्रवर्ती की एकलपीठ ने 29 जून के फैसले में कहा कि ऐसी बात अधिक से अधिक नाराजगी पैदा कर सकती है। इसलिए, वर्तमान सामाजिक माहौल में केवल उस वाक्य का प्रकाशन राष्ट्र या भारतीय सरकार के खिलाफ घृणा भड़काने वाला नहीं माना जा सकता।
प्रकाशकों के खिलाफ था मामला
कोर्ट ने दो प्रकाशकों के खिलाफ राजद्रोह का मामला रद्द करते हुए यह टिप्पणी की। इन पर 2019 में भारतीय दंड संहिता की धारा 124 के तहत केस दर्ज किया गया था। वर्ष 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने राजद्रोह से संबंधित सभी कार्यवाहियों और आपराधिक मुकदमों को स्थगित रखने का आदेश दिया था।प्रकाशक मद्रास हाईकोर्ट में याचिका दायर कर केस को चुनौती दे रहे थे, जो एक मजिस्ट्रेट कोर्ट में लंबित था।
लेखक की हो गई मौत
यह मामला कलागम पथिप्पगम नामक प्रकाशन गृह द्वारा 2014 में जारी एक किताब से संबंधित है। याचिकाकर्ता इसी प्रकाशन गृह चलाते हैं। किताब के लेखक की सुनवाई के दौरान मृत्यु हो चुकी थी।किताब में कथित तौर पर लिखा था कि 1967 में कोयंबटूर में तमिलहरासन नामक व्यक्ति ने कहा था कि तमिलनाडु को अलग राष्ट्र होना चाहिए और विभाजन तथा अलगाव के लिए गुरिल्ला युद्ध अपनाया जाना चाहिए।
राज्य सरकार ने दिया था राजद्रोह का तर्क
याचिकाकर्ताओं ने कहा कि हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने पहले एक समान किताब के मामले में राजद्रोह की कार्यवाही रद्द की थी।राज्य सरकार ने विरोध करते हुए कहा कि अगर किताब में तमिलनाडु को अलग करने और उसके लिए गुरिल्ला युद्ध की बात लिखी गई है तो यह राजद्रोह है।बेंच ने राज्य के तर्क को खारिज कर दिया।
कोर्ट ने कहा वर्तमान समय के हिसाब से देखे जायेंगे मामले
न्यायमूर्ति चक्रवर्ती ने कहा कि राजद्रोह का सार है कि लिखित या दृश्य प्रतिनिधित्व के माध्यम से सरकार के प्रति घृणा, अवमानना या असंतोष भड़काना या भड़काने की कोशिश करना।न्यायाधीश ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया है कि ऐसे कृत्यों को वर्तमान सामाजिक माहल और समय के आलोक में देखा जाना चाहिए।
कोर्ट कहा कि “यह सही है कि 1967 में तमिलहरासन के समय, जब उन्होंने तमिल लिबरेशन फ्रंट जैसा संगठन बनाया था, ऐसी भाषण या प्रकाशन सरकार के प्रति घृणा या अवमानना भड़का सकता था। लेकिन आज के परिदृश्य में भारत एक राष्ट्र के रूप में दिल और आत्मा से एकजुट है।”कोर्ट ने कहा कि जो हुआ था, उसे मात्र दर्ज करना ही घृणा भड़काने की कोशिश नहीं माना जा सकता।









